गुजरात लोकायुक्‍त विवाद-१ : दोषी कौन?

गुजरात के राज्यपाल को इतनी वैधानिक समझ रही भी थी या नहीं कि वह लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के अत्यन्त क्लिष्‍ट विषय पर, ‘व्यक्‍ति’ अथवा ‘दल’ सापेक्ष भाव से पूरी तरह ऊपर उठ कर विचार कर सकें?

ऐसा लग रहा है कि लम्बे समय से विवादों की स्थाई केन्द्र बनी देश की अपनी तरह की इकलौती राजनैतिक शख़्सियत ने देश में, अपनी ही तरह के एक बेहद नये, विवाद की नींव रख दी है। इस विशुद्ध राज-नेता ने राजनैतिक चतुराई की चाशनी चढ़ा कर पारित कराये गये अधिनियमों की कलई को सार्वजनिक रूप से उतारने का अपनी ही शैली का राजनैतिक दाँव चल दिया है। दाँव कारगर होता भी दिख रहा है। न्याय-पालिका से बाहर उपलब्ध हर सुविधा-जनक दीवार जिस भाषा में पोती जा रही है वह निहित राजनीति से प्रेरित है।

मोदी के प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही किस्म के विरोधी तिल-मिला गये दिखाई दे रहे हैं — आरम्भ इस एकदम सामान्य से तथ्य को अलग से रेखांकित करने से हुआ है कि उच्च न्यायालय में हाथ लगी किरकिरी को चुनौती देने में नरेन्द्र मोदी ने मिनिट भर की भी देर नहीं की!

हर तरीके की राजनैतिक कालिख पोती जा रही है। लेकिन २००३ से रिक्‍त पड़े लोकायुक्‍त के पद पर पूर्व न्यायाधीश आर ए मेहता को, कथित रूप से एक-तरफ़ा तरीके से, नियुक्‍त करने के राज्यपाल कमला बेनीवाल के निर्णय से उपजे गम्भीर प्रजा-तान्त्रिक विवाद पर आये गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय के न्यायिक बिन्दुओं पर शत्‌-प्रतिशत्‌ शालीन और तार्किक चर्चा तक से बचा जा रहा है। जाहिर तौर पर इसके लिए न्यायिक निर्णयों पर टिप्पणी से बचने की ‘स्वस्थ’ परम्परा की आड़ ली जा रही है लेकिन गहरा कारण यह है कि ऐसा करके ही मोदी की खुली आलोचना के मिले अवसर को दोनों हाथ लूट लेने की राजनैतिक चाहत पूरी की जा सकती है। गुजरात लोकायुक्‍त अधिनियम के सम्बन्धित प्रावधानों और नियुक्‍ति के विवाद से जुड़े सभी तथ्यों की विस्तृत समीक्षा से विवाद की धुरी स्थानान्तरित जो हो जाती है! मोदी को गुजरात की सीमा में ही घेरे रखने और एक राज्य विशेष से बाहर अपने पर मारने से रोकने का इससे बेहतर दूसरा उपाय मोदी-विरोधियों को सूझता ही नहीं है।

अपने ऊपर उछलते छींटों से बचने के लिए टू-जी स्पैक्‍ट्रम घोटाला, चिदम्बरम-विवाद, नोट फ़ॉर वोट मामला जैसे मुद्दों में विरोधियों पर ‘मीडिया-ट्रायल’ का आरोप लगाने वाली राजनैतिक पल्टन मोदी को सार्वजनिक रूप से घेरने के लिए स्वयं ही मीडिया की उँगली पकड़ कर सड़क पर उतर आयी है। सावधानी के लिए उच्च न्यायालय से पारित हो चुके निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय में प्रकरण के सम्भावित हश्र के कानूनी बिन्दुओं से तो यथा-सम्भव दूरी बनाये रखी जा रही है लेकिन लगे हाथ यह राजनैतिक सवाल गला फाड़ कर उछाला जा रहा है कि २०११ में भले ही राज्यपाल से चूक हुई हो लेकिन इसके पहले के आठ सालों तक मोदी क्या कर रहे थे?

सवाल यह है कि क्या एक मुख्य मन्त्री की गैर जिम्मेदारी का उचित लोक-तान्त्रिक तोड़ मात्र यही है कि राज्य का सर्वोच्च संविधान-संरक्षक खुद ही संविधान की धज्जियाँ उड़ा दे? इस सवाल का तात्विक जवाब ढूँढ़ने की कोशिश में ‘गहरे पानी पैठ’ का ईमान-दार पालन करने वाले के सामने एक नया सवाल यह खड़ा हो जायेगा कि विधायिका द्वारा द्वि-अर्थी या गहरी अनिश्‍चितता भरी भाषा के अधिनियमों का पारित किया जाना किस सीमा तक उचित है? सतही सोच वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं है किन्तु सन्दर्भों को उनमें विहित पूरी गम्भीरता से परखने वालों से तो यह पूछा ही जा सकता है कि क्या उन्होंने एक बार भी गुजरात राज्य के लोकायुक्‍त अधिनियम, १९८६ को व्यवहारिक तराजू पर तौला-परखा है? क्या तथ्यों की जुगाली करते हुए उन्होंने एक बार भी इसकी समीक्षा करने का प्रयास किया है कि लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के मामले में गुजरात के राज्यपाल और गुजरात के नेता प्रति-पक्ष का रुख निहित राजनैतिक सोच से ऊपर उठा भी है या नहीं? क्या गुजरात के घटना-क्रम ने उनके मन में कभी यह चिन्ता उठायी है या नहीं कि गुजरात के राज्यपाल को इतनी वैधानिक समझ रही भी थी या नहीं कि वह लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के अत्यन्त क्लिष्‍ट विषय पर, ‘व्यक्‍ति’ अथवा ‘दल’ सापेक्ष भाव से पूरी तरह ऊपर उठ कर, मात्र संविधान के संरक्षक की आधार-भूत योग्यता से विचार कर सकें?

सवाल काल्पनिक बिल्कुल नहीं हैं। सवालों पर यह आरोप भी चस्पा नहीं किया जा सकता है कि इनका सृजन तथ्यों की तोड़-मरोड़ के सहारे किया गया है। क्षुद्र दुराग्रह पाल लिए गये हैं इस पर दो मत नहीं होंगे। किन्तु इसमें तीखे मत-भेद होंगे ही कि दुराग्रहों का खाता खोला किस पाले ने है? देश में बह रही राजनीति की बयार सब दूर सन्देश पहुँचाने में लगी हुई है कि मोदी सत्ता-लोभ के दुराग्रह में इतनी बुरी तरह डूब चुके हैं कि स्वच्छ व निष्कलंक तन्त्र की स्थापना को सुनिश्‍चित करने की मंशा से स्थापित किये गये लोकायुक्‍त संस्थान तक को रिक्‍त ही रखने में प्राण-पण से जुटे हैं। लेकिन एक सोच और भी है जो विवश करता है कि दिखाई पड़ रहे तथ्यों को इस तरह से परख कर देख लेने में क्या हानि है कि, बहुत सोचे समझे तरीकों से, कहीं ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित तो नहीं कर दी गयीं जो एक राजनीतिज्ञ को, सन्देहों से परे स्थापित हो चुका, स्थापित अपराधी प्रमाणित कर सकें?

कहा जा सकता है कि पूर्वाग्रहों की शुरूआत इसी एक तथ्य से होती है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारी बहुमत से भाजपा सरकार की वापसी के तत्‍काल बाद २००३ में गुजरात के लोकायुक्‍त एस एम सोनी ने अपना पद छोड़ दिया। इस कड़ी का दूसरा तथ्य यह है कि ७ अगस्त २००६ को मोदी ने गुजरात के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर नियुक्‍ति-प्रक्रिया की पहल की। उन्होंने लिखा कि वह मुम्बई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश क्षितिज व्यास के नाम पर विचार करें और उसे विचार के लिए राज्यपाल को भेजें। कार्य-कारी मुख्य न्यायाधीश वाई आर मीणा ने अगले ही दिन अपनी लिखित सहमति भेज दी। तब १० अगस्त २००६ को सरकार ने नियुक्‍ति से सम्बन्धित नस्ती राज्यपाल को भेजी। नस्ती को पाने पर २५ अगस्त २००६ को राज्यपाल ने यह जानकारी चाही कि क्या इस बारे में नेता प्रति-पक्ष से परामर्श लिया गया था? यह माँग भी रखी गयी कि उन्हें नेता प्रति-पक्ष से हुए विचार-विमर्श की मिनिट्स उपलब्ध करायी जायें। २९ अगस्त २००६ को सरकार ने जानकारियों वाली सम्पूर्ण नस्ती तो भेज दी लेकिन यह भी सूचित किया ऐसी कोई परम्परा नहीं रही कि नेता प्रति-पक्ष से हुए विमर्श की मिनिट्स लिखी जाएँ।

इसके बाद, एक ओर १३ सितम्बर २००६ को संसद में ‘एक्‍ट ४३ ऑफ़ २००६’ परित कर मूल अधिनियम को संशोधित किया गया। मानव अधिकार अधिनियम, १९९३ (संशोधन) अधिनियम नामक इस अधिनियम के माध्यम से अन्य संशोधनों के अलावा मूल अधिनियम की धारा ६ के शीर्षक में बदलाव कर उसमें ‘सदस्यों की पदावधि’ में सदस्यों के साथ अध्यक्ष को भी जोड़ते हुए ‘अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि’ कर दिया गया। इसी तरह धारा २४ के शीर्षक को भी ‘राज्य आयोग के सदस्यों की पदावधि’ से बदल कर ‘राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि’ कर दिया गया। दूसरी ओर, इसी दिन राज्यपाल ने मुख्य मन्त्री कार्यालय को पत्र लिख कर कुछ सवालों के जवाब माँगे। इसके साथ ही, इस बारे में भी जानकारी चाही गयी कि दूसरे राज्यों परामर्श की कैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है? सरकार ने सभी वांछित जानकारी इकट्‍ठी की और २७ फरवरी २००७ को राज्यपाल को सौंप दी।

जाहिर है, गुजरात उच्च न्यायालय में क्रमश: विधिक सहायता समिति के सदस्‍य, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष तथा मानव अधिकार समिति के अध्यक्ष रह चुके मुम्बई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की राज्य के लोकायुक्‍त के पद पर नियुक्‍ति को लेकर गुजरात के तत्‍कालीन राज्यपाल की अपनी द्विविधाएँ थीं। नेता प्रति-पक्ष की आपत्तियों की भी आड़ ली गयी और अधिक गहरी छान-बीन की आवश्यकता बतलायी गयी। इसलिए, लगभग पूरे दो सालों तक नस्ती ठण्डे बस्ते में पड़ी रही। इस बीच व्यास को महाराष्‍ट्र में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्‍त करने का आदेश पारित किया गया जहाँ उन्होंने २१ अगस्त २००७ को को अपना पद ग्रहण भी कर लिया।

इतना सब हो जाने के बाद ही, ६ फरवरी २००९ को राज्यपाल ने गुजरात सरकार को एक पत्र लिखा। कहा गया कि मानव अधिकार अधिनियम, १९९३ की धारा २४(३) के प्रकाश में, व्यास ने लोकायुक्‍त के पद पर नियुक्‍ति की पात्रता खो दी है। और इस तरह, मुख्य न्यायाधीश की सहमति लेकर मोदी द्वारा प्रस्तावित हुए व्यक्‍ति की नियुक्‍ति के प्रस्ताव को समाप्‍त हुआ मानते हुए राज्यपाल ने नस्ती सरकार को वापस भेज दी।

इसके बाद राज्यपाल ने नियुक्‍ति-प्रक्रिया की पूरी कमान अपने हाथ में थाम ली। २९ दिसम्बर २००९ को उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को लिखा गया कि वे मुख्य न्यायाधीश से ‘नामों का एक पैनल’ प्रस्तावित कराएँ। २४ फरवरी २०१० को चार नामों का एक पैनल भेजा गया। मुख्य मन्त्री से कहा गया कि वह नेता प्रति-पक्ष से विमर्श कर एक नाम प्रस्तावित करें। नेता प्रति-पक्ष के खुले असहयोग के बीच राज्यपाल द्वारा सुझाई प्रक्रिया की पूर्ति के बाद सरकार की ओर से, पैनल के नामों में से, पूर्व न्यायाधीश जे आर वोरा का नाम प्रस्तावित हुआ। १ अप्रैल २०१० को लोकायुक्‍त के पद पर वोरा की नियुक्‍ति का प्रस्ताव करती नस्ती राज्यपाल को भेजी गयी।

ऐसा मानने के कारण हैं कि लोकायुक्‍त के पद पर वोरा की नियुक्‍ति के प्रस्ताव को लेकर गुजरात के राज्यपाल के अपने कुछ पूर्वाग्रह रहे। इस कारण उन्होंने दो-तरफ़ा रुख अपनाया।

एक ओर, २३ अप्रैल २०१० को राज्यपाल ने मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तृत पत्र लिख कर उनसे जानना चाहा कि उनके द्वारा प्रस्तावित चार व्यक्‍तियों में से वे किसे बेहतर मानते हैं — पूर्व न्यायाधीश आर पी ढोलकिया को या फिर पूर्व न्यायाधीश जे आर वोरा को? इसके प्रत्युत्तर में मुख्य न्यायाधीश ने २७ अप्रैल २०१० को विस्तार से लिखा कि वे ढोलकिया को बेहतर पसन्द मानते हैं। तब ३ मई २०१० को राज्यपाल ने मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा। इसमें लिखा गया कि लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति को लेकर विचार-विमर्श की प्रक्रिया को ठीक-ठीक समझने के लिए उन्होंने अटॉर्नी जनरल से कानूनी राय माँगी थी। उनसे मिली राय के प्रकाश में आग्रह किया गया कि वह लोकायुक्‍त के लिए एक अकेले नाम का प्रस्ताव करें क्योंकि एक से अधिक नामों का पैनल भेजा जाना कानूनी दृष्‍टि से त्रुटि-पूर्ण था।

वहीं दूसरी ओर, ५ मई २०१० को राज्यपाल ने मुख्य मन्त्री को एक पत्र लिखा जिसमें मुख्य न्यायाधीश द्वारा भेजे गये चार नामों के पैनल की त्रुटि को लेकर उन्हीं विचारों को दोहराया गया जिन्हें वह मुख्य न्यायाधीश तक पहुँचा चुके थे। पत्र में सूचित किया गया कि वोरा की नियुक्‍ति के प्रस्ताव वाली नस्ती को वे मुख्य मन्त्री के पास वापस भेज रहे हैं। राज्यपाल ने यह भी लिखा कि मुख्य न्यायाधीश से औपचारिक प्रस्ताव मिलने पर नस्ती औपचारिक रूप से उनके पास भेजी जाए।

अनिर्णय के इस काल में १० मई २०१० को मुख्य न्यायाधीश ने वोरा की नियुक्‍ति गुजरात राज्य न्यायिक अकादमी में निदेशक के पद पर कर दी जिन्होंने ११ जून २०१० को पद का भार ग्रहण कर लिया।

इसके ६ महीनों के बाद ही, बाद २९ दिसम्बर २०१० को, मुख्य न्यायाधीश ने राज्यपाल के पत्र का उत्तर दिया। इसमें पूर्व में लोकायुक्‍त के लिए उनके सुझाए नामों पर उठाये गये सवाल के उल्लेख के साथ ही यह उल्लेख भी था कि उनके द्वारा सुझाये कुछ नामों पर राज्य सरकार के कुछ पूर्वाग्रह थे। साथ ही यह भी लिखा गया लोकायुक्‍त के पद हेतु चुने गये पूर्व न्यायाधीश वोरा के नाम पर अब विचार नहीं किया जाए। इसका आधार बताते हुए कहा गया कि वोरा की राज्य न्यायिक अकादमी में नियुक्‍ति के आदेश जारी हो चुके हैं और उन्होंने यह पद-भार ग्रहण भी कर लिया है।

तथ्य और भी हैं। सम्भावना यह भी है कि खल-नायक की भूमिका में एकधिक पात्रों का योगदान रहा हो। इसलिए, दूसरों के दिखाये पोस्‍टर-बैनर-सम्पादकीय के फेर में पड़ कर, राज्य में लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के एक लम्बे अन्तराल तक न हो पाने का, ठीकरा नरेन्द्र मोदी के सिर फोड़ने वालों को जमीनी तथ्यों के प्रकाश में यह देख ही लेना चाहिए कि आरोप कितने जायज या ना-जायज हैं? उन्हें इनके तथ्य-परक जवाब भी ढूँढ़ कर रख लेना चाहिए। यह मान लेने में कोई समस्या नहीं है कि प्रत्येक राज्यपाल का कानूनी विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है। किन्तु ऐसा मानते ही यह जान लेना भी आवश्यक हो जाता है कि कानून के ज्ञान से अपरिचित रहने वाले राज्यपाल के लिए बन्धन-कारी है कि वह ‘अन्धा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर देय’ को कतई चरितार्थ न करे। दूसरे शब्दों में, कानूनी परामर्श लेते समय वह इस दृष्‍टि को कतई प्राथमिकता न दे कि किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही उसको सुविधा-जनक परामर्श की आवश्यकता है।

गुजरात का लोकायुक्‍त विवाद इन जैसे ही ढेरों सवालों की धुरी पर घूम रहा है। कानून-विद्‌ तो संविधान और कानून की पोथियों को खँगालेंगे ही। यह आवश्यक भी है। लेकिन क्योंकि मामले से जुड़े आधार-भूत तथ्यों को, न्याय-पालिका के दायरे के बाहर, तोड़-मरोड़ कर रखने का खुला बौद्धिक खेल भी आरम्भ हो गया है इसलिए किसी भी निष्‍कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्यों को सिल-सिले से तौल लेना चाहिए।

(३१ जनवरी २०१२)