बाँटो और राज करो

येन-केन-प्रकारेण आम जन को भ्रमित कर देना ही मायावती की सबसे बड़ी ताकत है। वह इसका इस्‍तेमाल भी ब-खूबी करती हैं। बँटवारे की ताजा चाल इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।

सूबे की मुखिया ने चुटकी बजायी और असेम्बली के मुखिया ने उन्हें सुनाई पड़ी आवाजों के दम के आधार पर घोषित कर दिया कि प्रदेश को बाँटने के राज्य सरकार के प्रस्ताव पर असेम्बली ने अपनी मुहर लगा दी है। महज दो दिनों के लिए बुलाये गये बड़े संक्षिप्‍त सत्र के पहले ही दिन उत्तर प्रदेश को चार टुकड़ों में बाँटने के प्रस्ताव पर प्रदेश की विधान-सभा में जो कुछ भी ‘वैधानिक’ क्रिया-कलाप हुआ उसका संक्षिप्‍त लहजा बहुत कुछ ऐसा ही रहा। भारतीय लोक-तन्त्र के विधाई इतिहास की यह अपने किस्म की अनोखी घटना रही। सम्भावित रूप से इकलौती ही रहेगी।

सोमवार को उ० प्र० विधान-सभा के नये सत्र के औपचारिक रूप से प्रारम्भ होते ही मुख्य विपक्षी दल सपा और भाजपा की ओर से अविश्‍वास के आधार पर सरकार को पद-च्युत करने की माँग रखी गयी। इसको लेकर इतना हंगामा हुआ कि चार से पाँच मिनिट के बीच ही सदन स्थगित हो गया। इस बीच स्पीकर को यह पूछते हुए भी सुना गया कि जब मायावती सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्‍त है तब विपक्ष किस आधार पर उसे हटाने की माँग कर रहा है? इसके बाद, १२:२० पर जब दोबारा सदन की कार्यवाही प्रारम्भ हुई तो उसी शोर-शराबे के बीच, जिसमें कुछ सुनाई न देने के आधार पर सदन एक बार स्थगित हो चुका था, मायावती के एक लाइन के बँटवारा-प्रस्ताव को ध्वनि-मत से पारित हुआ घोषित कर दिया गया। इस तरह कुल मिलाकर १२ मिनिट में सदन के शीत-कालीन सत्र के अनिश्‍चित काल के लिए स्थगित किये जाने से पहले केवल दो प्रस्ताव पारित हुए जिनमें एक वित्तीय वर्ष २०१२-१३ के लिए लेखानुदान पारित करने से जुड़ा था।

जाहिर रूप से, आगामी चुनाव के मद्देनजर परस्पर तीखी प्रतिद्वन्‍द्विता रखने के बाद भी, सपा और भाजपा सदन के भीतर केवल इसलिए एक-जुट हुईं कि इस तरह तीखा विरोध प्रदर्शित करके ही वे, अलग-अलग ही सही, बसपा की मुख्य विकल्प के रूप में खुद को चिन्हित करा सकती थीं। इस सम्भावना को आगे बढ़ाने की नीयत से दोनों ही इस तथ्य को भुनाने की कोशिश में थीं कि आगामी विधान-सभा चुनाव में टिकिट से वंचित कर दिये गये लगभग आधा सैकड़ा बसपा विधायक मायावती को उनकी जगह वापस पहुँचाने में उनसे गल-बहियाँ करेंगे। जबकि, मायावती ने सदन की हर उस राजनैतिक गोट को चलने की पुर-जोर कोशिश की जो विपक्ष की इस संयुक्‍त चाल को नाकामयाब कर दे। इस पूरे परिदृश्य में, बसपा के विकल्प के रूप में खुद के सबसे आगे होने का दावा करने वाली कांग्रेस बेबस-बेचारी हो गयी नजर आयी। उसकी स्थिति उस साँप की सी होकर रह गयी जिससे न तो छछूंदर निगली जा रही हो और न उगली।

मायावती को अपनी जो ताकत पता थी वह उन्होंने दिखा दी। अतीत में झाँकें तो समझा जा सकता है कि येन-केन-प्रकारेण आम जन को भ्रमित कर देना ही मायावती की सबसे बड़ी ताकत है। वह इसका इस्‍तेमाल भी ब-खूबी करती हैं। इसके लिए बसपा ने अपने शुरूआती दिनों में तथा-कथित मनुवाद के खिलाफ़ आक्रोष को तमाम नैतिक मूल्यों को तिलाञ्जलि देने की सीमा तक हवा दी। इस हवा ने बसपा को मन-चाही राजनैतिक जमीन उपलब्ध करायी। इसके बाद, अगले कदम के रूप में, मायावती ने सवर्णों में पैठ बनाने की चालें चलीं। इसके लिए उन्होंने उन्हें साथ जोड़ने की मंशा दिखाई। इन चालों ने बसपा को, पहले से हासिल कर लिए जन-मत के अपने प्लॉट पर सत्ता-भवन खड़ा करने की हैसियत में पहुँचा दिया — अपने अकेले दम पर ही बसपा की सरकार बन गयी। लेकिन इसके बाद जहाँ एक ओर बसपा के हाथ में कोई लोक-लुभावन झुन-झुना नहीं बच रहा था वहीं दूसरी ओर अनाचार, दुराचार और भ्रष्‍टाचार से जुड़े इतने पुख्ता मामले सर्वजनिक हो चुके थे जिनसे साफ़ होने लगा था कि आसन्न चुनाव में उसके दोबारा प्रतिष्‍ठित होने के अवसर दूर-दूर तक नहीं बचे थे।

ऐसी कठिन राजनैतिक स्थिति में हारी हुई जंग दोबारा जीत लेने के लिए मायावती ने प्रदेश के विभाजन की ताजा बिसात बिछा दी है। इसमें दो राय नहीं कि वह भी बहुत अच्छी तरह से जानती हैं विधान-सभा में पारित हुआ प्रस्ताव अपने आप में सब कुछ नहीं है। पश्‍चिम प्रदेश, अवध प्रदेश, बुन्देल खण्ड और पूर्वांचल नाम के इन चारों टुकड़ों को भारत के अधिकृत नक्शे में दिखलाने के लिए लम्बी विधाई दूरी पार करनी शेष है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि खुद माया भी प्रस्तावित बँटवारे को यथार्थ में लागू हुआ देखने के प्रति शायद ही गम्भीर हों। फिर भी, चुनावी खसरे में अपने नाम के दाखिले की चाल तो चली ही जा चुकी है। लहजा बिल्कुल दो टूक है — जन-असन्‍तोष की ताजी तस्वीर में बसपा के लिए खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो क्या हुआ? आखिर, खोए हुए में से कुछ न कुछ वापस हथिया लेने की कोशिश ही तो प्रमुख राजनैतिक चरित्र है। इसलिए हो सकता है कि, लम्बा राजनैतिक लाभ लूटने के लिए, सारा कुछ राख के नीचे दबा दी गयी अमर चिनगारी की तरह सहेज कर रख लिया जाए। जन-भावना राज्य के बँटवारे की इच्छा से ओत-प्रोत है या नहीं, इसकी तात्विक बहस को दर-किनार करते हुए मायावती ने शंख-नाद कर दिया है कि केवल वे ही हैं जिसे जन-भावना की आवाज सुनाई दी है।

इस सब में कांग्रेस की बेचारगी पूरी तरह बेनकाब हो गयी है। खुद अपने कन्‍धे पर बन्दूक रखकर मायावती की इस चाल को काटने की हिम्मत उसमें बिल्कुल भी नहीं है। उसे लगता है कि ऐसा करने से प्रदेश के चारों प्रस्तावित टुकड़ों में कांग्रेस-विरोधी चुनवी माहौल बनेगा। वह समझ रही है कि यदि ऐसा हुआ तो वह राहुल के राजनैतिक भविष्य के लिए बहुत घातक होगा। लेकिन वह खुद को बसपा का पिछलग्गू हुआ मान लिए जाने के जोखिम से भी बचना चाहती है। इसलिए कांग्रेसी घाघों ने भी, माया की ही तर्ज पर, खोए हुए में से हासिल करने की बड़ी अनोखी गोट फेक दी है — प्रस्ताव के पास होते ही केन्द्रीय मन्त्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने एक टीवी चैनल पर प्रस्ताव की संवैधानिकता पर अजीब सा सवाल खड़ा किया। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश की विधान-सभा प्रदेश के अपने ही एक भाग को बुन्देल खण्ड के रूप में प्रथक राज्य के रूप में बाँटने का प्रस्ताव पारित करने का कोई संवैधानिक अधिकार इस आधार पर नहीं रखती है कि इसके लिए म० प्र० से भी सहमति लेना जरूरी है, जो नहीं ली गयी है!

सामान्य सी लगती इस राजनैतिक टिप्पणी के बड़े गहरे अर्थ हैं। क्योंकि शीर्ष पार्टी नेतृत्व ने विधान-सभा के भीतर हुए घटना-क्रम पर कोई विपरीत टिप्पणी नहीं की है इसलिए प्रस्ताव परित करने में उ० प्र० विधान-सभा में हुई हर सम्भावित विधाई चूक की जन-बहस को छोड़ दें, और इसे समुचित मानते हुए संवैधानिक रूप से तौलें, तो विधान सभा द्वारा पारित हुए बँटवारा-प्रस्ताव में कोई विधाई अड़चन नहीं है — एक प्रदेश विधान-सभा ने अपने बँटवारे का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है और इसमें उसने अपने एक प्रस्तावित अंश को बुन्देल खण्ड का नाम दे दिया है। तब फिर, जायसवाल द्वारा इस तरह से बिना किसी तात्‍कालिक उकसावे के, औचक ही, किसी दूसरे प्रदेश का नाम घसीट लेने आखिर क्या अर्थ हो सकता है?

किन्तु गहराई में जाकर टटोलने से तस्वीर का कतई दूसरा पहलू दिखता है। दरअसल, ऐसा करते हुए कांग्रेस म० प्र० में बँटवारे की चिनगारी लगाने की कोशिश कर रही है। सोच यही है कि, उनके द्वारा प्रेरित, पृथक बुन्देल खण्ड की चिनगारी जब आग का रूप लेगी तब जहाँ एक ओर वह भाजपा को गम्भीर रूप से झुलसायेगी वहीं दूसरी ओर इससे उसे म० प्र० में वही कुछ उपलब्ध हो सकेगा जिसे झपट लेने के लिए मायवती ने बँटवारा-कार्ड चला है। अनेक दूसरी बातों के अलवा, यह तर्क इसलिए भी ठोस जमीन पर खड़ा दिखता है कि कांग्रेस की ताजा राजनैतिक गति-विधियों का तटस्थ मूल्यांकन फिल-हाल तो यही दर्शाता दिखलाता है कि कांग्रेस के हाथ में केन्द्रीय तो छोड़ें ऐसी एक भी प्रादेशिक राजनैतिक उपलब्धि, और पार्टीगत्‌ एक-जुटता भी, नहीं है जो आने वाले समय में उसे म० प्र० में सत्ता के पास भी ले जाए।

(२२ नवम्बर २०११)