Category: सरोकार

यथार्थ में भारत-वंशी हैं आज के अधिकांश यूरोपीय

Atithi-Vichar

बीती ५ दिसम्बर को भोपाल में धर्मपाल शोध-पीठ, मध्य प्रदेश ने अपने तत्वावधान में आमन्त्रित अतिथियों के बीच एक अनौपचारिक बात-चीत का आयोजन किया था। वैश्विक ताकतों की स्व-हितैषी नीति के विशेष परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से भारतीय हितों को संरक्षित करने के लिए विभिन्न व्यक्तियों तथा स्थानीय संगठनों को बौद्धिक रूप से सचेत और सक्रिय करने की नीयत से आयोजित इस बात-चीत में एक विषय यह भी उठा था कि ‘बेहतर नस्ल’ होने का यूरोपीय दावा कितना खोखला है। Continue reading

मतलब की खेती : ‘दाल’ नहीं ‘कमाई’ काटते राज-नेता

Sarokar

हमारा सोच आर्थिक-व्यापारिक अधिक हो गया है। वह नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम्’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। Continue reading

स्वयं को अधिनियम से ऊपर मानने लगा है म० प्र० राज्य सूचना आयोग

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न्यायिक इतिहास का यह पहला अवसर था जब न्यायिक निराकरण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त कोई पीठ किसी प्रकरण में अपना अन्तिम निराकरण आदेश परित कर देने के बाद, स्वत: प्रेरित और/अथवा स्फूर्त हो कर उसी प्रकरण की सुनवाई को नये सिरे से आरम्भ करने वाली थी। Continue reading

मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग : काम के ना धाम के, अढ़ाई मन अनाज के!

Sarokar

लगता है कि म० प्र० राज्य सूचना आयोग में या तो अधिनियम की वैधानिक समझ के लिए आवश्यक रहने वाली आधार-भूत योग्यता के स्थान पर अ-योग्य और अ-पात्रों की भी नियुक्तियाँ हुई हैं या फिर ऐसे सारे व्यक्ति जानते-समझते हुए अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों की पूर्ति में अड़ंगा डालने की नीयत से कार्य कर रहे हैं। Continue reading

म० प्र० राज्य सूचना आयोग : सवाल वही पुराना

Sarokar

अधिनियम के व्यापक हित में है कि मेरे उठाये आज के सवाल पर आयोग की ओर से ही तथ्यों का कोई त्वरित स्पष्टीकरण आये। आयोग की चुप्पी का अर्थ होगा कि अधिनियम की सार्थकता म० प्र० राज्य सूचना आयोग के विद्यमान ढाँचे में सुरक्षित नहीं है। तब, महामहिम राज्यपाल महोदय पर संवैधानिक कदम उठाने का दबाव डालना पड़ेगा। Continue reading

खेत बदौलत जिये इन्सान, फिर क्यों भूखा मरे किसान?

Sarokar

राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील में अधिकांश ग्राम पंचायतों में किसानों की खरीफ फसल प्राकृतिक आपदा का शिकार हो चुकी है। यहाँ ऐसे किसान उँगलियों पर ही गिने जा सकेंगे जिनकी खरीफ फसलें खेतों से खलिहानों तक पहुँचेंगी। और, पहुँचेंगी भी तो इतनी जिसे ठीक-ठाक कहा जा सके। किसानों ने खड़ी फसल के खेतों को भी हाँकना शुरू कर दिया है। Continue reading

राज्य सूचना आयोग : क्या स्वयं आयोग के भीतर है अधिनियम की सही समझ?

Sarokar

अधिनियम के बन्धन-कारी पालन की दुर्भाग्य-जनक उपेक्षा के लिए क्या केवल विभिन्न सरकारी विभाग ही जिम्मेदार रहे हैं? क्या म० प्र० राज्य सूचना आयोग की अपनी भूमिका इस जिम्मेदारी से कतई मुक्त रही है? सम्भवत:, ऐसी ही किसी सामाजिक पीड़ा के मूल्यांकन के बाद इस पुरातन उक्ति ने जन्म लिया था कि ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे!’ Continue reading

सूचना आयोग से पलट-सवाल

Bahas

खबर है कि आयोग के एक फैसले में कहा गया है कि अधिकारियों को अधिनियम समझ नहीं है। ऐसे में एक पलट-सवाल करने की सूझी है — क्या आयोग के अपने ही अधिकारियों में अधिनियम की ठीक-ठीक समझ है? यह उलट-सवाल इसलिए कि मुझे, और आयोग की अन्तर्दशा से अच्छी तरह परिचितों को भी, इसके बारे में पर्याप्त आशंका है। Continue reading