मेरी मुर्गी की डेढ़ टाँग!

पोप बेनेडिक्‍ट सोलहवें को इमाम के होठों का चुम्बन लेते दिखलाया गया था और हिन्दू-मुसलमानों को सेक्युलरिज़्म का पाठ पढ़ाने वाली वेस्टर्न दुनिया को पोप की फोटो का ऐसा अनअथोराइज़्ड इस्तेमाल नागवार गुजरा था।

यों, मुहावरा बड़ा पुराना है — मेरी मुर्गी की डेढ़ टाँग! हर कभी इस्तेमाल में भी आता रहता है। लेकिन कोई नहीं बता पाता कि इसकी शुरूआत कब हुई? किसने की? और किस तरह हुई?

अब आप पूछेंगे ही कि गड़ा मुर्दा उखाड़ने का यह चस्का मुझे अचानक क्यों आ लगा? आपका अचरज जायज भी है। पढ़ाई के दिनों में इतिहास और आर्कियालॉजी मुझे छठी का दूध याद दिलाती रहती थीं। इनमें मैंने कभी पासिंग मार्क्स से एक नम्बर भी ज्यादा नहीं पाया। खैर, यह एकदम निजी बातें हैं। और शायद आपको याद हो, देश की सबसे पॉवर-फुल पॉलिटिकल मोहतरमा के अमरीकी इलाज पर बरती गयी खासी सीक्रेसी के सवाल पर चमचों की पूरी फौज ने देश-दुनिया को यूनानिमसली ताक़ीद किया था कि किसी की निजी बातों पर खोज-बीन करने की मनाही है।

फिर भी सब जानते हैं कि, अटकी में, कांग्रेस अपनी टॉप लीडर-शिप की पर्सनल से पर्सनल डिटेल्स तक रिलीज़ कर देती है। ताजा उदाहरण है कि यूपी के चुनावों के मद्देनजर एक पोस्टर रातों-रात चिपकाया गया। यों, सब्जैक्‍ट मैटर निहायत पर्सनल था फिर भी पोस्टर में शोभा पा गया। नारे की भाषा कुछ यों थी — माँ बीमार, सरकार लाचार; राहुल जी करो नेतृत्व स्वीकार! इसीलिए, अपना यह पर्सनल मसला आपसे शेयर कर रहा हूँ।

बीती रात मेरा एक दिल-अजीज घर धमक गया जो दिल-जले के तख़ल्लुस से जाना जाता है। एण्ट्री क्लासिकल थी। आते ही शुरू हो गया — बीते कुछ दिनों ने मेरे इस कन्सैप्‍ट को हिला कर रख दिया है कि जब तक किसी इकलौती मुर्गी की टाँगें ‘टू माइनस हाफ़’ रहेंगी तभी तक ‘मेरी मुर्गी की डेढ़ टाँग’ वाले मुहावरे में पुराना ग्रेस रहेगा। बरसों पुराने फौजदारी के मुकदमे की वह कहानी तो सुनी ही होगी जिसने पागल के दिये डायलॉग से एक नये मुहावरे को जन्म दे दिया था — मोहल्ले में एक ही रहेगा। गोया, ख़ुदा न खस्ता, एक पीरियड में एक से ज्यादा ऐसी मुर्गियाँ पायी जाने लगें तो दावों का ऐसा खूनी कन्फ़्लिक्‍ट शुरू हो जायेगा कि लोग हमारे सांस्कृतिक मुहावरों, उलाहनों और सुभाषितों के लालित्य पर से भरोसा खो देंगे।

जैसे, इतना ही काफ़ी न हुआ हो। उसकी अन-वारण्टेड फ़िलॉसफ़ी जारी रही। बोला, इस तरह से तो हमारे देशी शब्द-कोष में अचानक ही वीरानगी छा जायेगी। सन्नाटा पसर जायेगा। और तब, जरूरी मुहावरे और सुभाषित फ़ॉरेन से इम्पोर्ट करने पड़ेंगे। ठीक वैसे ही जैसे सरकार ने तब किया था जब अनाज-दाल और फल-सब्जी के हमारे पुश्तैनी बीज-भण्डार निपटने लगे थे।

मैंने सोचा नहीं था कि मामला इतना सीरियस टर्न लेगा। अपनों के बीच जल-कुकड़े के रूप में फ़ेमस मेरा यह दोस्त ऐसे सोशल मुद्दों पर सीरियस होने वाला बन्दा नहीं था। सो, हैरानी से फट पड़ी अपनी आँखों पर मेरा कोई कण्ट्रोल नहीं चला। वह भी मेरी परेशानी ताड़ गया। शायद इसीलिए दिल ही दिल में चाहे जितना खुश हुआ हो, दोस्ती की खातिर पसीज गया। बोला, देश में अपनी-अपनी मुर्गी की डेढ़ टाँगें होने के दावे रोज-मर्रा ठुकने लगे हैं। बीमारी इस कदर फैल चुकी है कि पॉलिटिकल पार्टीज़ अपने गठबन्धन तक का लिहाज नहीं कर रही हैं। आपस में ही क्लेम और काउण्टर क्लेम ठोके जा रहे हैं। हाँ, ग़नीमत है कि डेमोक्रेटिक कोलीजन की मजबूरियों का लिहाज कर सवा या पौने दो टाँगों वाली मुर्गी होने के दावों जैसी आपसी तकरार अभी तक नहीं हुई। अपनी बात को उसने एग्ज़ाम्पिल बाई एग्ज़ाम्पिल समझाया। यों, समझाया तो बहुत कुछ पर आपको निहायत ब्रीफ़ में बतलाता हूँ —

टीएमसी जैसी एक निहायत रीजनल पार्टी की चीफ़ ममता ने ऐसा एक भी मौका गँवाना पसन्द नहीं किया जब वे अपनी पॉलिटिकल एलाई कांग्रेस को दिखा पायें कि उसकी नहीं बल्कि उनकी अपनी मुर्गी डेढ़ टाँगों वाली है। मजा यह कि, ले-देकर ही सही, ममता का स्टैण्ड ही विनर रहा। इसके उलट, ऐसा लगने लगा है कि मुर्गियों के इस शो-ऑफ़ में एक समय तक गेनर रहती आई मायावती और उनकी, आलमोस्ट आलवेज़ लूजर, स्ट्रेटेजिक एलाई कांग्रेस में खन्दक की लड़ाई में छिड़ गयी है। इलेक्शम ने दोनों के बीच चला आ रहा लम्बा और पीस-फुल ईक्विलिब्रियम बिगाड़ दिया है।

इलेक्शन से याद आया। यह केवल एलाई ईक्विलिब्रियम ही नहीं बिगाड़ता बल्कि कम्युनल हार्मोनी भी निपटा कर रख देता है। लहजा वही ‘मुर्गी की डेढ़ टाँग’ वाला होता है। उनके अपने सद्‍भावना-उपवास में मोदी को टोपी पहनाने की असफल कोशिश के बाद मीडिया में प्लाण्ट हुई ‘कम्युनल स्टोरीज़’ के जवाब में एक दूसरी स्टोरी चली। इसने बतलाया कि कैसे दशहरे के दिन रावण-दहन के समय सोनिया और ’दार जी दोनों मौजूद थे। एक को राम का तिलक तो दूसरे को रावण-दहन करना था। सोनिया ने रावण-दहन को चुना। सवाल उठाए गये कि उन्होंने राम का तिलक क्यों नहीं किया?

मीडिया-कैम्पेन से ध्यान आया। इतालवी कपड़ा कम्पनी बेनेटन ने एक एड जारी किया था। ‘अनहेट’ नाम से जारी हुए इस कैम्पेन की बड़ी हेटी हुई। इसे वापिस लेना पड़ा। कारण? एड में पोप बेनेडिक्‍ट सोलहवें को एक इमाम के होठों का चुम्बन लेते दिखलाया गया था और हिन्दू-मुसलमानों को सेक्युलरिज़्म का पाठ पढ़ाने वाली वेस्टर्न दुनिया को पोप की फोटो का ऐसा अनअथोराइज़्ड इस्तेमाल कतई नागवार गुजरा था। वह केवल इसलिए कि, इस दुनिया के प्रवक्‍ता के अनुसार, ‘अनहेट’ ने धार्मिक लोगों की भावनाओं को ठोस पहुँचायी थी!

(२७ नवम्बर २०११)