थप्पड़ का आक्रोष

थप्पड़ से आक्रोषित होकर इस तरह एक-जुट प्रतिक्रिया देना लोक-तान्त्रिक संकट का तत्व-परक हल नहीं है। ऐसे जमीनी उपाय ढूँढ़ने होंगे जो जन-आक्रोष को इतना ठण्डा करें कि ताजी घटना अपने किस्म की अन्तिम हो जाए।

आखिर वह हो ही गया जिसकी आशंका दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। यह ऐतिहासिक तथ्य एक बार नये सिरे से स्थापित हुआ कि धीरज को अनन्त काल तक लगातार परखते जाना कितना घातक होता है? बेलाग बोलने के लिए जाने जाते मेरे एक वरिष्‍ठ पत्रकार मित्र का कहना है कि उन्हें तो बीते दस सालों से अधिक समय से ऐसी किसी घटना के होने की सम्भावना दिख रही थी। उनके शब्दों में, यह तो भारतीय जन-मानस का धीरज था जिसने जन-असन्‍तोष के ऐसे सम्भावित विस्फोट को अभी तक टाले रखा था।

बीती २४ नवम्बर को एक आम नागरिक ने एक वरिष्‍ठ केन्द्रीय मन्त्री के गाल पर खुले आम थप्पड़ जड़ दिया। वह भी देश की राजधानी में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में। जैसे इतना ही पर्याप्‍त न हुआ हो, अकेले उस मन्त्री तथा केन्द्रीय सरकार की ही नहीं बल्कि सारी की सारी राजनैतिक जमात की भी यह विवशता जग-जाहिर हो गयी कि वह ऐसी घटना की बातूनी निन्दा करने से आगे जाकर सम्बन्धित व्यक्‍ति पर बिल्कुल सटीक कानूनी कार्यवाही का जोर लगाने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है।

अपने साथ घटी इस घटना के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में शरद पवार ने कहा कि हमलावर का हाथ उनके गाल को छूकर निकल गया था। इससे हटकर उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने मीडिया से बात करते हुए यह कहा कि क्योंकि थप्पड़ का वार पवार के उस गाल पर पड़ा था जो पहले से ही हुई गम्भीर शल्य-क्रिया से नाजुक अवस्था में है, उनकी पहली चिन्ता यही है कि वे यह देखें कि उनके पिता को कुछ गम्भीर चोट तो नहीं पहुँची है। लेकिन, पिता और पुत्री दोनों ही घटना को तूल देने से परहेज करने की सलाह देने पर एक-मत थे।

ऐसे में यह खबर भी बहुत महत्व की है कि आटो-ड्राइवर हरविन्दर पर कनॉट प्लेस थाने में आत्म-हत्या का प्रयास करने, सरकारी व्यक्‍ति पर हमला करने और जान से मारने की धमकी देने के मामले दर्ज किये गये। यह अलग बात है कि उस घटना की वास्तविक फ़ुटेज देख चुके नागरिक दर्ज किये गये प्रकरण के स्वरूप और उसकी सम्भावित न्यायिक परिणति को लेकर अचम्भित हैं। उनके इस अचम्भे के पीछे हरविन्दर से जुड़े इस सच का भी बड़ा हाथ है कि कुछ दिन पहले ही उसने दिल्ली की एक अदालत के परिसर में पूर्व केन्द्रीय संचार मन्त्री सुखराम पर तब हमला किया था जब अदालत ने बरसों से चल रहे एक घोटाले के लिए उन्हें दोषी ठहराया था।

यद्यपि, दोनों मामलों में एक बारीक गुणात्मक अन्तर भी है — तब सुखराम ने उसे ‘क्षमा’ कर दिया था और कानून की रखवाली किसी भी सरकारी व्यवस्था ने इस क्षमा-प्रदान पर सार्वजनिक रूप से उठ खड़ा हुआ कानून और व्यवस्था से जुड़ा कोई सवाल नहीं खड़ा किया था। तब हरविन्दर पर कोई प्रकरण कायम नहीं किया गया था। दोनों घटनाओं की अन्तिम परिणतियों के बीच के इसी अन्तर ने ऐसे आधार-भूत परिदृष्य का निर्माण कर दिया है जिसकी ईमान-दार विवेचना जितनी त्वरित होगी देश के लोक-तन्त्रिक स्वास्थ्य की कसमें उतनी ही अधिक विश्‍वसनीयता से खाई जा सकेंगी। प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, इस जिम्मेदारी के निर्वाह में किसी भी टाल-मटोल का अर्थ केवल और केवल यही होगा कि देश तमाम अवांछित अन-होनियों को आहूत करने को तत्पर है।

इस जिम्मेदारी के निर्वाह का सबसे पहला कदम यही है कि किसी भी समीक्षा के बीच केवल परिस्थिति-जन्य तथ्यों को ही केन्द्र में रखा जाए, व्यक्‍ति-विशेषों को नहीं। यों, राज-नेताओं के बीच दिखाई देती कथित एक-जुटता से यह भ्रम फैलते दिखेगा कि राजनैतिक दल वैयक्‍तिक हितों से ऊपर उठ कर सोच रहे हैं। लेकिन तथ्य बिल्कुल उल्टा है। इसे इस तरह से देखें कि असल अर्थ में तो, महज अपने-अपने निहित हितों को सुरक्षित रखने के लिए ही, राजनैतिक पटल पर सक्रिय देश की तमाम ताकतें पार्टी-बाजी को दर-किनार करते हुए, अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं और प्रतिस्पर्धाओं को दर-किनार कर, अचानक ही गोल-बन्द हो गयी हैं। ऐसे दु:साध्य को भी साध लेना इन सबके लिए इतनी आसानी से इसलिए सम्भव हो पाया है क्योंकि बीते सालों में भारत के कुटिल राज-नेताओं ने इसमें महारत हासिल कर ली है कि वे अपने-अपने बेहद वैयक्‍तिक हितों को पार्टी-हित के रूप में दिखा सकें। अपनी इसी कुटिलता के सहारे इनके लिए आसान हो जाता है कि, चुनाव की घड़ियों में, अपने पार्टी-हित को देश के व्यापक हित के रूप में प्रचारित कर सकें।

पवार के साथ घटी घटना की कोई समीक्षा तभी सार्थक हो सकेगी जब वह लोक-तान्त्रिक राजनीति में अपनी जड़ बड़ी गहराई तक जमा चुके इसी दोष को केन्द्र में रखे। इसका बिल्कुल सहज तरीका यह है कि २४ नवम्बर की घटना को ‘पवार-तत्व’ से कतई मुक्‍त करके तौला जाए। यों, तमाम राज-नेता इस सचाई को झुठलाने की कोशिश करते मिल जायेंगे किन्तु, दुर्भाग्य से, यह होता दिख नहीं रहा है। राजनीतिज्ञों के इस कपट को पकड़ने के दो आसान आधार हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि घटना के इतने दिन बीत जाने के बाद भी पवार नाम के ‘पीड़ित’ व्यक्‍ति ने किसी भी प्रकार की कोई औपचारिक आपराधिक प्रथम सूचना दर्ज नहीं करायी फिर भी, हमलावर को सबक सिखलाने की नीयत से, पुलिस ने उसके ऊपर छद्म अपराधों के दायरे में प्रकरण दर्ज कर अपनी औपचारिक कार्यवाही शुरू कर दी है। दिन-प्रतिदिन घटते, कहीं अधिक गम्भीर, अपराध की घटनाओं पर गहरी चुप्पी साधे बैठने के असंख्य आरोपों से घिरी दिल्ली पुलिस की यह तत्‍परता अपने आप में भी अनेक गम्भीर सवालों से घिर गयी है। दूसरी बात यह कि एक ही आरोपी की लिप्‍तता के बाद भी एक ही शहर में घटी समान चरित्र की दो घटनाओं में अन्तर किया गया है। और, ऐसा करते समय केवल और केवल सुखराम और पवार की अपनी-अपनी वर्तमान हैसियतों के अन्तर की राजनैतिक बारीकी को ध्यान में रखा गया है।

घटना को लेकर संसद में हुए हो-हल्ले को भी इसी राजनैतिक बारीकी से तौलना होगा। यों, ऐसा करने में कोई व्यापक हिचक नहीं होनी चाहिए फिर भी, यदि किसी को इस दृष्‍टि-कोण में किसी गहरे षडयन्त्र की बू आती हो उसे, अपने जमीर की गहराई में उतर कर, उस न्यायिक टिप्पणी की गम्भीरता पर कम से कम एक बार तो विचार करना ही चाहिए जो २५ नवम्बर को २जी स्पैक्‍ट्रम घोटाले में जारी आपराधिक मामले में सामने आयी है। खबरें बतलाती हैं कि जब दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रस्तुत हुई जमानत-याचिका पर अपनी मुवक्किल कनिमोझी और मोरानी की ओर से बहस करते हुए पूर्व अतिरिक्‍त सॉलिसिटर जनरल अल्ताफ़ अहमद और वरिष्‍ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने जब यह दलील दी कि उनके मुवक्किलों की हैसियत उन पाँच सह आरोपियों से ऊँची है जिन्हें न्यायालय द्वारा जमानत दी जा चुकी है तब न्यायाधीश ने उन्हें सचेत किया कि वे ऐसी कोई दलील न दें जो यह सन्देश देती दिखे कि उनके मुवक्किल आम आदमी से अधिक ताकत-वर और प्रभावी हैं।

इस या उस निहित स्वार्थ की छाया से बाहर निकल कर देखेंगे तो स्वयं राजनीतिज्ञ भी समझ सकेंगे कि दिल्ली उच्च न्यायालय से आई उपरोक्‍त टिप्पणी कोई इकलौती न्यायिक घटना नहीं है। इससे पहले भी न्याय-मन्दिर से ऐसी टिप्पणियों की घण्टियाँ बज चुकी हैं। कई बार तो उनमें ‘सुधर जाओ अन्यथा…’ जैसी चेतावनियाँ तक निहित रही हैं। राज-नेता और उनकी पिछलग्गू कार्य-पालिका कह सकती है कि न्याय-पालिका में, बार-बार, संविधान में अपने लिए खिंची लक्ष्‍मण रेखा से बाहर आने का जोखिम उठाने की प्रवृत्ति पनप रही है। वहीं दूसरी ओर आम नागरिक के मन में यह सुनामी लहरें रोके नहीं रुक रही हैं कि कार्य-पालिका इस सीमा तक स्वार्थ-लिप्‍त होती जा रही है कि न्याय-पालिका अपने सक्रिय हस्तक्षेप की भूमिका से मुँह फेर कर बैठे नहीं रह सकती है। इस सबके बीच जस्टिस सेन जैसे वे प्रकरण भी हैं जो चीख-चीख कर यह उँगली तान रहे हैं कि कुछ तो गड़-बड़ है!

गम्भीर से गम्भीर सवाल को, ले-देकर, गलीचे के नीचे दबाने के माहिर राज-नेता और उनके पिछलग्गू जस्टिस सेन के इस उल्लेख पर अपनी बेतुकी उछल-कूद चालू करें इससे पहले बात स्पष्‍ट किये देता हूँ। हाँ, इसे समझने के लिए संसद्‌ में महाअभियोग की अन्तिम परिणति की जमीनी समझ पहली शर्त है। राज्य-सभा महाअभियोग के प्रस्ताव को पारित कर चुकी थी। ऐसा करने की प्रक्रिया में सदन ने न्यायाधीश महोदय द्वारा दी गयी सफाई को सिरे से नकार दिया था। लोक-सभा में विचार की तिथि भी नियत हो गयी थी। और, परिस्थितियाँ बतला रही थीं कि इस सदन में भी उच्च सदन की कहानी दुहराई जाने वाली थी। तभी, अचानक ही, उन्होंने अपने त्याग-पत्र का चातुरी से भरा अपना पाँसा फेक दिया।

इस स्थिति में सरकार के सामने वैधानिक रूप से स्वीकार्य दो विकल्प थे। पहला यह कि वह, महज कानूनी चतुराई से प्रस्तुत हुए, पद-त्याग के रणनैतिक आवेदन की उपेक्षा करे और सदन की पूर्व-निर्धारित कार्यवाही को आगे बढ़ाए। दूसरा यह कि वह, कलंकित हो चुके, न्यायाधीश महोदय के त्याग-पत्र को स्वीकार कर लेने की अपनी मन्त्रि-परिषदीय सलाह राष्‍ट्रपति को भेज दे। लोक-तन्त्र की गुणावत्ता पर ही अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तत्पर प्रत्येक जानकार नागरिक को अपेक्षा थी कि सरकार पहले विकल्प को चुनेगी। सोच यह था कि ऐसा करके केन्द्रीय मन्त्रि-परिषद्‌ एक स्वच्छ, पार-दर्शी और किसी भी तरह के भ्रष्‍ट आचरण से कतई मुक्‍त तन्त्र की स्थापना में ऐतिहासिक योगदान करेगी। किन्तु, सरकार ने त्याग-पत्र को स्वीकार लेने वाला लोक-तन्त्र हन्ता विकल्प चुना। कसौटी की सी हैसियत वाले, आधार-भूत लेकिन विरलों में भी विरलतम्‌, महाअभियोग के इस प्रावधान को घसीट कर लाचारी के किसी गुम-नाम कोने में पटक देने वाले, और इस तरह लोक-तन्त्र की गुणवत्ता को गम्भीर रूप से आहत करने वाले भी, इस घटना-क्रम में पर्दे के पीछे छिपा यह तथ्य भी बहुत महत्व का है कि त्याग-पत्र की प्रस्तुति से लेकर राष्‍ट्रपति को अनुशंसा प्रेषित किये जाने की समूची प्रक्रिया तक का अधिकांश, सामान्य कार्यालयीन कार्यावधि की निहित-स्वार्थी अन-देखी करते हुए, ओवर टाइम में पूरा किया गया। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में, यदि किसी के मन में यह सवाल अंकुरित हो जाए कि भीतर ही भीतर कुछ न कुछ गहरी निहित-स्वार्थी सौदे-बाजी हुई हो सकती है तो सुधी नागरिकों को इस पर अचरज नहीं होगा।

इन और इन जैसी अन्य ढेरों बातों से साफ है कि स्वयं के लिए किये जाने वाले ‘माननीय’ जैसे विशिष्‍टता-बोधी सम्बोधनों से फूल कर कुप्पा होते गिनती के कुछ व्यक्‍ति इतने भ्रमित हो चुके हैं कि आये दिन ‘मेरे साथ तक’ जैसे मदान्ध तर्कों को देने को उद्यत रहते हैं। ऐसा करते-करते उन्होंने हर उस वैचारिक-दार्शनिक समझाइश से अपनी आँखें मूँद रखी हैं जो लोक-तन्त्र की समझ को किसी भी भ्रम से मुक्‍त रख सकती थी। उन्होंने विवशता-जनित उन न्यायिक टिप्पणियों की खुली अवहेलना करते रहने में भी कोई कोताही नहीं की जो इन स्थितियों में लोक-तन्त्र को पटरी पर वापस लाने के, सीमित ही सही, शेष बचे अवसरों को भुना लेने के प्रति सचेत कर रही थीं।

क्योंकि ऐसा नहीं हो पाया, २४ नवम्बर की वह घटना घट गयी। घटना के तुरन्त बाद पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर हजारे की त्वरित टिप्पणी, “एक ही मारा?” को इसी दृष्‍टिकोण से देखना चाहिए। तब मौजूद पत्रकारों के बीच अनायास फूटी हँसी की फुहार पर मेरे उसी पत्रकार मित्र ने जो कहा वह गहरा और अर्थ-पूर्ण है। उसका कहना था कि पत्रकारों की वह हँसी हजारे के कथन का मजाक बनाने की नीयत से प्रेरित नहीं थी। इससे उलट उस हँसी में केवल और केवल मीडिया का यह भाव निहित था  कि बरसों बाद देश को सार्वजनिक जीवन जी रहा ऐसा एक बन्दा तो मिला जो आम नागरिक के अन्तर्मन को इतनी बेबाकी से व्यक्‍त करने की हिम्मत रखता है। लेकिन दुर्भाग्य से, अन्ना हजारे घटना को व्यक्‍ति-निष्‍ठ मोड़ देने के सोचे-विचारे राजनैतिक षडयन्त्र में ऐसे उलझे कि थोड़ी देर बाद ही अपनी उस स्वाभाविक और त्वरित प्रतिक्रिया के साथ ही पत्रकारों की हँसी को भी झाड़ते-फूँकते और रफू करते नजर आये! और हाँ, यह दुर्भाग्य व्यक्‍ति हजारे का नहीं बल्कि उन एक सौ इक्कीस करोड़ देश-वासियों का है हजारे ने स्वयं को जिनकी सार्वजनिक अभिव्यक्‍ति का प्रतिनिधि घोषित कर रखा है।

जाहिर है, कुछ सार्थक हासिल करना है तो पवार से जुड़ी उस घटना को ‘व्यक्‍ति पवार’ से मुक्‍त करके देखना होगा। ऊपर दिये हजारे-उदाहरण के अलावा, ऐसी आवश्यकता इसलिए भी है कि ऐसा करके ही लोक-तन्त्र को बचाये रखा जा सकता है। यह सलाह सत्ता-धारियों के लिए जितनी सटीक है जितनी उनके लिए भी जो सत्ता के लिए लालायित हुए बैठे हैं। लेकिन ऐसा होते दिखने का एक भी संकेत नहीं है। कांग्रेसियों ने अपनी-अपनी हैसियत और समझ के अनुसार सारा ठीकरा यशवन्त सिन्हा के उस कथन पर फोड़ने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जिसमें उन्होंने जनता के सम्भावित ‘हिंसक प्रतिरोध’ का उल्लेख किया था। ऐसा करते हुए वे यह भी भुला बैठे कि उनके ही शीर्षस्थ नेता राहुल कुछ ही दिनों पहले उत्तर प्रदेश-वासियों को अपने कथित अव्यक्‍त क्रोध को व्यक्‍त करने के लिए प्रत्यक्षत: उकसाने की सीमा तक ललकार चुके थे।

वहीं दूसरी ओर, तमाम राजनैतिक ताकतें यह सन्देश देने में जुट गयी हैं कि पवार के साथ घटी उस घटना के पीछे बढ़ती मँहगाई से उपजा आक्रोष ही इकलौता कारण था। शासक और विरोधी दोनों पक्षों के नेता ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ऐसा करना ही लाभ-दायक लगता है — इस छलावे पर देश का भरोसा बैठ जाए तो जहाँ सत्ताधीशों को, लचर ही सही, एक न एक सफाई देने का अवसर मिल जाता है तो वहीं विपक्षियों को भी यह मौका मिल जाता है कि वे सत्तासीनों को घेर कर नीचा दिखा सकें। इसका तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं है कि देश, मुँह बाये दौड़ रही मँहगाई के प्रति, कतई तटस्थ है। किन्तु, जिस किसी ने भी पवार पर चाँटा जड़े जाने के पलों को इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया पर बिना किसी हेरा-फेरी या चूक के देखा है वह इस तथ्य से सहमति रखेगा कि हरविन्दर ने पवार को थप्पड़ तभी मारा था जब पत्रकारों द्वारा पूछे गये इस सवाल के जवाब में कि विपक्ष सदन में विरोध क्यों कर रहा है, एनसीपी प्रमुख ने अपने उत्तर को गोल-मोल करते हुए जो कहा था उसका तात्पर्य यह था (कि उन्हें तो मालूम ही नहीं है कि विपक्षी दोनों सदनों में सरकार का विरोध कर रहे थे)। यही नहीं, उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया था कि (ऐसा तो केवल) आप लोग ही कह रहे हैं! तब, पवार की इस चतुर राजनैतिक टाल-मटोल से उत्तेजित होते हुए ही, उसने हाथ उठाया था। उस समय, और उसके बाद के शुरूआती कुछ पलों तक भी, हरविन्दर का सारा जोर राजनीतिज्ञों द्वारा लगातार और सरासर, मक्कारी से ओत-प्रोत, झूठ बोलने पर ही केन्द्रित था।

स्पष्‍ट है कि राज-नेताओं द्वारा, पूरी बेशर्मी से और बिना रुके लगातार, आम नागरिक की आँखों में धूल झोंकते जाना ही वास्तविक असन्‍तोष का मूल कारण है। रामदेव और हजारे के सरकार-विरोधी आन्दोलनों की आँधी से घबराई सरकार ने तब उनके दमन के लिए जो खुले तानाशाही ताण्डव किये थे, और उनके बाद उत्पन्न हुई न्यायिक परिस्थितियों को अब वह जिस तरीके से निपटा रही है, उसने भी स्वाभाविक जन-असन्तोष को गहरे जन-आक्रोष में परिवर्तित करने में चौथे चरण की सी भूमिका अदा कर दी है। हालात संकेत कर रहे हैं कि सतह के नीचे भीषण ज्वालामुखीय लावा दहकने लगा है। इसीलिए, थप्पड़ से आक्रोषित होकर इस तरह की एक-जुट प्रतिक्रिया देना हमारे लोक-तन्त्र के आसन्न संकट का तत्व-परक हल नहीं है। इसके उलट, राज-नेताओं को ऐसे जमीनी उपाय ढूँढ़ने होंगे जो उबलने की कगार तक पहुँच गये जन-आक्रोष को वापस इतना ठण्डा कर सकें कि आक्रोष के आवेश में हाथ उठा बैठने की ताजी घटना को इतिहास अपने किस्म की अन्तिम होने के रूप में रूप में ही दर्ज करे।