माया, मूर्ति और चुनाव आयोग : अग्नि-परीक्षा!

अतीत में मच चुके गम्भीर बवालों के परिप्रेक्ष्य में, यह आयोग की निष्‍पक्षता की अग्नि-परीक्षा है कि संवैधानिक प्रावधानों की अपने हिस्से की ताजी समीक्षा के बाद वह इस स्वाभाविक विकास से पलटी नहीं मारेगा।

सत्ता का दुरुपयोग कर लोक-तन्त्रीय चुनाव को प्रभावित करने पर रोक लगाने की दिशा में केन्द्रीय चुनाव आयोग ने भारतीय गण-तन्त्र का अब तक का सबसे बड़ा निर्णय आखिर ले ही लिया। आयोग ने निर्णय लिया है कि उत्तर प्रदेश की मुख्य मन्त्री मायवती ने, केवल अपने वैयक्‍तिक प्रभाव के प्रदर्शन और प्रचार के लिए, राज-कोष का अन्धा-धुन्ध दुरुपयोग कर अपनी और हाथी की जो मूर्तियाँ सार्वजनिक स्थलों पर लगवाई हैं उन्हें तत्‍काल प्रभाव से ढाँक दिया जाए। दावा किया जा रहा है कि आयोग ने यह कदम चुनाव-आचार संहिता के यथार्थ पालन के लिए उठाया है। इस बहु-प्रतीक्षित निर्णय की घोषणा मुख्य आयुक्‍त एस वाई क़ुरैशी ने की।

यद्यपि, आम आदमी के लिए इस प्रशासनिक दावे को पचा पाना असम्भव है कि आयोग के निर्णय की संवैधानिक मंशा और मूर्तियों को पॉलिथीन के पर्दों की आड़ में लेने के तरीके के बीच किसी प्रकार का कोई तात्विक सामंजस्य है। फिर भी, यह एक बड़ी खबर है कि आरम्भिक हीला-हवाली के बाद, आयोग के इस आदेश का ‘शाब्दिक’ पालन हो चुका है। शाब्दिक इसलिए कि प्रक्रिया के तथा-कथित रूप से पूरा कर दिये जाने के बाद का नजारा यह है कि, ढाँका-मूँदी की इस औपचारिक कसरत के बाद, जहाँ एक ओर परिस्थिति से कतई अपरिचित व्यक्‍ति को भी, बिना जोर डाले, समझ में आ जाता है कि पॉलिथीन की आड़ के पीछे हाथी की प्रतिमा है वहीं दूसरी ओर पत्थर की पतली शिलाओं पर उँकेरे गये माया और कांशीराम के वे युग्म-शिल्प अन-ढँके ही छोड़ दिये गये नजर आते हैं जिन्‍हें या तो ‘मूर्ति’ के दायरे में परिभाषित हुआ नहीं माना गया या जिन्हें इस तरह ढँका ही नहीं जा सकता था कि माया तो ढँक जाये पर कांशी अछूते बच रहें। वैसे, यह ऐसी इकलौती विडम्बना नहीं है जो अपने आप में पर्याप्‍त भी है और आयोग के निर्णयों के पीछे रहने वाली किसी तात्‍कालिक उत्‍प्रेरणा को सवालों के कटघरे में खड़ा भी करती है।

प्राथमिक, और सरसरी भी, बात तो यह है कि निर्णय की घोषणा के साथ ही तय था कि इसकी अनुगूँज बहुत लम्बे समय तक सुनाई देगी। पहला, और जाहिर भी, कारण तो यही था कि राज-नीति की बिसात पर सदा से ही ओछी चालें चलती आयी मायावती, अपनी राजनैतिक संकीर्णता को नये सिरे से छलका कर, इस आघात से भी पाई-पाई वसूल लेने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगी। माना जा रहा था कि अपने राजनैतिक चरित्र के अनुरूप इस बवाल पर भी वह दो-तरफ़ा वार अवश्य करेंगी। और, दूसरा कारण यह कि चुनावी रण में शामिल अन्य दूसरे दल भी आयोग के ताजे निर्णय से गरमाए इस तवे पर अपनी-अपनी रोटी सेंकने का कोई न कोई प्रयास अवश्य करेंगे।

अपने जन्म-दिन के मौके पर आयोग पर पलट-वार करते हुए माया ने इसकी शुरूआत कर भी दी है। बीएसपी सर्वे-सर्वा ने निर्णय को ‘दलित-विरोधी’ और ‘जाति-वादी’ ठहराते हुए अपना पहला निशाना सीधे-सीधे आयोग के सोच पर ही साधा है। उनका दूसरा निशाना प्रदेश में चुनौती बन कर उभर रहा कांग्रेस-रालोद गठ-बन्धन है। माया ने सत्ता-धारी यूपीए के इन दो घटकों को भी पंजाब और उ० प्र० में अपने आदेश के ऐसे ही लपेटे में लेने की चुनौती आयोग को दे डाली है। लेकिन बाकी के सारे दलों की प्रतिक्रियाएँ कुल मिला कर ऐसी हैं कि औसत भारतीय सुरक्षित रूप से कह सकें कि उन्होंने मात्र औपचारिकता ही निभाई थी। ऐसे सोच के मूल में मुख्य भूमिका इन सारे ही दलों की उस इकलौती तात्‍कालिक विवशता ने निभाई है जो सभी के बीच सदा से, समान रूप से, मुँह बाये खड़ी रही है — वे अनिश्‍चय की इस भँवर से उबर नहीं पा रहे हैं कि चुनाव-परिणाम आने के बाद उन्हें न जाने किसके साथ बँधने को विवश होना पड़े!

स्पष्‍ट है, ओछे राजनैतिक एजेण्डा के लिए ही सही, माया ने तो अपनी चुनौती उछाल दी है किन्तु बाकी के राजनैतिक दलों के अनिश्‍चय की इस भँवर ने चुनाव आयोग में विहित संवैधानिक व्यवस्था को अभी तक की सबसे यथार्थ अग्नि-परीक्षा से, एक बड़ी सीमा तक, राहत दे दी है। राहत इसलिए कि आयोग की कार्य-शैली से जुड़े दूर-गामी सवाल पर माया के अलग-थलग पड़ जाने से न तो आयोग को मुँह छिपाने के लिए सुविधा-जनक कुतर्क तलाशने पड़ेंगे और ना ही आयोग को यह चिन्ता सतायेगी कि उसकी सच्ची अग्नि-परीक्षा व्यापक जन-बहस की विषय-वस्तु बन जायेगी। फिर भी, लोक-तन्त्र में अपनी अडिग आस्था रखने वालों को आयोग की ऐसी राहत मात्र तात्‍कालिक ही लगती है। और, उनके पास इसके ठोस आधार भी हैं।

मेरी इन बातों से यह भ्रम होना स्वाभविक है कि मेरी स्वाभाविक निष्‍ठा माया के साथ बँधी है। लेकिन, ऐसा पूर्वाग्रह पाल लेने वालों को मेरा विनम्र सुझाव यह है कि वे इस सम्भावना पर विचार अवश्य करें कि उनकी यह प्रतिक्रिया कहीं मेरी बातों को बड़े सतही ढंग से देखने का स्वाभाविक परिणाम तो नहीं है? इस राज-नेता की कार्य-शैली और उसके गढ़े जीवन-दर्शन से अपनी सारी और बेहद सच्ची नाराजी के बावजूद इस सचाई को नकारना कतई असम्भव है कि माया ने आयोग की आँखों में आँखें डाल कर जो चुनौती उछाली है वह कतई व्यवहारिक है। परस्पर मतभेदों को परे रख कर देखें तो हम समझ पायेंगे कि ऐसा करते हुए माया ने देश के राजनैतिक पटल पर छाये उन सभी दलों और उनके बड़-बोले प्रतिनिधियों के मुखौटे तार-तार कर दिये हैं जो संवैधानिक संस्थाओं की निष्‍पक्षता की दुहाई देते, और अपनी-अपनी सुविधा के अनुकूल उनकी पीठ थप-थपाते हुए भी, थकते नहीं हैं। माया के साथ अपने स्वर बुलन्द करने में इनको केवल इसलिए संकोच हो रहा है कि माया का साथ देने का मतलब यही होगा कि तब उन्हें अधिक व्‍यापक और सार्थक सवाल उठाने होंगे। उन्हें डर है कि उनके उठाये इन सवालों का यदि ईमानदारी से निराकरण हो गया तो, भविष्‍य में कभी सत्ता-संतुलन अपने पक्ष में होने पर, वे स्वयं भी अनुशासन के इसी बाड़े में कैद होंगे! इसमें कोई संशय नहीं है कि ऐसा लोक कल्याण-कारी हल, पहली तो कोसों दूर, इन सब की आखिरी पसन्द तक नहीं है।

सतही नहीं किन्तु प्राथमिक मुद्दा तो यही है कि केन्द्रीय चुनाव आयोग ने ‘हाथी’ और ‘मायावती’ की मूर्तियों पर जो आदेश पारित किया है उसने यह तथ्य स्थापित किया है कि राज-कोष के मत्थे किये जाने वाले इस तरह के सारे ‘सार्वजनिक’ कार्य राजनैतिक जमीन कबाड़ने की ओछी राजनैतिक कोशिश से अधिक कुछ और नहीं होते हैं। और तब, इसी सन्दर्भ में सीधा सवाल यह है कि जन-कोष के ऐसे दुरुपयोग पर समय रहते ही लगाम क्यों नहीं लगायी गयी? सवाल जितना मासूम है उतना ही गम्भीर भी है। क्योंकि, यह नकारी नहीं जा सकने वाली सचाई है कि माया की यह हरकत समय रहते ही आयोग के ध्यान में लायी गयी थी और आयोग से निवेदन भी किया गया था कि वह इस पर अपना निर्देश पारित करे। लेकिन तब आयोग ने अपनी आँख और कान तो बन्द रखे ही, अपनी निष्‍पक्ष बुद्धि तक की बलि चढ़ा दी थी। सफ़ाई दी जा सकती है कि तब आयोग को ऐसा नहीं लगा था कि माया का कृत्य संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए राज-कोष के दुरुपयोग का ‘संवैधानिक अपराध’ था! इसके उलट, परोक्ष रूप से ही सही, अब आयोग यह घोषणा कर चुका है कि माया ने चुनावी लाभ हासिल करने के लिए राज-कोष को दोनों हाथों बरबाद किया था।

‘तब’ और ‘अब’ का यह अन्तर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्‍पक्षता पर उन सवालों को रेखांकित कर रहा है जो लोकपाल को लेकर मची अब तक की सबसे गम्भीर बहसों की धुरी है। किसी भी प्रकार की किसी अपमान-जनक टिप्पणी से ऊपर उठकर भी इस एक खु्ले तथ्य की अन-देखी नहीं की जा सकती है कि पहले माया यूपीए को बचाने वालों की सूची के शिखर पर थीं जबकि बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में उनका नाम यूपीए और नेहरू-गांधी परिवार की जड़ों में मट्‍ठा डालने में मदद करने वालों की सूची के शीर्ष पर है। तथ्यों का एक संयोग और भी है — आयोग ने पहले इस शिकायत की क्रूर अन-देखी की थी कि अपनी स्वयं की और पार्टी के चुनाव-चिन्ह हाथी की मूर्तियाँ सार्वजनिक स्थलों पर लगवाने में मायावती करोड़ों का राज-कोष लुटा रही हैं। तब आयोग की सोच शायद यह थी कि ‘मूर्ति’ वाले हाथी और ‘चुनाव-चिन्ह’ वाले हाथी में कोई तार्किक साम्य नहीं है। जबकि आयोग के ताजे निर्णय को सुनाते हुए मुख्य आयुक्‍त ने कहा है कि सूँड़ ऊपर हो या नीचे, हाथी रहता तो आखिर हाथी ही है!

माया के आरोपों की तपिश और कांग्रेस की बचावी मुद्रा वाले बचकाने बयानों की पूरी अन-देखी करते हुए, तर्क की सुविधा के लिए, यदि यहाँ यह मान भी लिया जाए कि न्यायिक या संवैधानिक निर्णयों में ‘सुधार’ एक स्वाभाविक प्रक्रिया है तो इसका स्वाभाविक निष्‍कर्ष यही है कि अब से यह नजीर ही आयोग का निर्णायक नजरिया रहने वाली है। सरल शब्दों में कहें तो, संवैधानिक प्रावधानों की अपने हिस्से की समीक्षा के इस स्वाभाविक विकास से आयोग पलटी नहीं मारेगा। आयुक्‍तों की नियुक्‍ति को लेकर अतीत में मच चुके गम्भीर बवालों के परिप्रेक्ष्य में, अब आयोग की निष्‍पक्षता की अग्नि-परीक्षा होगी। आयोग को प्रमाणित करना है कि उसके संवैधानिक निष्‍कर्ष किसी वैयक्‍तिक निष्‍ठा से नहीं बल्कि उसकी अपनी संस्थागत्‌ संवैधानिक निष्‍ठा से प्रेरित होते हैं क्योंकि भारतीय प्रजा-तन्त्र के जो नाजुक स्नायु-तन्त्र हैं, उनकी वास्तविक प्राण-वायु यह भाव ही है।

‘सूँड़ ऊपर हो अथवा नीचे, हाथी होता तो हाथी ही है’ वाला आयोग का आचार-संहिता दर्शन मात्र तात्‍कालिक नहीं ठहरना चाहिए क्योंकि ऐसा होते ही आयोग की निष्‍पक्षता रसातल में चली जाएगी। आयोग द्वारा स्थापित किया गया नवीनतम दर्शन लोक-हित और पार्टी-हित के बीच की बहुत बारीक सी लकीर को भी उसकी प्रतिष्‍ठा की भरपूर चमक प्रदान कर देता है। तमाम द्विविधाओं को पूरी दृढ़ता के साथ मिटा कर रख देता है। और जब इस तरह से देखा जाने लगे तो इसके ऐसे ढेरों गहरे राजनैतिक प्रभाव भी स्वयमेव दिखाई देने लगते हैं जिन्हें सत्ता पर काबिज हुए व्यक्‍तियों, गुटों अथवा राजनैतिक दलों के पक्ष में अभी तक तो नकारा ही जाता रहा है, भविष्य में भी यों ही नकारा जाता रहेगा। निम्न दो बहुत संक्षिप्‍त किन्तु उतने ही स्पष्‍ट उदाहरण बात को स्पष्‍ट करेंगे —

तमाम सरकारों का चरित्र है कि वे राज-कोष के माध्यम से लागू की गयी उनकी सभी ‘महत्वाकांक्षी’ योजनाओं और क्रिया-कलापों व स्थापित किये गये सभी भवनों-स्थलों का नाम-करण अपने-अपने प्रतीक बन चुके व्यक्‍तियों अथवा घटनाओं से जोड़ कर विज्ञापित करते हैं। इसमें कोई संशय या बहस नहीं है कि ऐसा करने के पीछे इन सबका मूल ध्येय केवल यह होता है कि वोटों के लिए झोली फैलाये घूमते समय वे इन विज्ञापनों को लहराते हुए मत-दाता को रिझा सकें। मुझे नहीं लगता कि माया की मूर्तियों और दूसरे तमाम दलों द्वारा लहराये जाने वाले इन लुभावने बैनरों में कोई तात्विक अन्तर है।

जाहिर है, इस समस्या के दो ही विकल्प हैं। पहला यह कि राज-कोष के उपयोग से होने वाले सभी जन-हित कारी कामों के नाम-करणों को उन ऐसे सभी प्रतीकों से पूरी कठोरता से मुक्‍त रखा जाए जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से राजनैतिक अखाड़े के वोट-कमाऊ पूत बन सकते हों। आयोग को चाहिए कि वह इस नीति को आने वाले समय के लिए बन्धन-कारी निर्देश बना दे। लेकिन, क्योंकि ऐसे पर्याप्‍त नाम-करण अतीत में पहले ही किये जा चुके हैं, किसी भी प्रकार के विरोधा-भासी संकट से उबरने के लिए पूरक व्यवस्था की तरह वह यह स्थाई निर्देश भी साथ–साथ लागू कर दे कि ऐसे नाम-करणों में जिन-जिन व्यक्‍तियों अथवा प्रतीकों का प्रयोग अतीत में किया जा चुका है, चुनावी प्रभावों के लिए, उनका प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रयोग सर्वथा वर्जित है।

‘हाथी होता आखिर हाथी ही है’ वाला आयोग-सिद्धान्त जिस सबसे पुराने विवाद की ओर ध्यान आकर्षित कर रहा है वह राष्‍ट्रीय ध्वज से जुड़ा है। सभी जानते हैं कि नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने स्वतन्त्रता-आन्दोलन के प्रतीक बन चुके तत्‍कालीन कांग्रेसी तिरंगे को, थोड़े से फेर-बदल के साथ, राष्‍ट्रीय ध्वज के रूप में प्रतिष्‍ठित कर दिया था। कांग्रेस के अस्तित्व को लेकर ‘गांधी-नेहरू विवाद’ में बिना पड़े हुए भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि नेहरू के नेतृत्‍व में कांग्रेस ने ऐसा इसलिए किया था कि गांधी के नेतृत्व में मिली स्वतन्त्रता के श्रेय को स्वतन्त्र भारत में दोनों हाथों लूटने का लायसेंस उसके हाथ में सदा के लिए आ जाए। यहाँ यह निर्विवाद है कि राष्‍ट्रीय ध्वज अपरिवर्तनीय है। तब, सवाल इतना ही बाकी है कि चुनाव-चिन्हों को आबण्टित और सुरक्षित करने वाला राष्‍ट्रीय चुनाव आयोग क्या कांग्रेस पर यह स्थाई प्रतिबन्ध लगाएगा कि वह अपने झण्डे के रूप में तिरंगे का प्रयोग नहीं करे? जैसा कि उसने माया के साथ किया है, शुरूआत के लिए आयोग यह प्राथमिक निर्देश तो तत्‍काल पारित कर ही सकता है कि उन पाँच राज्यों में, जहाँ चुनावी आचार-संहिता लागू की जा चुकी है, कांग्रेसी तिरंगे के किसी भी प्रकार के प्रदर्शन को तत्‍काल प्रभाव से रोका जाए।

जैसा कि हो-हल्ला मचाया ही जाएगा, यह कोई राजनैतिक विवाद नहीं है। इसके उलट, यह आयोग की अस्मिता और निष्‍पक्षता की ऐसी अग्नि-परीक्षा है जिसमें सफलता-असफलता का निचोड़ ही भारतीय लोक-तन्त्र की वास्तविक गरिमा तय करेगा।

(१५ जनवरी २०१२)