किसमें कितना है दम!

दिग्गी ने कहा जरूर है कि वे पार्टी आला-कमान से इजाजत लेकर ही हिन्दुओं के उस जलसे में गये थे लेकिन इस फोटो काण्ड ने उनकी अपनी पर्सनल दम-ख़म की कलई तो उतारी ही पार्टी की दम-ख़म का भी फालूदा बना दिया है।


हाथ में अपनी किस्म का एक खास इनविजिबिल थर्मामीटर थामे घूमने वाले मेरे परिचित मिल गये। मैं तो देर सुबह की अपनी रुटीन वाक पर निकल रहा था पर वे अर्ली मॉर्निंग ब्रेक-फास्ट की अपनी हण्टिंग मुहिम पर थे। लिहाजा, बच नहीं पाया। अपनी ही गली में धर लिया गया। आँखों में सवालिया पोस्‍टर टाँगे उन्होंने मेरी बाँह पर कब्जा पक्का किया और घसीट कर मेरे अपने दड़बे में मुझे वापस ठेल दिया। अरे हाँ, लगे हाथ एक फण्डामेण्टल प्वाइण्ट साफ कर दूँ — दोस्तों का हमारा कॉकस जिसका मजाक ‘थर्मामीटर’ कह कर उड़ाता है उसे यह सज्जन ‘स्केल’ कहलवाना प्रिफ़र करते हैं। माहौल को समझने-नापने का उनका अपना स्केल।

खैर, वाया जुबान, उन्होंने अपनी आँखों के सवालिया पोस्टर को मेरे जेहन पर थोपा। चहके, “यह दम-ख़म भी बला की चीज है! किसमें कितना दम है इसे जानना हर किसी के बूते की बात नहीं।” उनका पोस्टर जैसे मेरे जेहन पर बिल्कुल सटीक बैठ गया हो, आव देखा न ताव मेरे मुँह से निकल गया, “बिल्कुल ठीक फ़रमाते हैं।”

मेरे हाँ में हाँ मिलाने से आपको लगा होगा कि सारे लोगों की तरह पाँच असेम्बलियों के चुनावी माहौल का भूत मुझ पर भी ठीक-ठिकाने से सवार हो चुका है। और इसीलिए, इलेक्शन रिजल्ट्स से लीडरान और उनके कारिन्दों-गुर्गों की दम-ख़म को तौलने की ना-समझों जैसी मिस्टेक कर रहा हूँ। एडवांस में ही टोके देता हूँ, यहाँ मिस्टेक आपकी है। जाहिर है, मेरी इस बात में दूसरी मिस्टेक का भी खोट बताने लगेंगे तो मैं झेल नहीं पाऊँगा। मुझे मालूम है कि इण्डियन किस्म की डेमोक्रेसियों में दो-पाँच असेम्बली चुनावों की कौन कहे, अक्खे पर्लियामेण्ट इलेक्शन में भी पीट दिये गये हाई-कमान इज्जत की सीट से उतारे नहीं जाते हैं। वो कहते हैं ना कि वोट तो आते-जाते रहते हैं लेकिन आला-कमानों के फ़ारेन बैंक अकाउण्ट्स सिर्फ़ आवक की एण्ट्री के लिए ही खुलते हैं। बरसों का रिकॉर्ड है कि, मजबूरी में ही सही, इस खाते के लिए रेगुलर किश्‍तें मुहैया कराने वाले लगुए-भगुए तक इसी बैलेन्स की दहशत में हाई-कमान का पाद-प्रक्षालन करना अपना अहो-भाग्य समझते हैं।

फिर तो आप पूछेंगे ही पूछेंगे कि तब किस दम पर मैंने दम-ख़म थ्योरी पर अपनी कन्सेण्ट का ठप्पा लगा दिया? हो सकता है कि आप मन ही मन यह लड्‍डू फोड़ने लगे हों कि आपके सवाल से घबरा कर मैं बड़े डींग-बाज प्रभात झा का एग्ज़ाम्पल दे दूँ। यह ठीक है कि एमपी बीजेपी चीफ़ अपने सीनियर्स से दो कदम आगे चलने की सनक के लिए फेमस हो चुके हैं। लेकिन उनके जानने वाले जानते हैं कि उनके पॉलिटिकल क्लेम्स कितने थोथे हुआ करते हैं। इसीलिए, कह रहा हूँ कि मैं उन अखबारी खबरों से कतई इम्प्रेस्ड नहीं हूँ जिनमें यह छपा था कि लोकपाल बिल पर वोटिंग नहीं कराने के ‘लोक-तन्त्र के मर्डर’ के पब्लिक प्रोटेस्ट में डिस्ट्रिक्‍ट हैड-क्वार्टर्स पर तीन घण्टे के रोड-शो में ढाई घण्टे लेट पहुँचे पार्टी चीफ़ आधे घण्टे तशरीफ़ का टोकरा तो धरे रहे लेकिन मौन धर पाने का दम रत्ती भर भी नहीं दिखा पाये।

लोकपाल और दम-ख़म की बात निकली तो बीजेपी के ही जितेन्द्र डागा याद आ गये। सुना है, उनकी कुछ डिमाण्ड्स हैं। और, इन डिमाण्ड्स से जुड़ी कुछ शर्तें भी। अपनी ही पार्टी के सीएम से गुहार की है। ख़म भी ठोंका है। अब, इस सबके पीछे कितनी ‘ईमान-दार’ जन-सेवक की भावना है और कितने ‘वेस्टेड’ इण्टरेस्ट्स इसका ठीक-ठीक कैलकुलेशन तो कोई कॉम्पिटेण्ट इन्वेस्‍टिगेशन टीम ही कर सकती है लेकिन उनका एक जुमला कोट हुआ है, “माँग पूरी करो वर्ना मैं भी अन्ना बन जाऊँगा!” कितना दम-ख़म है, इस पर कोई कामेण्ट करना धूल में लठ भाँजने जैसा ही होगा। मुझे तो बस, एक गाने की पैरोडी सूझ रही है — अन्ना बदनाम हुए, जालिम तेरे किये।

वैसे, पब्लिक प्लेट-फ़ॉर्म पर, एमपी में बीजेपी के दम-ख़म के बारे में उनकी पार्टी कितने भी सवाल क्यों न चस्पा करती मिले; पार्टी ऑफ़िस में यदा-कदा हाजिर होने वाले हैवी वेट्स के माथों पर इस चिन्ता की लकीरें तो खिंच ही जाती हैं कि ऐसी क्या वजह है जो एमपी में आरएसएस का राज लगातार हावी हुआ पड़ा है? कई ओपीनियन्स फ़्लोट हुए हैं। एक कहता है कि स्टेट को सेण्ट्रल से मिलने वाले फ़ण्ड्स का लाभ उठाना चाहिए तो दूसरे का कहना है कि किसी को हमारे ‘वोट-बैंक’ की चिन्ता नहीं है। गोया, हर एक लीडर समझ रहा है कि उसकी अपनी लीडरी की दम-ख़म कितनी पोली हो गयी है? इन असमंजसों के बीच पार्टी की जलवा-अफ़रोज रही एक एमएलए ने प्रदेश लोकायुक्‍त की अपमान-कारी फोटो क्या लहरा दी, एक्स सीएम दिग्गी की अपनी घिग्घी बँध सी गयी। आरएसएस वालों ने रज्जू भैया और अशोक सिंघल के साथ बिराजे इस पार्टी जनरल सेक्रेटरी की तस्वीर रिलीज कर दी। यों, खुद दिग्गी ने भरपाई के लिए कहा जरूर है कि वे पार्टी आला-कमान से इजाजत लेकर ही हिन्दुओं के उस जलसे में गये थे लेकिन इस फोटो काण्ड ने उनकी अपनी पर्सनल दम-ख़म की कलई तो उतारी ही, पार्टी की दम-ख़म का भी फालूदा बना दिया है।

चलिए, नेगेटिव बातें बहुत हुईं। एक पॉजिटिव एग्ज़ाम्पिल भी रखना पड़ेगा। सुना है, पटना से दिल्ली चली राजधानी एक्सप्रेस में कोई चौथाई सैकड़ा सांसद कम्फर्टेबिल सवारी चाहते थे। लेकिन जगह नहीं होने से कुल छह को ही ‘सम्मान’ हासिल हुआ। बाकी बीस को एसी सैकेण्ड से तसल्ली करना पड़ी। सांसदों की दम-ख़म का गम्भीर मुद्दा था। रेल्वे को कम्प्लेण्ट हुई। मामले को पार्लियामेण्ट के फ़्लोर पर उठाने की धमकी तक दी गयी। डरे-सहमे रेल्वे मिनिस्टर ने दोषियों के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाही का आश्‍वासन भी दिया और यह देखा भी कि कार्यवाही सच में ही हो। सो, ना-ग़वार तौहीनी के जिम्मेदार सीनियर अधिकारी को ‘कर्त्तव्य से लापरवाही’ के लिए सस्पेण्ड होना पड़ा।

(१५ जनवरी २०१२)