‘तेरे’ और ‘मेरे’ का फ़र्क

पकड़ी मछलियों की दोनों ढेरियों में आम आदमी को कोई फ़र्क ठीक वैसे ही नहीं दिखेगा जैसे कि वह पॉलिटीशियन्स के अपने-अपने ग्रुप्स में बाकी के दूसरे ग्रुप्स से दिखलाये जा रहे डिफ़रेन्स को नहीं समझ पाता है।

बड़े दिनों से एक फ़्रैण्ड से मिला नहीं था। वैसे तो ये भाई खुद ही आ धमकता था और यह वन-वे याराना बरसों से यों ही चल रहा था। पर, बीती मुलाकात में मुझसे न जाने क्या गुस्ताख़ी हुई कि कैलेण्डर के पन्ने पलट गये, वह नहीं पलटा।

जानता था कि भाई को भोर फटे और साँझ के धुँधलके में पानी के किनारे टहलने का खासा चस्का है। बीती बार मेरे यहाँ जब धमका था तब ऐसे ही किसी डेली टूर को पूरा करके सिविलियन मुलाकात को तत्‍पर हुआ था। यह दीगर बात है कि प्रकृति-दर्शन से जुड़े अपने एक्सपीरिएन्स को उस सुबह वह भुला नहीं पाया था। सो, पूरा सत्संग अपने इसी रोने में झौंकने ल्गा था कि मॉर्निंग वाक में आबो-हवा की ताजगी का वह सुख अब छिन गया है जिससे प्रेरित होकर शहरी वाशिन्दे टहलने को ललकते हैं। बतलाने लगा कि कैसे दिसा-भड़ागत की निजात पाने की दूसरों की मजबूरी ने शहरी मॉर्निंग-वाकर्स को कम्पैल कर दिया है कि प्रकृति के साथ-साथ वे प्रकृतिस्थ शख़्सियतों के भी दर्शन करें! फिर, जब मैंने विस्तार-वादी शहरी प्रवृत्ति पर इसका ठीकरा फोड़ने की कोशिश की तो हत्थे से उखड़ गया और आधी बची चाय बीच में ही छोड़ रिसा कर चल दिया। बस, इसीलिए कल जी हो आया उससे खुद जाकर मिलने का। मैंने उसे पकड़ने की ठान ली।

खैर, तालाब के किनारे तो नहीं पर वापसी के रास्ते में एक टपरे पर चाय सुड़कते जरूर मिल गया। चाय के आनन्द जश्‍न मनाते हुए भी रह-रह कर भीतर उठते वैचारिक तूफानों की फ़िलॉसफ़िकल उहापोह उनकी शक्ल पर साफ-साफ देख पा रहा था। जाहिर है, न चाहते हुए भी इस म्यूचुअली काण्‍ट्राडिक्‍टरी कॉम्बिनेशन पर अचरज से भरी मेरी सवालिया निगाहें बरबस उस पर चस्पा हो चुकी थीं। परिणाम पार्टली एक्सपेक्‍टेड और पार्टली अन-एक्सपेक्‍टेड रहा। एक्सपेक्‍टेड इन द सेंस कि बीती मुलाकात की अपनी भड़ास ठीक दिसा-भड़ागत की तर्ज पर भड़ से निकाल डाली। अनएक्सपेक्‍टेड इस तरह कि पेट खाली हुआ तो सहज होते हुए, पॉलिटीशियन्स की तर्ज पर, बतलाया कि आज की मॉर्निंग वाक में जो देख कर आ रहा है उसने उसके सोच को नई दिशा ही दे डाली है!

अब, असहज होने की बारी मेरी थी। सो, ढूँढ़-ढाँढ़ कर जगह तय की और बैठ गया। और क्योंकि वह भी बीती मुलाकात का पूरा हिसाब करने को तत्‍पर था, प्वाइण्ट बाई प्वाइण्ट डिटेल के साथ शुरू हो गया। यों, मुझे भी कुछ लोगों से हिसाब बराबर करना है पर उसके लपेटे से आपको बचाए रखना मेरा पहला फर्ज है। इसलिए ब्रीफ़ में बतलाऊँगा —

उसने बतलाया कि मॉर्निंग वाक पर प्रकृतिस्थ लोगों के अलावा झक मारते लोग भी मिल जाते हैं। मिली-जुली इण्डियन संस्कृति का यह नजारा फ़िशिंग सीजन का कॉमन फैक्‍टर है। आज का दिन इसी फैक्‍टर वाला था। पर, उसने एक अन-कॉमन नजारा भी देख लिया। वह यह कि बाकी के सारे मछली-शिकारी तो पकड़ में आयी सारी मछलियों को एक ही टोकरे में डाल रहे थे लेकिन एक बन्दा कुछ को इधर और कुछ को उधर सहेज रहा था। शिद्दत से, न जाने क्या सोच कर और न जाने किस आधार पर। मेरे फ़्रैण्ड को लगा कि शायद उसे मछलियों की जातों में भेद करना आता होगा। इसलिए वह उसके कुछ ज्यादा ही पास चला गया। महज, कुछ सीखने नीयत से। लेकिन बीस कदमों की इस छोटी सी यात्रा ने इस बेहद आम आदमी को फ़िलॉसफ़र बनने की सड़क पर पटक दिया था।

उसने पाया कि दोनों ढेरों में रत्ती भर भी फ़र्क नहीं था। न साइज़ का, न रंग का और न डिजाइन का। उसने तो यहाँ तक दावा किया कि खोज करने बैठता तो सैक्स का अन्तर भी नहीं मिलता। गोया, दोनों ही ढेर एसॉर्टेड क्लासिफ़िकेशन के थे! फिर भी उसके एक्शन को देख कर लग यही रहा था कि हर मछली को इधर या उधर रखने से पहले वह अपनी बुद्धि का इस्तेमाल डेफ़िनेटली कर रहा था। मेरा दोस्त परेशान हो गया — जी किया कि पूछे कि क्या कर रहे हो? तभी, अकबर-बीरबल के उस मशहूर वाकये की याद ने उसे डरा दिया जिसमें अन्धों की बनायी अपनी इन्वेस्टिगेशन लिस्ट में बीरबल द्वारा अकबर को केवल इस कारण से टॉप पर रखने की बात की गयी है कि बीच चौराहे पर खाट बुनते बीरबल को देख कर अकबर हुजूर उससे पूछ बैठे थे कि तुम ये क्या कर रहे हो?

मुझसे रहा नहीं गया इसलिए पूछ बैठा कि इसमें उसके सोच को नई दिशा देने जैसा क्या था? जवाब में अपनी बात को समेटते हुए उसने अपने इस अनुभव को सीधे-सीधे देश के ताजे पॉलिटिकल सेनारियो से जोड़ दिया! उसने बतलाया कि उसकी पकड़ी मछलियों की दोनों ढेरियों में आम आदमी को कोई फ़र्क ठीक वैसे ही नहीं दिखेगा जैसे कि वह पॉलिटीशियन्स के अपने-अपने ग्रुप्स में बाकी के दूसरे ग्रुप्स से दिखलाये जा रहे डिफ़रेन्स को नहीं समझ पाता है। यों, इस फ़्रैण्ड को जानने वाले हर शख़्स की पहली प्रतिक्रिया मेरे जैसी ही होगी कि नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है। पर, फ़िलॉसफ़ी थी बड़े कमाल की। बात काला धन बटोरने की हो या फिर भ्रष्‍टाचार से कमाने या किसी पॉलिटिकल कम्पल्शन में उससे एडजस्टमेण्ट करने की। दिखलायी-बतलायी जाने वाली हर बात में, कन्सर्न इण्डिवीजुअल को देखते हुए, डिफ़रेन्स तो होता ही है — और कुछ नहीं तो, ‘मेरे’ और ‘तेरे’ वाला! होने को होता रहे देश का बेड़ा ग़र्क, ‘तेरे’ और ‘मेरे’ में है फ़ण्डामेण्टल फ़र्क!

अब डिफ़रेन्स पर मेरे इतना जोर देने से डिफ़रेण्ट किस्म का यह प्रोपेगेण्डा करने की जुर्रत मत कीजियेगा कि मेरी बातों पर कान देने से किसी कम्युनल कण्ट्रोवर्सी में बिंधने का जोखिम है। वर्ना मियां लालू, नहीं तो मैडम सुषमा या उस्ताद सिब्बल और नहीं तो, कम से कम, बेदी मैडम की तरह तो जरूर ही खुद लपेटे में आ जायेंगे। हाँ, यह सच है कि इन दिनों पॉल्टिक्स में डिफ़रेन्स को अण्डर-लाइन करके मिसयूज़ करने का बोल-बाला है — बहुत कुछ उसी शैली में जिसमें कहा जाता है कि ‘हम करें वो मल, तुम करो वो विष्‍टा!’ फिर भी, डिफ़रेण्ट रहेगा तो आखिरकार डिफ़रेण्ट ही।

(२३ नवम्बर २०११)