ये भी तीतर वो भी तीतर

जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल की इन-इफ़ेक्‍टिव पाबन्दी हटा ली जायेगी। बताया जा रहा है कि इस तरह जब भाई लोग खुल्लम-खुल्ला बात करेंगे तो प्रशासन को उनकी प्लानिंग मालूम करने का गारण्टीड मौका मिलेगा!

कन्फ़्यूजन खुद में बड़ी कन्फूजिंग बला है। साइन्स-दानों के लहजे में कहूँ तो यह एक लफ़्ज नहीं बल्कि पूरा का पूरा विसियस साइकिल है। शुरूआत यहीं से होती है कि आदमी इसी को लेकर कनफुजियाया रहता है कि वह कनफुजियाता नहीं है। फिर, यदि वह किसी तरह समझ भी जाए कि उसे सच में कोई कन्फ़्यूजन हुआ है तो, नया कनफूजन यह खड़ा होता है कि उसे वह दूर कैसे करे? और तब, यह कन्फ़्यूजन होना भी लाजिमी है कि कनफूजन सच में दूर हो चुका है या नहीं?

जहिर है, आप सोचने लगे होगें कि मैं खुद ही कितना कनफुजिया गया हूँ! चलिए, आपका यह कन्फ़्यूजन दूर किये देता हूँ। लेकिन, इसके लिए मुझे पूरी रामायण सुनानी होगी। और हाँ इसके लिए आपको, धीरज रख कर और बिना कोई टोका-टोकी किये, मेरी पूरी बात ध्यान से सुनना होगी।

तो, हुआ यह कि अपने एक परिचित शतक-वीर बुजुर्ग की मिजाज-पुर्सी के लिए आज उनके घर चला गया। उमर के इस ढलते पड़ाव के वक़्‍त इस बुजुर्ग के लिए देखना, सुनना और बोलना तक मुहाल है। टोटल डिपेण्डेन्सी की इस हालत में बेचारे अपने ब्लड-रिलेशन्स तक के लिए बोझ बन चुके हैं। यानि, इस मैटीरियलिस्टिक दुनिया के लिए वे राइट-ऑफ़ हो गये हैं। ऐसी हालत में जब-कभी हलो-हाय करने उनके पास पहुँचता हूँ तो वे बहुत प्रफुल्लित हो जाते हैं। पर आज सुबह नजारा सैड-सैड सा था। डरते-डरते हुए ही, मैंने जब अचरज जाहिर करने की कोताही की और जब वे मुझ पर बिल्कुल भी नहीं झल्‍लाए तो मुझे समझ में आ गया कि कुछ न कुछ सीरियस है। हिम्मत बढ़ी और मेरी निगाहें सवालिया हुईं तो वक़्‍त की चादरें उघाड़ते हुए उन्होंने जो कुछ भी कहा, ब-जरिए अपनी क़लम, वही मैंने आपके सामने ऊपर परोस दिया था। उसका फिलॉसफ़िकल सार है — यह जो कन्फूजन है वह किसी एक अकेले का नहीं है। उन्होंने बतलाया था कि जम्हूरियत के तोता-चश्म नजारे देखते-देखते वे कितने कन्फ़्यूज्ड हो चुके थे। मेरा मतलब है, कनफुजियाना आज दुनिया-जहान का फ़िनॉमिना बन गया है।

अब किसी को भी यह कन्फ़्यूजन होना लाजिमी है कि किसी बुजुर्ग के बहाने से मैं किशन बापूराव हजारे पर उँगली उठाने की कोशिश करूँगा। इसलिए मेरा फ़र्ज बनता है कि मैं यह साफ कर दूँ कि मैं चुनिन्दा पॉलिटीशियन्स की आड़ में इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के मचाए इस अन्धा-धुन्ध हो-हल्ले से कतई प्रभावित नहीं हुआ हूँ कि फ़ेज़ मुम्बई की टाँय-टाँय फिस्स से टीम अन्ना इस कदर कन्फुजिया गयी है कि गैल चलते आम आदमी तक से मशविरे की भीख माँगती फिर रही है! ऑन द कॉण्टेररी, मैं तो यह कहना पसन्द करूँगा कि कन्फुजिया तो बेहद खास नसल के वे पॉलिटीशियन्स और उनके हिस्से-दार मीडिया हाउसेज़ गये हैं जो हजारे पर डिक्‍टेटर हो जाने का कीचड़ यह कहते हुए उछाल रहे थे कि वह अपनी पर्सनल एम्बीशन्स को पूरी एक सौ बीस करोड़ पॉपुलेशन पर जबरन थोपने की जुगत में मशगूल थे। यों, हजारे खुद भी ऐसे मौके बहुत देते हैं। खबर है कि अपने फ़्लॉप अनशन के बाद २८ दिसम्बर को अपने गाँव वापस लौटने पर अन्ना ने चार महीने के एक बच्चे का नामकरण ‘लोकपाल’ कर दिया। गोया, पूरा देश भले इस कन्फ़्यूजन में रहे कि वे उसे इफ़ेक्‍टिव जन-लोकपाल दिला पायेंगे या नहीं, हजारे इतना तो सीना ठोंक कर कह ही सकते हैं कि अपने गाँव रालेगन सिद्धी को तो लोकपाल, मेरा मतलब है लोक्या, सौंप ही दिया है। नाम के लिए ही सही!

वैसे, नामकरण की ऐसी महारत इण्डिया के खून में बड़ी आम है। अब, अन्ना के निशाने पर मौजूद मनमोहन को ही लें। दुनिया का हर जानकार भले यह दावा करता फिरे कि पाक आतंकवाद के खुले खैर-ख़्वाहों का सिरमौर बना हुआ है लेकिन ’दार जी ने मालदीव में पाक पीएम गिलानी को ‘शान्ति-पुरुष’ के खिताब से नवाज दिया! इतना ही नहीं, जैसे वे जानते हों कि उनकी इस दयानत-दारी को मुल्क के इण्टरेस्ट्स को गिरवी रख देने जैसी बदनामी मिलेगी, हमारे पीएम ने अपने क्लेम को पुख़्ता करने यहाँ तक कह दिया कि जम्हूरियती पीस-प्रॉसेस में पाक-सेना बराबर की भागी-दार थी!

भागी-दारी से एक और घटना याद आ गयी। हुआ यह कि एमपी के एक कांग्रेसी एमएलए साहिब को सूझा कि अपने हैप्पी बर्थ डे में वे स्कूली बच्चों को भी भागी-दार बनाएँ। एक जलवा-अफ़रोज़ नेता के चिरंजीव का सोचना कोई आम आदमी का ख़याली पुलाव पकाने जैसा थोड़े ही होता है। उस बेचारे की हाण्डी तो चढ़ भी नहीं पाती है। जबकि, रसूख-दार नेता का सपने में सोचा हुआ भी जमीन पर उतर जाता है। बस, इन्दौर के इस जलवे-दार कांग्रेसी का रुतवा एक अदद सरकारी स्कूल पर छा गया। उस पर इस जमीनी सचाई का भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा कि सूबे में बीजेपी की सरकार है। स्कूल लगा तो लेकिन सारी क्लासेज रोकी गयीं। गणित, विज्ञान या भूगोल के सवालों की जगह ब्लैक-बोर्डों पर ग्रीटिंग-सन्देश लिखे गये। जगह-जगह हैवी लाउड-स्पीकर्स लगाये गये। इन पर ‘हप्पी बर्थ डे’ वाले गाने बजाए गये। और तो और, बेखौफ़ी का आलम यह था कि जिन बच्चियों ने घर जाने की कोशिश की उन्हें इस ‘सोशल प्रोग्राम’ के पूरा होने तक रुके रहने को मजबूर भी किया गया।

बे-खौफ़ी के उल्लेख से एक खबर और याद आ गयी। खबर है कि देश की खौफ़-जदा होम मिनिस्ट्री ने जेल में बन्द भाई लोगों को बे-खौफ़ करने के लिए एक अनोखा रेवोलूशनरी कदम बढ़ाने का पक्का कर लिया है। तय किया गया है कि जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर लगी इन-इफ़ेक्‍टिव पाबन्दी अब जल्दी हटा ली जायेगी। मकसद बताया तो यही जा रहा है कि इस तरह जब भाई लोग और उनके गुर्गे, अन्दर-बाहर, खुल्लम-खुल्ला बात करेंगे तो प्रशासन के लोगों को उनकी प्लानिंग पता करने का मौका मिलेगा। गारण्टीड! यों, यह गारण्टी मुश्‍किल पहेली भी है। इतनी कि एक पुरानी पहेली की याद ताजी हो गयी — बोलो कुल कितने तीतर?

(०१ जनवरी २०१२)