पर उपदेश …!

डॉ० ज्योति प्रकाश

दर्पण से विमुख के मुखर बोल

सूचना के अधिकार के स्थापना दिवस पर आज मध्य प्रदेश के एक शहर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में छपे एक ‘विशेष’ आलेख को देख कर भौंचक रह गया! इसमें बड़े पुरजोर लहजे में यह सियापा पढ़ा गया था कि बीते पन्द्रह सालों में ‘सूचना का अधिकार’ जनता को कोई राहत नहीं दिला पाया है!

इसे लिखने वाले महानुभाव स्वयं भी म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयुक्त का पद-भोग चख कर सेवा-मुक्त हुए हैं। इसीलिये उनसे बिल्कुल सीधे-सपाट यह सवाल किये बिना नहीं रह पा रहा हूँ

“जब आप स्वयं ही इस आयोग में पीठासीन हुआ करते थे तब क्या अपने ‘आत्मा-विहीन’ शरीर को लेकर वहाँ बिराजते थे?”

यह सवाल इसलिए क्योंकि जब यह महाशय स्वयं ही इस आयोग में पीठासीन हुआ करते थे तब इनके समक्ष अपना पक्ष पूरी प्रबलता से रखने वाले असन्तुष्ट सूचना-आवेदकों की आम प्रतिक्रियाएँ कुछ ऐसी होती थीं जैसे कि, केवल इन्हें ही ज्ञात कारणों से, उस दिन यह अपनी आत्मा को पद की गरिमा के अनुकूल मिले सर्व-सुविधा युक्त सरकारी आवास की किसी खूँटी पर टाँग आये थे!

और, यह सवाल सीधे इनसे ही इसलिए क्योंकि केवल यही बतला सकते हैं कि उक्त मंशा की प्रतिक्रियाएँ देने वाले निराश जन तब यथार्थ के धरातल पर खड़े होते थे? या फिर, अपने तथा-कथित हित सध नहीं पाने की स्वाभाविक सी खीझ उनसे यह रूप धरवाती थी?

(१२ अक्टूबर २०२०)