पद्म-सम्मान का अधिकारी नहीं, ब्लैक-लिस्टेड नागरिक

Sarokar

‘पद्म’ सम्मानों का जमीनी तथ्य यह है कि यह सम्मान किसी भारतीय के ऐसे प्राकृतिक, आधार-भूत या संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन्हें वह किसी न्यायिक चार-दीवारी के भीतर जाकर अपने लिए ‘सुरक्षित’ कर सके।

बासठवें गण-तन्त्र दिवस की पूर्व-सन्ध्या पर जब देश भर में अनुमानों के यह घोड़े दौड़ाये जा रहे थे कि इस साल किस-किस को ‘पद्म’ सम्मानों से नवाजा जायेगा और क्या देश को एक ऐसा नया ‘रत्‍न’ भी मिल पायेगा जिसके नामांकन की सह-मति में सरकार की गरदन सम्मान से झुकेगी; तभी एक दूसरी ऐसी खबर हवा में तैर गयी जिसकी गम्भीरता इतनी गहरी है कि एक स्वाभिमानी देश की आदर्श सरकार ग्लानि से अपनी गरदन झुका ले।

२६ जनवरी की सुबह देश को ‘भारत-रत्‍न’ तो नहीं मिला लेकिन यह जानकारी अवश्य मिली कि गम्भीर घोटाले से जुड़े एक मामले के प्रकाश में, अतीत में पद्म-सम्मानों के शिखर पर विराजित ‘पद्म-विभूषण’ से नवाजे गये, इसरो के पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर को सरकार ने अपनी ‘काली सूची’ में डाल दिया है। सूत्रों का कहना है कि अरबों-खरबों के एण्ट्रिक्स-देवास स्पैक्‍ट्रम महा-घोटाले में उनकी भूमिका को देखते हुए १३ जनवरी को ही अन्तरिक्ष विभाग ने यह आदेश जारी कर दिया था कि अब से नायर को कोई सरकारी जिम्मे-दारी नहीं सौंपी जाएगी।

स्वयं को इस तरह से काली सूची में डाले जाने पर नायर का तर्क है कि मुम्बई के गुनह-गारों तक को कई बार सुना गया लेकिन उन्हें तो खुद को निर्दोष प्रमाणित करने का एक भी अवसर नहीं दिया गया। नायर ने दावा किया है कि वह पहले आरटीआई के आसरे पूरी जानकारी हासिल करेंगे और फिर अपना अगला कदम उठाएँगे।

एक वैज्ञानिक के इस रोदन में सचाई कितनी है और आँखों में धूल झौंकने की कितनी घड़ियाली मंशा, यह सब तो एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही पता चलेगा लेकिन इस पल का ज्यादा अहम्‌ तथ्य यह है कि ‘पद्म-विभूषण’ का अलंकरण इस सरल सी सरकारी स्वीकृति का प्रतीक है कि उसकी निगाह में किसी ने देश-हित में कितना परिश्रम और त्याग किया है? इस हिसाब से, नायर का नाम काली-सूची में डालने और इस ‘काली भेड़’ को कोई सरकारी जिम्मे-दारी देने से बाधित करने से, यह तो स्थापित हो ही गया है कि सरकार व सरकारी दस्तावेजों की दृष्‍टि में नायर ने देश-व्यापी सम्मान का अधिकार खो दिया है।

‘पद्म’ सम्मानों का दूसरा जमीनी तथ्य यह है कि यह सम्मान किसी भारतीय के ऐसे प्राकृतिक, आधार-भूत या संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन्हें वह किसी न्यायिक चार-दीवारी के भीतर जाकर अपने लिए ‘सुरक्षित’ कर सके। दूसरे शब्दों में, यह सम्मान मात्र सरकार की सहमति अथवा अ-सहमति का मोहताज है। तब देश के आम जागरूक मानस में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि भारत सरकार के अन्तरिक्ष विभग द्वारा नायर को काली-सूची मे डाले जाने के दिन १३ जनवरी से लगाकर २६ जनवरी तक, जब सरकार यह खुश-खबर घोषित कर रही थी कि सौभाग्य के धनी वे भारतीय कौन हैं जिनको इस साल पद्म-सम्मानों की सूची में रखा गया है, यह घोषणा करने से सरकार चूक कैसे गयी कि नायर से पद्म-विभूषण का मान-सम्मान छीन लिया गया है?

अभी तक यह तो उजागर हो ही गया है कि ऐसा नहीं हुआ है लेकिन यह देखना अब भी बाकी है कि ‘देर आये लेकिन दुरुस्त आये’ वाली कहावत कभी चरितार्थ होगी भी कि नहीं? और, यदि होगी भी तो कितने बार, या कितनी गहराई से, धिक्‍कारे जाने पर?

(२७ जनवरी २०१२)