क्या भोपाल में सायनाइड बम का परीक्षण किया गया था?

Ateet Ka Jharokha

क्या संयन्त्र में भण्डारित रसायनों की भूमिका केवल घोषित उपयोग तक ही सीमित थी? या फिर षडयन्त्र-कारियों ने इन रसायनों के अपने स्वतन्त्र प्रभावों के अध्ययन की भी सम्भावना सोच रखी थी? और इसीलिए, टेक्सास स्थित अमरीकी सरकारी संस्थान ‘डिसीज कण्ट्रोल सेण्टर’ ने भोपाल टेलेक्स सन्देश भेज कर इलाज-विशेष का लम्बा-चौड़ा नुस्खा सुझाया था?

तीस साल पूरे होने के बाद भोपाल के यूनियन कार्बाइड संयन्त्र से निकली जहरीली गैस के सिल-सिले में मरने-बीमार पड़ने के आँकड़ों की चर्चा अब बेमानी है। राहत या कल्याण के सरकारी दावे बेहद लचर हैं। लेकिन बुजुर्ग फ़ॉरेन्सिक विशेषज्ञ डॉ० हीरेश चन्द्र और उनकी तरह से सोचने वालों के इस आरोप की जाँच-पड़ताल आज कहीं अधिक सामयिक हो गयी है कि उस भयावह गैस के रिसने का कारण मानवीय असावधानी से घटी दुर्घटना नहीं बल्कि सोच-समझ कर रचा गया ‘वार-गैस’ का प्रायोगिक परीक्षण था।

तत्काल मौत देने के मामले में हाइड्रोजन सायनाइड की क्षमता निर्विवाद है। लेकिन रासायनिक युद्धक साधन की तरह ‘मारक गैस’ के रूप में इसकी उपयोगिता की एक गम्भीर सीमा भी है। दरअसल, यह गैस वातावरण की हवा से हल्की होती है। और इसलिए, जल्दी ही उठ कर ऊपरी वातावरण में चली जाती है। हाइड्रोजन सायनाइड का यह भौतिक गुण रासायनिक बम के रूप में उसके उपयोग को बहुत उत्साहित नहीं करता। इसके उलट, मिथाइल आइसोसायनेट (एमआईसी) हमारे वातावरण की हवा से भारी है और ठण्डे-आर्द्र मौसम में यह जमीन पर, हवा की निचली सतह के रूप में, बहुत देर तक बनी रह सकती है।

यों तो, एमआईसी का जहरीला प्रभाव भोपाल गैस काण्ड के बाद अब, किसी सीमा तक ज्ञात हो चुका है लेकिन क्रिटिकल ताप-क्रम (२४० अंश सेल्शियस) के बाद उसके रासायनिक प्रभावों के बारे में खुली किताबों और फ़ाइलों में कुछ भी पढ़ने को नहीं मिलता। एक बात और भी है — एक बार क्रिटिकल ताप-क्रम में आने (अर्थात्‌ एक बार वैपर से गैस में बदलने) के बाद, कम से कम साधारण परिस्थितियों में तो, एमआईसी न तो पुन: वैपर में बदलती है और ना ही द्रव रूप में आती है। साथ ही, किन्हीं विशेष रासायनिक परिस्थितियों में, ३०० अंश सेल्शियस पर १४ प्रतिशत्‌ एमआईसी हाइड्रोजन सायनाइड में बदल जाती है जबकि ५०० अंश सेल्शियस से ऊपर के ताप-क्रम पर १०० प्रतिशत्‌ एमआईसी हाइड्रोजन सायनाइड बन जाती है।

भोपाल गैस काण्ड ने सिद्ध किया है कि पानी, ठण्डक और गैसीय एमआईसी की उपस्थिति में हाइड्रोजन सायनाइड एक विशेष भौतिक गठ-जोड़ करती है। सरल भाषा में इसका अर्थ यह है कि एक विशेष स्थिति में एमआईसी, हाइड्रोजन सायनाइड और पानी के अणु एक-दूसरे में भौतिक रूप से गुँथ से जाते हैं और इस तरह, हाइड्रोजन सायनाइड हल्की होने से वातावरण में ऊपर जाने का अपना सामान्य गुण छोड़ कर पानी और एमआईसी के साथ मिला कर बने दूधिया बादल के रूप में जमीन के ठीक ऊपर वाली सतह में बड़ी देर तक बनी रह सकती है। इससे हाइड्रोजन सायनाइड की मारक-क्षमता कल्पनातीत रूप से बढ़ जाती है।

इसका एक दूसरा अर्थ भी है — हाइड्रोजन सायनाइड तुरन्त मौत देगी और बची हुई जिन्दगियों को एमआईसी गैस के अज्ञात रासायनिक गुण गहरे, और सम्भवत: आनुवांशिक रूप से भी, प्रभावित करेंगे। कल्पना कीजिए कि एक खोल में द्रव एमआईसी और कुछ विशेष रासायनिक उत्प्रेरक भर कर तथा उसके चारों ओर पर्याप्त मात्रा में पानी भर कर बनाये गये एक विशेष बम को ऊँचाई से पटका जाए तो क्या होगा? बम के फटने से उत्पन्न ऊर्जा से एमआईसी पहले वैपर में परिवर्तित होने लगेगी। यह अपने आप में एक विशेष रासायनिक क्रिया होगी जिसे ‘रन-अवे रिएक्शन’ यानि कि रासायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा स्वयं मूल रासायनिक परिवर्तन को बहुत अधिक गति देने वाला रिएक्शन कहते हैं। इससे अर्ध-वाष्पीकृत पानी, एमआईसी गैस और हाइड्रोजन सायनाइड का जो एयरोसॉल बनेगा उससे अधिक मारक युद्ध-रसायन, फिल-हाल, दुनिया में खुले रूप में तो ज्ञात नहीं है।

सवाल अनेक हैं। और सभी के सभी अभी तक अनुत्तरित ही बने हुए हैं। जैसे —

Carbide Plant- After the hazardक्या २-३ दिसम्बर १९८४ की ठण्डी और ओसीली रात में भोपाल में इसी बम का प्रायोगिक परीक्षण किया गया था? ३ दिसम्बर की दोपहर, बताते हैं कि, गर्मी के दिनों जैसी गरम हो गयी थी। और, जैसा कि बुजुर्ग फ़ॉरेन्सिक विशेषज्ञ डॉ० हीरेश चन्द्र का दावा है, क्या इस परीक्षण में प्रयुक्त कम से कम चौदह ज्ञात और उतने ही अज्ञात गुण-धर्म वाले रसायनों की भूमिका केवल हाइड्रोजन सायनाइड के बनाने तक ही सीमित थी? या फिर, इन रसायनों के अपने स्वतन्त्र प्रभावों के अध्ययन की सम्भावना भी षडयन्त्र-कारियों ने सोच रखी थी? क्या इसीलिए, टेक्सास स्थित अमरीकी सरकारी संस्थान ‘डिसीज कण्ट्रोल सेण्टर’ ने महज अपनी कल्पना और तदनुसार उपजे विवेक की आड़ में आनन-फानन एक टेलेक्स सन्देश भेज कर, विशेष रूप से सायनाइड के विषैले प्रभाव के लक्षण पाये जाने की स्थिति में, इलाज का लम्बा-चौड़ा नुस्खा सुझाया था जिससे सायनाइड की उपस्थिति और व्यापकता का आकलन तो हो ही जाये पीड़ित हुए नागरिक, यथा-सम्भव संख्या में, उनके मेटाबॉलिज्म पर सायनाइड के पड़े बुरे प्रभाव से मुक्त भी किये जा सकें? क्या यह सुझाव इसलिए भी दिये गये थे कि बाद में इन लोगों पर सतत्‌ निगरानी रख कर अन्य रासायनिकों के स्वतन्त्र रूप से उन पर पड़ने वाले धीमे लेकिन लम्बे और गहरे प्रभावों को आगे भी मॉनीटर किया जा सके?

सम्भवत: इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आरम्भ में, विभिन्न प्रत्यक्ष तथा परोक्ष हथ-कण्डों से, गैस-प्रभावितों से नमूने इकट्ठे किये गये। और फिर, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की आड़ में, इसी नीयत से प्रकारान्तर से पूरे अमरीकी नियण्त्रण वाले भानपुरा स्थित गैस-राहत अस्पताल में सालों तक पूरी वैधानिकता के साथ सारी गुप्त तथा अवैध जाँच-पड़ताल की गयी। रहस्यों की मोटी चादर में लिपटी इस जाँच-पड़ताल का हमें उतना ही पता चलेगा जितना बतलाना अमरीकियों को पसन्द होगा। वह भी केवल तभी जब वे ऐसा करना पसन्द करेंगे। शासकीय सेवा में रहे तत्कालीन फ़ॉरेन्सिक विशेषज्ञों के बीच उस दौर में परस्पर हुई आरोपों-प्रत्यारोपों की अत्यन्त गम्भीर बौछारों से सामने आयी बातों में यदि थोड़ी सी भी सचाई रही हो तो एमआईसी की चपेट में आये मृतकों के हजारों विसरा-अवशेषों को षडयन्त्र-कारी अमरीकियों को अनैतिक रूप से बेच तक दिया गया।

कारण चाहे जो रहे हों, सरकार की मंशा एकदम स्पष्ट थी — मौत तथा बीमारी की फैल चुकी और दबायी न जा सकने वाली खबरों के अलावा अन्य किसी भी जानकारी की सारी सम्भावनाएँ, दोष-रहित ढंग से, समाप्त कर दी जायें। पहले प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री अर्जुन सिंह की पहल पर चलाया गया ‘आस्था अभियान’ और फिर भोपाल गैस-विभीषिका (दावा-कार्यवाही) अधिनियम, १९८५ को पारित करवाने की हड़-बड़ी, तथा इस अधिनियम का अन्तर्निहित विरोधाभास भी; अपने आप में इसी मंशा के अकाट्य प्रमाण हैं। बाद के दिनों में सरकार की भूमिका इन प्रमाणों को केवल पुष्ट ही करती है। अपने इस दूषित प्रयास में, सरकार ने अपनी जिम्मेदारी के सारे चिकित्सकीय/वैज्ञानिक तथ्यों, प्रमाणों और साक्ष्यों को कोशिश कर के पहले तो छिपाया और फिर नष्ट भी किया। सरकार की अनिच्छा के बावजूद, इक्का-दुक्का ही सही, जिन चिकित्सकों-विज्ञानियों ने मृतकों के विसरा, खून, टिश्यू आदि के नमूने अपनी शासकीय नौकरी की जिम्मेदारी में सुरक्षित रखे थे; उन्हें जल्दी से जल्दी सेवा-मुक्त कर उनके द्वारा संरक्षित सभी महत्व-पूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों को भी नष्ट कर दिया गया।

गैस-प्रभावितों के दावों का आधार शासकीय दस्तावेज ही होते। इनके कानूनी रूप से व्यवस्थित नहीं होने के तर्क से न्यायालय को स्वयं सरकार ने ही सन्तुष्ट किया था। यह विडम्बना ही है कि इसके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी निर्धारित होने के स्थान पर उल्टे सरकार ही मुआवजा-राशि को अपनी इच्छा, योजना और गति से नियन्त्रित करने का अधिकार पा गयी। और अब, देश के प्रति अपने गम्भीरतम्‌ सामाजिक अपराध को छिपाने के लिए सरकारी अमला सरकारी अमला, कम से कम राशि को अधिकतम्‌ लम्बी तथा जटिल न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही प्रभावितों के बीच वितरित करने तथा इस मुआवजा-वितरण में सर्वथा अनैतिकता से भर-पूर स्वेच्छा-चारिता अपनाने का भी, एक दूसरा अपराध कर रहा है। हादसे के पहले दिन से लेकर आज तक, कभी भी, ऐसा अवसर नहीं आया जिससे लगे कि सरकार, अन्य कारणों के अलावा, ऐसा इसलिए भी कर रही है ताकि सन्दर्भ-विशेष में यूनियन कार्बाइड से वसूली गयी नाम-मात्र की मुआवजा राशि को पर्याप्त कहने के अपने तत्कालीन पाप को गैस-पीड़ितों के व्यापक हित वाले किन्हीं इतर कामों के लिए भी बचा लिये गये पर्याप्त धन के तर्क के सहारे छिपा सके!

सरकार ऐसे छद्म संकेत अवश्य देती रही है कि वह यूनियन कार्बाइड के विरुद्ध सिविल अथवा क्रिमिनल मुकदमा लड़ने की मंशा रखती है लेकिन इतने बड़े तथा सभ्य समाज को भौंचक कर देने वाले भीषण रासायनिक हादसे को देश के औसत से फैक्ट्री एक्ट या श्रमिक हादसे एक्ट जैसा रूप देने के भर-पूर प्रयास से तिल भर भी आगे कभी नहीं बढ़ी। दिखावे और लीपा-पोती के इन प्रयासों में दो-चार लेबर इंस्पेक्टर, फैक्ट्री इंस्पेक्टर और एक प्रादेशिक श्रम मन्त्री की बलि अवश्य चढ़ा दी गयी।

Waren Andersonयूनियन कार्बाइड के पास, लायसेंस प्राप्त अपने उर्वरक बनाने की प्रक्रिया में कम से कम अट्ठाइस रसायनों के उपयोग का, न तो कोई तर्क रहा और ना ही उसने इसकी कोई सूचना या जानकारी २ दिसम्बर ८४ की रात के हादसे से पहले सरकार को कभी दी। इतना ही नहीं उसने तो हादसे के बाद भी उसके प्रभावों से निपटने के लिए अज्ञानता के अँधेरे में महज अनुमान के हाथ-पैर मारते विज्ञानियों-चिकित्सकों को इसकी कोई जानकारी किसी भी स्तर पर कभी नहीं दी। तो फिर क्या हाइड्रोजन सायनाइड और एमआईसी के मिले-जुले प्राण-लेवा प्रयोग के साथ ही इन अज्ञात रसायनों के अपने स्वतन्त्र प्रभावों के अध्ययन की सम्भावना भी षडयन्त्र-कारियों ने पहले से ही सोच रखी थी?

इस बीच यूनियन कार्बाइड, पाँच सौ बिस्तरों वाले अस्पताल की आड़ में, एक नया विवाद लेकर आ गयी। उच्चतम्‌ न्यायालय की मध्यस्थता में हुए समझौते में यूनियन कार्बाइड को गैस-प्रभावितों के इलाज के लिए भोपाल में ५०० बिस्तरों वाला एक अस्पताल बना कर सरकार को सौंपना था। कानूनी दाँव-पेंच और उनके पीछे काम कर रही नीयत की बानगी के लिए इस प्रक्रिया के आरम्भ पर सर-सरी निगाह ही पर्याप्त है। भोपाल अस्पताल न्यास नाम से एक सर्वथा नये न्यास का गठन हुआ। कार्बाइड के विश्वास-पात्र कोई सर इयान परसीवल इसके एक-मात्र न्यासी मनोनीत हुए। १९९१ के आरम्भ में यूनियन कार्बाइड ने कहा था कि इस अस्पताल के निर्माण में वह ५० करोड़ रुपये लगायेगी। फिर, फरवरी १९९२ में कहा गया कि अस्पताल बनाने में ६० करोड़ रुपये लगेंगे। १९९६ आते-आते जहाँ एक ओर यूनियन कार्बाइड की नजर में यह आँकड़ा १८३ करोड़ को छू गया वहीं उसका यह सर्वथा नया पक्ष भी सामने आ गया कि यह राशि उसे आपराधिक प्रकरण की कार्यवाही के दौरान न्यायालय द्वारा कुर्क किये गये उसके शेयरों की बिक्री में से हासिल हुई उस राशि में से चाहिए जो न्यायालय में जमा है।  सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में, न्याय-विधि का मजाक उड़ाने का इससे अधिक भोले मुखौटे वाला, किन्तु अत्यन्त संस्कारित, तरीका प्रजा-तान्त्रिक मूल्यों का मुखौटा रखने वाले राज-तन्त्रों में भी ढूँढ़ने पर नहीं मिलेगा।

यूनियन कार्बाइड के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी समाप्त करा लेने के अपने सोचे-समझे षडयन्त्र में (केन्द्र में सरकार बदल जाने से) असफल रहने के बाद सरकार अब रसायनों की पहचान और उनके नमूनों के परीक्षण का विरोध कर रही है। भोपाल हादसे से जूझने में जी-जान से जुड़े लेकिन बाद के दिनों में सरकारी और अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय द्वारा जान-बूझ कर उपेक्षित कर दिये गये ख्याति-लब्ध फ़ॉरेन्सिक विज्ञानी डॉ० हीरेश चन्द्र का यह दावा मुझ तक भी पहुँचा कि रिसन से पहले यूनियन कार्बाइड के परिसर में (बिना सरकार के ज्ञान में आये) विभिन्न प्रजातियों के प्रयोग-शालेय जानवरों पर जिस तरह के रहस्य-मय रासायनिक प्रयोग चल रहे थे, उसी श्रेणी के कार्बाइड-प्रायोजित प्रयोग दुनिया के कम से कम पाँच अन्य केन्द्रों में और भी चल रहे थे। डॉ० हीरेश चन्द्र के अनुसार, इन सारे प्रयोगों में कोई भी न तो अपने आप में पूरा था और ना ही उन तथा-कथित वैज्ञानिकों को, स्वयं भी, अपनी इन जाँच-पड़तालों के पूरे परिप्रेक्ष्य का कोई भान था जो ‘प्रोजेक्ट’ तथा ‘प्रोजेक्ट फण्ड’ के नाम पर केवल बड़ी रकमों के लिए इनसे जुड़े थे। सारा आयोजन रक्षा-उत्पादों या बौद्धिक प्रयोगों की, एक-दूसरे से असम्बद्ध और अपरिचित विभिन्न केन्द्रों पर, सहज प्रतीति देती किन्तु ऐसी रहस्य-मयी गोपनीयता से संचालित था जो योजना-पूर्ण गति-विधियों की हद तक नियन्त्रित थीं। इनमें से एक केन्द्र को तो, बिना किसी भूमिका अथवा प्राथमिक जानकारी के, विभिन्न जानवरों के पहले से निकाले हुए अंग-प्रत्यंग ही प्रयोग-वस्तु के रूप में दिये गये थे परन्तु निष्कर्षों के कुछ विशेष स्तर तक पहुँचते ही प्रायोजक (यूनियन कार्बाइड) ने आगे और ‘फण्ड’ न दे कर, सहज से दिखने वाले तरीके से, आगे की जाँच-पड़ताल पर रोक लगा दी थी।

न्याय की एक मान्य परम्परा है जो हमारे देश में भी आदर पाती है। उसके अनुसार वकालत-नामों की सारी स्वीकृतियों के बा-वजूद यदि अभिभाषक अपने मुवक्किल के हितों पर जान-बूझ कर आधात पहुँचाता है, और यदि मुवक्किल इसे सिद्ध कर सकने की स्थिति में है, तो न केवल वकालत-नामे का अधिकार समाप्त कर स्वयं ऐसे अभिभाषक को व्यावसायिक दायित्व के कानूनी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है बल्कि उसकी बद-नीयती के कारण मुवक्किल के फैसला-बद्ध हो चुके किसी वाद को पुनर्विचार के लिए खोला भी जा सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि, अपने तमाम संविधान-विरोधी और अन्तर्निहित विरोधाभासी चरित्र के बाद भी, भोपाल गैस अधिनियम भारत सरकार की अभिभाषकीय भूमिका की जिम्मेदारी रेखांकित करता ही करता है।

अधिनियम की धारा तीन के अनुसार, “…केन्द्रीय सरकार ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का… उसी रीति से और उसी प्रभाव से, जो ऐसे व्यक्ति का है, प्रतिनिधित्व करेगी…।” पूरे प्रकरण के अन्तिम रूप से निराकरण से पहले क्या गैस त्रासदी का सबसे त्रासद्‌ सवाल यह नहीं रहा कि अधिनियम में धारा दो के ‘व्यक्ति के अन्तर्गत्‌ सरकार है’ जैसे पारिभाषिक प्रावधान के बा-वजूद क्षति-पूर्ति के दावों की राशि के निर्धारण और फिर उसके भुगतान की प्रक्रिया में ‘व्यक्ति’ की माँग के सन्दर्भ में ‘सरकार’ की ब तक की ‘व्यक्ति की पैरवी’ दरअसल, किन बिन्दुओं पर केन्द्रित थी?

Arjun Singhलायसेंस-अनुमति के सर्वाधिकारों का विशेषाधिकार रखने वालों की कानूनी जवाब-देही के सवाल ठीक तरह से उठने के पहले ही पता नहीं किन-किन के बीच हुई आपसी बात-चीत में मुआवजे की राशि को ‘बात-चीत’ से सुलझा लेने का शंकास्पद भरोसा राष्ट्र को दिया गया। और, गैस-प्रभावितों का दुर्भाग्य देखिए कि छलावे-भरा यह हथ-कण्डा चल भी गया! ऐसे मुद्दों पर कोई भी सार्थक बहस सरकार को, और किसी सीमा तक हमारी न्याय-प्रक्रिया को भी, कठिनाई में डालेगी। शायद इसीलिए, जल्दी से जल्दी इस पूरे मुद्दे को समाप्त करने के पुर-जोर प्रयास हुए। लेकिन क्या विधानत: ऐसा किया जा सकता था? उससे भी ऊपर, क्या सच-मुच ऐसा किया जाना चाहिए था?

मुआवजे के निमित्त ‘वसूली’ गयी राशि को सीधे गैस-प्रभावितों तक वितरण के अलावा क्या इसे इस हेतु निरर्थक रूप से बनाये गये और स्वयं को न्यायिक मानने वाले, लेकिन अन्यथा सीधे-सीधे प्रशासनिक, ताम-झाम के औपचारिक खर्च के खातों में भी लिया जा सकता था? क्या पीड़ितों के मुआवजे को सीधे-सीधे उसके हक़-दारों के हाथों में सौंपने के अलावा भी किसी अन्य तरह से खर्चा जा सकता था, फिर चाहे वे राज्य अथवा केन्द्र के कल्याण-कार्यक्रम ही क्यों न हों? जबकि सचाई यही है कि इतने बड़े औद्योगिक ‘हादसे’ को बड़ी सहजता से होने देने की नैतिक, तथा कानूनी भी, जवाब-देही सीधे-सीधे सरकारी तन्त्र पर ही ठहरती है। और केवल इसी एक ठोस आधार पर सारे के सारे ‘कल्याण-कार्यक्रम’, फिर वे चाहे कितने ही निरर्थक हों अथवा सार्थक, सरकार की अपनी ही जिम्मेदारी होने चाहिए थे।

प्रभावितों के मुआवजों के निमित्त वसूली गयी राशि से एक पाई भी इस अर्थ में ‘चुरा लेने’ का अधिकार सरकारी तन्त्र के पास सुरक्षित नहीं रहा था। क्या ऐसा करना अमानत में ख़्यानत जैसा गम्भीर अपराध नहीं है, फिर भले ही ऐसा करने वाली संस्था स्वयं केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार ही क्यों न हो? क्या स्वयं अपनी ही खुफ़िया जाँच एजेन्सी सीबीआई द्वारा इस बात का स-प्रमाण दावा किये जाने के बाद कि कार्बाइड को उच्चतम्‌ स्तर पर रिसन की सम्भावना का पहले से पता था, भारत के नागरिकों की ओर से यूनियन कार्बाइड के विरुद्ध आये आपराधिक तथा अन्य प्रकरणों में ‘व्यक्तियों’ की वाजिब कानूनी माँगों का विरोध कर और दावे-दारों का चिकित्सकीय परीक्षण करा कर अथवा चिकित्सकों की गवाही आदि ले कर, विशेष रूप से अधिनियम की धारा तीन और चार के परिप्रेक्ष्य में, अधिनियम के माध्यम से बलात्‌ आत्म-सात किये व्यक्तियों के अधिकारों को वापस व्यक्तियों को सौंप देने के संकल्प से स्वयं केन्द्रीय सरकार ने सम्बन्धित न्यायालयों को अवगत्‌ नहीं करा दिया था?

भोपाल काण्ड की वास्तविक त्रासदी तो यह है कि सारी शंकाओं और उपलब्ध जानकारियों के बाद भी उसे केवल वैयक्तिक क्षति-पूर्ति और स्थानीय परिप्रेक्ष्य तक ही सीमित रखने के निहित प्रयास सफल रहे। लेकिन एक सैद्धान्तिक मुद्दा आज भी है जिसका उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास सच में कभी हुआ ही नहीं — क्या रसायनों के इस संदिग्ध महा-प्रयोग के तीन महीनों के भीतर हड़-बड़ी में पारित, तथा व्यक्ति को सरकार में समाहित, करने वाला अधिनियम मानवता के विरुद्ध रासायनिक युद्ध के इतने विशाल परीक्षण की अन्तर्राष्ट्रीय जाँच से बचाव की पात्रता भी दे देता है? इसी महा-मुद्दे का एक दुखद पहलू यह भी है कि अन्तर्राष्ट्रीय जाँच-पड़ताल के ठेके जिस तरह से निहित स्वार्थों ने हथिया रखे हैं क्या उसकी जमीनी सचाइयाँ ऐसी किसी सार्थक व यथार्थ अन्तर्राष्ट्रीय जाँच को मूर्त होने भी देंगी?

इसी से जुड़ा एक प्रश्न यह भी है कि क्या यूनियन कार्बाइड का पक्ष लेने से भारत सरकार भी रसायनों के इतने बड़े अमानवीय प्रयोग के लिए अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी के किसी सक्षम मंच के समक्ष जवाब-देह नहीं हो गयी है?

(समय चेतना, जनवरी १९९६ से सम्पादित)