आर या पार : कौन किस पार?

जमाना यह आ गया है कि सब कुछ एक कॉम्पिटीशन होकर रह गया है जिसमें आर-पार की लड़ाई का दम्भ दिखलाना तो हर कोई चाहता है लेकिन वह इस सचाई को छिपाए भी रखना चाहता है कि वह असल में है किस पार?

कॉम्पिटीशन कैसा भी हो — पॉलिटिकल, कॉमर्शियल, स्पिरिचुअल, एजुकेशनल या फिर स्पोर्ट्स। कहना गलत नहीं होगा कि ‘आर या पार’ विकास की अन्धा-धुन्ध दौड़ का सबसे जबरदस्त प्‍ले-कार्ड बन गया है। नैतिकता न जाने कब इतनी पीछे छूट गयी कि उसकी बात करने से पहले सौ बार सोचा जाने लगा है — उसका दामन छूने भर से ‘शेम-शेम’ फील होने का डर समा जाता है। खुद-ब-खुद भले न हो, फील कराये जाने के मास-प्रैशर का माहौल तो बन ही गया है।

मुझसे डिसएग्री करने वालों की शक़्लें देख कर बता सकता हूँ कि वे सोच रहे हैं कि मेरी यह बात या तो ‘बेशर्मी मोर्चा’ या फिर उस पर हुए उन ‘नेचुरल आर्थोडॉक्स रिएक्शन्स’ की तरह है जो महज पानी के बुलबुले जितना जीवन लेकर उपजते हैं। लेकिन मैंने ठान रखा है कि एग्ज़ाम्पिल बाई एग्ज़ाम्पिल इन सब की अक़्लों को ठिकाने लगा कर ही चैन लूँगा। यों, यह मंजूर करने में कोताही नहीं करूँगा कि मेरी रखी बातों में मुझसे ज्यादा इनके बतलाने वालों का काण्ट्रिब्यूशन है। बट एग्ज़ापिल्स आर एग्ज़ाम्पिल्स, एनी वे! मुलाहजा फ़रमायें —

खबर है कि असेम्बली के गरमा-गरम विण्टर सेशन में माननीयों के बीच जूतम-पैजार होने के ढेरों कारण मौजूद थे। बिजनेस अवर्स में सुबह से ही ठसाठस भर चुकी प्रैस गैलरी चुगली खा रही थी कि ऐसे माहौल का लुत्फ़ उठाने के माहिर खबर-नबीस हर घटना, हर शब्द को लपकने तैयार थे। नो डाउट, सियासती जरूरतों के मद्देनजर असेम्बली गर्मायी जरूर थी लेकिन, जैसा कि इण्डियन पॉलिटीशियन्स के बारे में आम फ़हम है, दोनों तरफ की बैंचों ने खुले खजाने मिली-भगत करके खबर-नबीसों को बेइन्तिहा निराश किया। लिहाजा, फ्रस्टेट हुए मीडिया पर्सन्स लंच अवर में खुद ही बातों की जूतम-पैजार में जुट गये। असेम्बली हॉल से मिली निराशा के माहौल का रंग इन पर इस कदर चढ़ चुका था कि अपने-अपने आकाओं के इण्टरेस्ट्स के हिसाब से ये खुद ही गुटों में बँट गये थे। इस कदर कि कोई भी कह बैठे जैसे मच्छी बाजार अपने पूरे शबाब पर पहुँच गया हो!

मच्छी बाजार से याद आया। अपने माल को सबसे बेहतर बतला कर पहले-पहल बेच लेना ही समझ-दारी मानी जाती है। बाजार कोई हो यह एप्रोच बड़ी कॉमन है। हाँ, सब्जी और मच्छी बाजारों के लिए ज्यादा खास जरूर है। वह इसलिए कि अनबिके माल को अगले दिन यहाँ कोई खरीद-दार नहीं पूछता। बासा होने से खराब जो जाता है। वैसे, भरोसे के अलावा इसकी गरण्टी नहीं होती कि ताजा कह कर बेचा गया माल परफेक्‍ट सेफ है। बिल्कुल पॉलिटिकल एश्योरेन्सेज़ की तरह। खास कर उनकी तरह जो महज वोट कबाड़ने की नीयत से परोसे जाते हैं। इनकी कोई गारण्टी नहीं होती। न किसी कोर्ट में और न किसी कन्ज्यूमर फोरम में। ये वायदे जब किये जाते हैं तो बड़े अपीलिंग होते हैं लेकिन वोटिंग का दिन बीतते न बीतते इनकी पोल खुलने लगती है। अब तो डिटेरियोरेशन इतना हाई हो चुका है कि इलेक्शन्स से कतई अनरिलेटेड समय में भी एकदम झूठे एश्योरेन्सेज़ दे दिये जाते हैं।

उस दिन भी अपोजीशन के मोहरे बन चुके बन्दों ने मँहगाई कम होने और देश की माली हालत जल्दी ही सुधार लेने की रूलिंग कोलीजन की शपथों का मजाक बनाया। इस पर रूलिंग बेंच से ओबेलाइज़्ड बन्दे इकॉनॉमिक ग्रोथ के बड़े ही घाल-मेल वाले उस फण्डे को समझाने के लिए निहायत अर्थशास्‍त्रीय डिक्शनरी के पन्ने खोलने बैठ गये जो कहता है कि विकास के साथ मँहगाई तो बढ़ती ही है। तब कुछ सूझ न पड़ने से परेशान हुए किसी इनडिफ़रेण्ट किस्म के जर्नलिस्ट ने अनशन को छुड़वाने के लिए हजारे को दिये गये झूठे प्रॉमिस की ओर अपनी उँगली तान दी। जैसे यही काफ़ी न हो, बहती गंगा में हाथ धोते हुए उसने सामने आये हिसार के इलेक्शन रिजल्ट को लहराते हुए वार्निंग भी दे डाली। बहस ज्यों-ज्यों सब्सटेन्शियल हुई त्यों-त्यों तीखी भी हो गयी। लगा जैसे उँगली सीधे रूलिंग कैम्प के ओंठों पर जाकर चिपक गयी हो, वहाँ एक डर सा समा गया हो। मौके का फायदा उठाते हुए, खुद भी डर गये, भगवा बैनर वाले अखबार-बाजों ने जब पॉलिटिकल प्रॉमिस की इस बेहूदा बहस को ठण्डे बस्ते में डालने की कोशिश की तो बड़ी कूल सी पॉलिटिकल साजिश के साथ सारे के सारे सैक्युलर खबर-नबीस उनके साथ हो लिए।

झूठे प्रॉमिसों का मुद्दा तो छूट गया लेकिन उस उँगली से दिल के भीतर तक जख़्मी हो चुके लोगों ने आपसी बहस को संयमित भाषा में ही सीमित रखने की गुहार की। लहजा बिल्कुल वैसा ही था जैसा तब महसूस किया गया था जब अपनी जन-चेतना यात्रा के दौरान आडवानी ने कह दिया था कि ‘दार जी तो देवगौड़ा और चन्द्रशेखर तक से कमजोर पीएम हैं। तब देवगौड़ा ने नहीं, मनमोहन ने आडवानी को समझाइश दी थी कि वे संयमित भाषा का उपयोग करें! तभी लंच अवर खत्म हो गया। और इस तरह, ‘पॉलिटिकल संयम’ का मुद्दा आधा-अधूरा ही छूट गया। विद आल दि ग्रेस, एकदम पीस फुली!

मेरा एक दोस्त, जो इस पूरे लंच-वाकये का चश्मदीद था आधे-अधूरे मनोरंजन के इस सदमे से अपना आपा खो चुका था, अपनी भड़ास निकालने मेरे सिर पर सवार हो गया। या यों कहूँ कि खुद भी आर-पार के खेल में फँस गया था। यह सही है कि उसका पेट वहाँ भरा नहीं था सो मुझसे ही सवाल-जवाब करने लगा। पर बातों ही बातों में उसने एक बड़े मार्के की बात की। बोला, बापू के जमाने में खुले विरोध के बाद भी लोग साथ-साथ बैठते-सोचते थे। फिर, नेहरू के जमाने में वैचारिक टूटन आने पर छिटक कर सीसे की तरह अलहदा टुकड़े होने लगे। लेकिन अब जमाना यह आ गया है कि छिटकना और छिटक कर फिर से जुड़ जाना पॉलिटिकल कम्पल्सन्स के हिसाब से तय होता है। गोया, सब कुछ एक कॉम्पिटीशन होकर रह गया है जिसमें आर-पार की लड़ाई का दम्भ दिखलाना तो हर कोई चाहता है लेकिन वह इस सचाई को छिपाए भी रखना चाहता है कि वह असल में है किस पार?

(२० नवम्बर २०११)