झण्डे और डण्डे का उल्टा-पुल्टा

Fourth Pocket

देश में झण्डे का परिचय पहली क्लास से ही शुरू होता है। अब तो, पास होना भी जरूरी नहीं रह गया है। रहता था तब भी कौन सा जरूरी था कि गरीब का बच्चा स्कूल जाये। खुद हिसाब लगाकर देख लीजिए। झण्डे का सही-साट लगाना कुल पापुलेशन में से कितनों को आता होगा?

क्या पहुँचा हुआ और क्या औसत? क्या गली और क्या मोहल्ला? जहाँ देखो वहीं। जिसे देखो उसमें। बौखलाहट सब दूर एक सी है। उबल पड़ें, सन-सनाएँ या कि बस सुगबुगा कर ही रह जाएँ? तय नहीं हो पा रहा है। बात ही कुछ ऐसी है।

नहीं, इस देश के भले मानुषों के भेजों में सन्त-फ़कीर नहीं घुस गये हैं जिनको लेकर मैं कोने में बैठा खुद-ब-खुद बड़-बड़ा रहा हूँ। ना ही गुण्डों-मवालियों को लेकर आपसे मुखातिब हुआ हूँ। यह तो पढ़े-लिखों के बीच की खासुल-खास बातें हैं जो रह-रह कर परेशान कर रही हैं। लेकिन, अभी के अभी, यह भी साफ करता चलूँ कि पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के बढ़ा दिये गये दाम अब जब आम आदमी को ही परेशान नहीं करते तो मुझे क्या ख़ाक करेंगे? वैसे भी, इस बारे में जो कुछ भी हो-हल्ला मचता है वह मीडिया की कम और पॉलिटिक्स की ही अधिक देन होता है।

खैर, मैं देश के झण्डे के उल्टे लटकाये जाने के आधे-अधूरे से बवाल की बखिया उधेड़ने भी नहीं बैठा हूँ। समझदार हूँ। सो, यह तो समझ ही गया हूँ कि इतना बड़ा देश है। झण्डे में भी, होने को तीन-तीन रंग हैं। ऊपर से डिजाइन में ऐसी कुछ मोटी-मोटी खासियत भी नहीं कि एक-दम से उल्टे-सीधे की बारीकी पर आँखें गड़ जायें। फ़्रीडम-फ़ाइट के दौर में इतना तो था कि चरखे का उल्टा-सीधा होना मूरख से मूरख की पकड़ में तुरन्त ही आ जाता था। बरतानी हुकूमत से निजात क्या मिली, कौमी तिरंगे से चरखे को भी रुख़सत होना पड़ा। बैठे-ठाले नयी मुसीबत गले मढ़ गयी। गनीमत है कि सफ़ेद बीचों-बीच है। अशोक का चक्र भी बिल्कुल बीच में। लेकिन यही गनीमत फजीहत बन जाती है। तिरंगे के रंगों के क्रम को याद रखो। साधुई भगवे को ऊपर रखें कि फकीरी हरे को?

सभी जानते हैं। देश में झण्डे का परिचय पहली क्लास से ही शुरू होता है। अब तो, पास होना भी जरूरी नहीं रह गया है। रहता था तब भी कौन सा जरूरी होता था कि गरीब का बच्चा स्कूल जाये ही। गया भी हो तो कौन सी गारण्टी है कि वहाँ पढ़ाने वाले मास्साब पढ़ाने आये ही हों। और फिर, आये भी हों तो सच में पढ़ाया भी हो। सो, स्कूल ना जा पाये देश के पूतों की संख्या किसी तरह से जा पाये बाल-गोपालों से अधिक ही रही है। सदा। इसमें नाम-वजीफ़े के लिए गये जरूर लेकिन मास्टर जी से दाल-दलिये और नगद-नारायण का, मास्टर जी का ही पकड़ाया, हिसाब हाथ में थामे घर लौटे हुओं की गिनती को जोड़ दें तो सारा गणित बिल्कुल उल्टा-पुल्टा जाता है। खुद हिसाब लगाकर देख लीजिए। झण्डे का सही-साट लगाना कुल पापुलेशन में से कितनों को आता होगा?

और हाँ, अब तो पूरा मुल्क ही इस भगवे-सब्ज की नौंक-झौंक में फुँक-फुँक रहा है। सियासत-दानों की रैलियों-जलसों में बेचारे आम आदमी के दिमाग का भूसा बन चुका है। इस विकट कन्फ़्यूजन की भँवर में आम-फहम तो खैर आम ही है, खासुल-खास सियासत-दाँ भी गच्चा खा जाते हैं। जिस माहौल में जाते हैं, उसी के शीशे में खुद को उतारने की परीक्षा में पास होने की सियासती मजबूरी में कौमी तिरंगे के उल्टे-पुल्टे की गफ़लत होना न तो नयी बात रह गयी है और न खास। ऐसे में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान जाकर तो यह छोटी-मोटी पॉलिटिकल गफ़लत गहरायेगी ही। सो, अपने गृह मन्त्री की ‘दोस्त से’ दुश्‍मन पड़ोसी गृह मन्त्री के साथ हुई मीटिंग में यह एक छोटी सी ‘होते ही रहने वाली’ मानवीय भूल एक और दफ़ा हो ही गयी तो इस पर ऐसी हाय-तौबा क्यों? फिर, चिदम्बरम साहिब का भी फ़ालो-अप बयान आ गया है कि मामूली सी यह भूल खुद उन्होंने पकड़ी थी और एकदम तुरत ही उसे दुरुस्त भी करवा लिया था। हाँ, इतनी देर जरूर हो गयी कि कुछ छिद्रान्वेशी खबर-नबीसों ने फोटू खींच-खाँच ली। सो क्या? मामला रफ़ा-दफ़ा होना ही है। मैं क्यों इसमें अपने हाथ जलाने बैठूँ?

चलिए, साफ कर ही दूँ। मेरे दिमाग में इस समय कौमी झण्डे की नहीं बल्कि मैडम के डण्डे को लेकर मची हाय-तौबा की बातें उमड़-घुमड़ रही हैं। बातें सीरियस हैं। सच में। इसीलिए अपनी नाक घुसेड़ने में कोई लिहाज नहीं पाल रहा था। लगता है कि मेरे सीरियस कहते ही आप भी कुछ-कुछ सीरियस होने लगे हैं। नहीं, वैसी कोई चिन्ता मत कीजिए। बात डण्डे की जरूर हैं। वह भी मैडम के डण्डे की। लेकिन, इसका यह कैसा मतलब? इतिहास से मिले सबक को याद जरूर रखिये। बाल-बच्‍चों को भी यह सबक सुनाते रहिये। कोई नुकसान नहीं। लेकिन इतना ध्यान भी जरूर रखिये कि ऐसा कोई यूनिवर्सल रूल नहीं है कि हर ‘मैडम’ और हर किसी ‘डण्डे’ से जुड़ी ऐसी-वैसी बात या तो सास से जुड़ी होगी या फिर बहू से।

जी हाँ, इस बार गली-गली, कूचे-कूचे में मची बौखलाहट खालिस विदेशी और सौ टंच पक्‍की-सच्ची महारानी से जुड़ी है। मैडम का जग-प्रसिद्ध औपचारिक डण्डा आधी दुनिया देखते-दिखाते भारत पधार ही गया है। ‘क्वीन्स बैटन’ के नाम से। कोई चार सालों से बचे हुए फिरंगियों के देशी अनुचरों की, खतम सी होती, खास जमात का कलेजा तो जैसे जुड़ा ही गया। लेकिन विघ्‍न-सन्‍तोषियों की भी अपनी एक चाल है। अपना लहजा है। हमेशा ताक में रहते हैं। कुनबे के बाहर के भी और कुनबे के अन्दर के भी।

ऐसे ही एक दिल-जले घर वाले ने अलाप छेड़ ही है। कभी ‘मैडम के ही होने’ को साबित करने में तत्पर रहे मणिशंकर ने न जाने किस कारण से गुलाटी मार दी है। छोटी सी तीली को सुलगा कर तिनको को हवा देना शुरू कर दिया है। आज के छोटे से होकर रह गये इस बड़े पॉलिटिकल आदमी ने अचानक ही एक बहुत बड़ा बोल ठोंक दिया है! महारानी के इस डण्डे की आगत और स्वागत को लेकर सरकारी अमले और उनके पॉलिटिकल आकाओं की ‘गुलामी से भरी-पूरी सोच पर’ गम्भीर सवाल जड़ दिया है। यों, कहा कम है लेकिन इशारा बड़ा गहरा किया है। बौखलाहट तो मचनी ही थी। मचनी शुरू भी हो गयी है।

फिर भी सोचता हूँ, इतिहास गवाह है। यह मामला भी, ले-देकर, रफ़ा-दफ़ा हो ही जायेगा।

(०४ जुलाई २०१०)