जीत और हार!

‘हार-जीत’ के गेम में ‘ड्रॉ’ का कोई स्कोप नहीं। लेकिन, खुदा न ख़ास्ता टाई की नौबत आ जाए तो क्वाइन उछाल कर या फिर किसी प्रिव्हिलेज्ड वीटो के सहारे, दिस वे ऑर दैट, हार-जीत की पर्ची टिका ही दी जाती है।

काश्मीर हो या कन्याकुमारी, डिब्रूगढ़ हो या कच्छ का रन। पूरे देश में, मोटा-मोटी, एक सवालिया माहौल है। यों, यह कोई पहले-पहल हुई घटना नहीं है। ऐसे सवाल आते-जाते रहे हैं और आगे भी ऐसे ही आते-जाते रहेंगे। एक स्ट्राँग प्रोव्होकेशन चाहिए होता है। इण्डियन किस्म की जम्हूरियत में तो किसी प्रोव्होकेशन के परपज़फ़ुल या स्ट्राँग होने की भी जरूरत नहीं होती है। बस, एक अदद छछूँदर चाहिए होती है। और जरूरी होता है उस छछूँदर को तरीके से छोड़ने वाला। हाँ, पॉलिटिकल माइलेज मिलने की गारण्टी हो तो ऐसी छछूँदरें तलाशने और फिर छोड़ने वालों की भीड़ अटी पड़ी है इस देश में। किसी का नाम लेकर उसका भाव क्यों बढ़ाया जाए? या, छूट मिले तो यह कहना पसन्द करूँगा कि ऐसे किसी ‘सज्जन’ का नाम लेकर अपनी जुबान को अन-नेसेसरीली गन्दा क्यों किया जाए?

खैर, इस सचाई से डिनाई तो नहीं न कर सकता हूँ कि हवा में सिर्फ़ एक सवाल तैरते देख रहा हूँ कि कौन जीतेगा? किसकी हार होगी? कितना भी छिपाते फिरें, यह जानने लायक अक्ल तो रखता ही हूँ कि मेरी बातों में आपको इलेक्शन की बू आ रही होगी। आपको लग रहा होगा कि इलेक्शन का माहौल जोर पकड़ रहा है इसीलिए मुझे यह उच्च विचार सूझ रहे होंगे। कांग्रेस की पॉसिबिल हार की वजह डॉलर की बढ़ती कीमत है या काले धन का शोर-शराबा? या फिर, विरोधियों के पिटने की असली वजह टीम अन्ना के सो-कॉल्ड कॉण्ट्राडिक्शन्स होंगे या खुद रामदेव के अपने ‘काले’ धन्धों की पोल का सरे आम खुल जाना?

और यदि, मैं मना कर दूँ तो आपको सूझेगा ही सूझेगा कि गावस्कर-बार्डर ट्रॉफ़ी का देश-डुबाऊ बुखार अब मेरे सिर पर भी सवार है। ठीक है, लगातार पिटते जाने से क्रिकेट-लवर्स के बीच यह मुद्दा खासा गरमा गया है कि आस्ट्रेलिया में भारतीय टीम की एकाध पसली साबुत बचेगी भी या नहीं? लेकिन, मेरे लिए तो क्रिकेट की खबरें दूसरी खबरों की तरह ही बस ‘खबर’ ही होती हैं। न रत्‍ती कम और न माशा ज्यादा। मेरा नजरिया कतई साफ़ है — ‘जेण्टिल मैन्स गेम’ के नाम वाला यह खेल अब या तो सटोरियों, पॉलिटिकल गेंग्सटरों और कार्पोरेट एडवर्टाइजर्स जैसे तिजोरी-बाजों के पैसों का खेल होकर रह गया है या फिर फ़ेमस मीडिया-एंकरों की चौबीसों घण्टे की चिल्ल-पों का।

तो क्या देश की मझोली-बड़ी अदालतों में खासुल-खास हैसियत-दारों के खिलाफ़ चल रहे भारी-भरकम मामलों में अपने कर्मों की मार में कौन फँसेगा और सरकारी तन्त्र की बैक-डोर मदद पाकर कौन बच निकलेगा? नहीं, यह सब निरी बौद्धिक बकवास भी नहीं! आप तो जानते ही हैं कि अन-सरटेण्टीज़ और प्योर स्पेकुलेशन्स में मुझ जैसों की कोई रुचि नहीं होती।

तब आप कहेंगे कि फिर मैं किस बूते पर हार-जीत की बेसुरी राग छेड़ने बैठा हूँ? चलिए, आपको बता ही देता हूँ कि यह बात आखिर मुझे क्यों सूझी? हुआ यों कि दुनिया देखने को आतुर एक बन्दा स्टेशन के वेटिंग-हॉल में टकरा गया। जला-भुना लगता था। पहले मुझे लगा कि इन्क्वायरी से ट्रेन के राइट-टाइम अराइवल का पक्का करके स्टेशन पहुँचा बन्दा गाड़ी आने के अधूरे इन्तजार में पाँच घण्टे गुजार चुकने से बौखला गया था। लेकिन उसे तसल्ली की तवज्जो दी तो असली किस्सा कुछ और ही निकला! पता चला, इण्टरनल पार्टी-पॉलिटिक्स को विन-ओवर करने के लिए ‘टूल पाकिस्तान’ चलाते हुए गिलानी और कयानी की तारीफ़ में मनमोहन के बयान को तो उसने देख ही रखा था, ब्यौहार में पाक से मिले ‘बयानी तोहफ़े’ को भी उसने पढ़ लिया था। खबर थी कि पाक ने अफ़गान को मशविरा दिया है कि पाक पर आरोपों का थूक जाया करने के बर-खिलाफ़ वह, पक्के से पक्के दुश्मन तक से अच्छे रिश्ते बनाने की कला, इण्डिया से सीखे! उस बन्दे का उच्च विचार था कि हार से भी जीत कबाड़ लेने की ऐसी अन-पैरेलल कला केवल इण्डियन कॉण्टिनेण्ट में पायी जाती है।

क्योंकि ऐसे सटायर्स भरोसे लायक कम ही होते हैं, उसकी इस फाइण्डिंग पर मुझे भरोसा नहीं हुआ। मेरी फ़ीलिंग्स को उसने ताड़ लिया तो हिकारत भरे भाव में एक दूसरी, प्योर इण्डियन, नजीर लगे हाथों दे डाली। नजीर भी ऐसी कि मेरी घिघ्‍घी बँध गयी — बिलीव देम ऑर नॉट, ‘भ्रष्‍ट’ घोषित कर बीएसपी से निकाले गये कुशवाहा को अपने ‘स्वच्छ-धवल’ भवन के भीतर खींच लेने पर देश-भर में मची थूक-थकार को विन-ओवर करने के लिए भाजपाई सफाइयाँ ‘गंगा’ से लेकर ‘विभीषण’ तक कितनी मल्टी वेरायटीड थीं!

खैर, तब तक उसकी छह घण्टे लेट ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी और बातों का सिल-सिला टूट गया। लेकिन मेरे पास टाइम ही टाइम था क्योंकि मेरी लौह-पथ गामिनी के गमना-गमन का कोई पता-ठिकाना नहीं था। जाहिर है, धीरज की परीक्षा की इस कठिन घड़ी में मेरे खयालों की गाड़ी एकदम फुल स्पीड में दौड़ पड़ी। एक निहायत दार्शनिक विचार ने मेरे जेहन में यक-ब-यक अपना सिर उठा लिया — हार और जीत में चोली-दामन का साथ है।

पहली और सिम्पल सी बात यह कि ‘हार-जीत’ के गेम में ‘ड्रॉ’ का कोई स्कोप नहीं होता। टाई यों तो होती नहीं है लेकिन, खुदा न ख़ास्ता ऐसी कोई नौबत आ भी जाए तो क्वाइन उछाल कर या किसी प्रिव्हिलेज्ड वीटो के सहारे, दिस वे ऑर दैट, हार-जीत की पर्ची टिका दी जाती है। दूसरी तरह से देखें तो, किसी को जीत दूसरे की हार की बदौलत ही मिलती है। कहें का मतलब ई कि किसी की हार के पीछे, बिला शक, दूसरे की जीत ही होती है। और तो और, जीतने वाले को विजय का हार पहनना पड़ता है।

(०८ जनवरी २०१२)

1 comment

    • manoj pathak on February 17, 2012 at 1:40 pm

    dr. sahab bare man se likhte he.

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