धत्‌ तेरे कन्फ़्यूजन की!

कन्फ़्यूजन पर कांग्रेस की बपौती नहीं है। बीजेपी की चार-दीवारी में घुसते ही लगेगा कि टक्कर बराबरी की है। और, ममता दीदी? एक कन्फ़्यूजन यह भी कि सियासती ताकतों के शोर ने अन्ना हजारे तक को कनफुजिया दिया है।

यों, बड़ा कॉमन सा फ़ैक्‍टर है लेकिन कमबख़्त है बड़ा शातिर। इतना कि इसकी आड़ में बड़े से बड़ा शातिर भी खुद का भोला और बेबसी का मारा हुआ बेचारा होना साबित कर देता है। इतना ही नहीं, इसके फेरे में आ जाए तो अच्छा-भला समझ-दार इन्सान तक खासा नमूना बन कर रह जाता है। साइण्टिफ़िकली चाहे कैसे भी एक्सप्लेन की जाती हो, मृग-मरीचिका असल में इसी की देन है। जी हाँ, प्राणी के जीवन-चरित को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले इस फ़ैक्‍टर का, आसान हिन्दी के लिए सरकार की सुझाई ताजा-तर डिक्शनरी में, मोस्ट पॉपुलर नाम है — कन्फ़्यूजन! एक बार कनफुजिया जाए तो इन्सान तो इन्सान, उसको नचाने वाली तुर्रम से तुर्रम ख़ुदाई ताकतें तक चुँधिया जाती हैं।

वैसे, यह कन्फ़्यूजन भी गजब का कन्फ़्यूजिंग आइटम है। पहला कन्फ़्यूजन अधिकतर तो इसी का होता है कि कोई इसलिए कन्फ़्यूज्ड हुआ कि उसे लगने लगा कि उसको सुर्खाब के पर जड़ दिये गये थे या इसलिए कि किसी टुकड़-खोर ने उसे भर दिया कि उसका जनम जिस घड़ी में हुआ था वह जातक को चक्रवर्त्ती बनाती ही बनाती है।

एक बात और। जनरली तो, छोटे और आम इन्सान का कन्फ़्यूजन केवल उसी के लिए जोखिम के दायरे खड़े करता है पर, बाई दफे, यह कन्फ़्यूजन ऐसे गिने-चुने दूसरे आम आदमियों को भी जख़्म दे सकता है जो उसके आस-पास हुआ करते हैं। लेकिन जब इस या उस कारण से कोई इन्सान कुछ खास ताकत जुटा लेता है और उसे कोई कन्फ़्यूजन भी हो जाए तब नतीजे बेहद ख़तरनाक तक हो सकते हैं। बल्कि, इतिहास के पन्नों में ताकतों की जुनूनी करतूतों को खँगालेंगे तो पता चलेगा कि, एक नहीं अनेक बार, हुए भी हैं। आधुनिक मनोविज्ञानियों को कुरेदेंगे तो वे इन्हें साइकिक या फिर व्हिम्ज़िकल ठहराने की इतनी वजहें परोस देंगे कि झोला भर जाए। यों, टेम्पररीली कन्फ़्यूज्ड होने वालों की भी अपनी अलहदा बिरादरी है लेकिन जानकारों का खयाल है कि इस तीसरी श्रेणी में महुआ-महारानी या उसके जैसी ही किसी दूसरी नशा-पत्ती के शिकार हुए इन्सान होते हैं। इन्हीं जानकारों की निगाह में, पहली श्रेणी के मरीज इतिहास के किस्सों में मुंगेरी और दूसरी श्रेणी के तुग़लक जैसे कैरेक्‍टर्स के खाकों में फिट होते हैं।

खुराफ़ाती नजरिये से देखने लगें तो आपको लगेगा जैसे मेरी बातों की हवा सियासती रुख ले रही है। इसमें आपका कोई फ़ाल्‍ट नहीं है। दरअसल, देश-दुनिया के लीडरान से जुड़ी सुर्खियों की जितनी वेरायटीज़ रोज-ब-रोज देखने-सुनने में आने लगी हैं उनका ऐसा कन्फ़्यूजिंग कन्क्‍लूजन लॉजिकल है। जैसे, यूपी के भदोई में बाबा गांधी ने जब भीड़ से यह सवाल कर डाला कि क्या उसे प्रदेश की बदहाली पर गुस्सा नहीं आता है तो इसे प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग की चुनावी हुंकार के रूप में नेशन-वाइड सुर्खी मिली। लोग कनफुजिया गये — अमूल बेबी लोगों की डेमोक्रेटिक सहन-शीलता पर अपने बाल नोच रहे थे या बेबस मत-दाता पर तरस खाने की आड़ में उन्हें भड़का रहे थे? कन्फ़्यूजन इसलिए कि यदि पहली बात ठीक थी तो इसका मतलब निकलेगा कि उन्होंने अपने पर आस लगाये बैठे घाघ कांग्रेसियों को क्लियर किया था कि उन्होंने एक कमजोर घोड़े पर दाँव लगाया है — अभी तक पॉलिटिकल मेच्योरिटी ने उन्हें छुआ भी नहीं है। और यदि, दूसरी बात ठीक थी तो इसका मतलब यह था कि उन्होंने अपनी दादी की उस डेमोक्रेटिक समझ-दारी पर बिल्कुल सीधा वार कर दिया है जिसके होते हुए उस डेमोक्रेटिक तानाशाह ने जेपी के छेड़े आन्दोलन को देश-द्रोह के अपराध के दायरे में ढकेल कर इमर्जेन्सी थोपी दी थी।

और हाँ, कन्फ़्यूजन पर कांग्रेस की कोई बपौती नहीं है। एसपी हो, बीएसपी हो, राजद हो, जेडी हो या फिर बीजेपी; इनकी चार-दीवारी में घुसते ही लगेगा कि सभी में बराबरी की टक्कर है। सामाजिक सरोकारों और मूल्‍यों जैसे बेसिक नेशनल इश्यूज़ पर इनमें अन्तर कर पाना भुस के ढेर में से गुम हुई सुई ढूँढ़ लेने जैसी ही फतह होगी। वैसे, घुसने वाला कांग्रेसी खेमे से सहानुभूति रहने वाला हुआ तो लौट कर यह कहेगा जरूर कि कांग्रेस में इस मुद्दे पर तो कोई असमंजस नहीं है कि उनका आज का, और कल का भी, असली आका कौन है जबकि बीजेपी में तो इतनी फण्डामेण्टल क्लियरिटी भी नहीं है! और, बेचारी ममता दीदी? चुनावों से पहले माओ-वादियों के साथ खड़ी हुईं पर सीएम बनते ही अब उन मिलिटरी एक्शन की धमकियाँ देने लगी हैं। यों, आम जनता भले कुछ और सोचती हो पर गहरी पैठ रखने वालों का खयाल है कि कमोबेस सारी सियासती ताकतों के मचाए शोर ने अन्ना तक को कनफुजिया दिया है। क्योंकि बात आपको पचेगी नहीं इसीलिए पूछने की जुर्रत करता हूँ कि क्या आपने इसी हफ़्ते सुर्खियों में आयी वह हैड-लाइन नहीं देखी कि बेदी और केजरीवाल पर लगाये गये आरोपों की जाँच के लिए अन्ना रिटायर हो चुके जजों से सम्पर्क कर रहे हैं?

ऐसा भी नहीं कि ऐसी सुखियाँ हाल-फिलहाल ही शुरू हुई हैं लेकिन इनकी ऐसी बहुतायत, और एक्रॉस द पार्टी लाइन एक-रूपता, जरूर अकबका देती है। इसका मतलब यह भी नहीं कि पढ़े-लिखे लोगों को कोई कन्फ़्यूजन नहीं होता। जान-लेवा बीमारियों के इलाज के लिए एवरी नाऊ एण्ड दैन नयी-नयी खोज करते साइन्स-दानों की ही लें। बीते पचास सालों में कितने तो दावे ठोंके गये। कभी वैक्‍टीरिया, कभी वायरस और कभी-कभी तो कीटों तक के टोटल खात्मे के! पर क्या अकेले मच्छर तक का नामो-निशां मिटा? ऐसे ही, कभी प्रिवेण्टिव तो कभी प्रोटेक्टिव वैक्सीन्स और अक्सर ही शर्तिया इलाज वाली दवाओं के क्लेम्स किये गये! पर नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा। यह ध्यान इसलिए आया कि परसों-तरसों ही नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मलेरिया रिसर्च ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी कॉम्बिनेशनल ड्रग ईजाद कर ली है जो मलेरिया को तीन दिन में ‘छू मन्तर’ कर देगी!

(१३ नवम्बर २०११)