आखिर मुग़ालते ही तो होते हैं मुग़ालते!

Fourth Pocket

सच तो केवल यह है कि मुग़ालते सम-दर्शी और सम-भावी होते हैं। किसी एक आदम-जात, गुट या पार्टी की बपौती नहीं है मुग़ालतों पर। यह तो खुली खेती है। मुफ़्त की जमीन पर और बिना धेला खरचा किये की जा सकने वाली।

यों, गाना खासा पुराना है फिर भी बरबस याद आ गया। ‘वादे हैं, वादों का क्या?’ लेकिन मेरे बताने से पहले, अपने ही मन से यह सोच कर भूल करेंगे कि साठ का होते ही मुझे बर-बस बचपना याद हो आया।

गाना क्या, गाने का लब्बो-लुबाब है। बोले तो, जिन्दगी का फलसफ़ा। और, फलसफ़े को कोई दूसरा भले भूल जाये, बन्दा कैसे बिसरा सकता है? यह बात अलहदा है कि मुग़ालतों को ही फलसफ़ा मान लेने वाले आज के जन-सेवकों की जमात गिनती में बन्दे जैसों पर बहुत भारी बैठेगी। याने, मुग़ालते हैं मुग़ालतों का क्या? धेला भी खरचे बिना झोली भर लो। पाल लो। एक-दो-दस नहीं, हजारों-हजार। कहते हैं, पहले यह महारत केवल मुँगेरी लालों में पायी जाती थी। गिनती के होते थे। लेकिन, अब तो गली-कूचे के छुट-भैये तक इनका लुत्फ़ उठाने लगे हैं। यहाँ तक कि आज के मुग़ालता-वीर मुग़ालते पालते भर नहीं, उनकी शेखी बघारने में भी जुट गये हैं! यानि कि, मुग़ालते अब केवल स्वान्त:-सुखाय नहीं रहे। पब्लिक को मूँड़ने और विरोधी को जलाने-कुढ़ाने के औजार हो गये हैं। डायरेक्‍ट हो या इन्डायरेक्‍ट, रौब पक्का-पूरा गठना चाहिए। यही इनका सिम्पल सा फलसफ़ा है।

भरोसा न हो तो देशी अखबारों की बीते दिनों की कतरनें टटोल लें। वही जो, क्या छर्रा और क्या गोला, सत्ता के गलियारों में भटकते रूलिंग पार्टी के हर हाथ में थमी फाइलों में सहेज कर रखी मिल जायेंगी। अपने पीएम की अमरीकी प्रेसीडेण्ट द्वारा की गयी वाह-वाही की खबरें जो पीएम के साथ विदेश-यात्रा का सुख भोग कर ओब्लाइज़्ड हुए खबर-नबीसों ने अपने-अपने देशी अखबारों-चैनलों की ओर से आम जनता को परोसी हैं। सच्ची-झूठी, अब या तो पीएम-प्रेसीडेण्ट जानें या जानें वे खबर-नबीस!

लेकिन, इस हल्की सी बात ने मेरे मन में इतना बबन्डर नहीं खड़ा किया है कि वह कोई भूला-बिसरा गाना गुनगुना उठे। बात है तो मुग़ालते से जुड़ी लेकिन खास है। पर नहीं, बीते समय की और एकदम भुला दी गयी बात कुरेदने जुट जाऊँ ऐसा बे-सऊरा नहीं हूँ। इसलिए, राज-नैतिक मुग़ालतों का वह चैप्‍टर नहीं दिखाऊँगा जिसमें लिखा है कि कैसे बरुआ भाट के चमचा-गायन से एक समय की महान ‘इण्डिया’ ने यह मुग़ालता पाल लिया था कि पूरा देश उनके पीछे खड़ा है। जबकि, इस राज-नैतिक भरम की परीक्षा करने बैठी उस बेचारी मोहतरमा के सामने जब तक यह सचाई आयी कि पूरा देश, दरअसल, उसके पीछे पड़ा था तब तक तो वह चुनाव हार गयी। बस, जेल जाते-जाते किसी तरह बच पायी थी।

ना ही मुझे इस याद ने उद्वेलित किया था कि कैसे पाले-पोसे मुग़ालतों के चलते एक दूसरी ‘कुड हैव बीन प्राइम मिनिस्टर’ एक ‘कमजोर और लिज-लिजे’ से अपने दरबारी को साथ लेकर महामहिम के सामने सीना ताने खड़ी हुई। एक अदद प्राइम मिनिस्टीरियल सीट की माँग करते। पर महामहिम ने पूरी सज्जनता से न केवल कोर्ट-संविधान की सहज सुई से उसकी फुस्सी फोड़ी बल्कि उसी का आइना भी दिखाते हुए उसे इतना कुछ खरा-खोटा सुना दिया कि उस बेचारी अबला के विदेशी मन में देशी संविधान का कुछ ज्यादा ही गहरा भय बैठ गया। इतना गहरा कि बाहर निकलकर, डिप्रेशन में डूबी मुस्कान बिखेरते, उसने देश को बताया कि उसका अपना वह दरबारी मिनिस्टर ही अब पीएमी की भावी सौगन्ध लेगा!

बताते हैं कि काटजू-शुक्ला की फैलायी राज-नीति की माया में फँसकर डीपी मिश्रा ने एक समय नेहरू के खिलाफ सीना ठोंकने का ऐसा मुग़ालता पाला कि उनके लिए कांग्रेस में घुसना तक दूभर हो गया था। यह तो इन्दू बिटिया को पार्टी की सदारत सौंपने की मजबूरी सामने आ गयी जो जवाहर ने उन्हें घर में दुबारा घुसने दिया।

लेकिन इन उदाहरणों से यह भी मत मानिये कि मैं ऐसा कोई राज-नैतिक प्रपंच कर रहा हूँ कि साबित करूँ कि मुग़ालतों पर एक अदद कांग्रेस का ही सर्वाधिकार रहा है। सच तो यह, और केवल यही, है कि मुग़ालते सम-दर्शी और सम-भावी होते हैं। किसी एक आदम-जात, गुट या पार्टी की बपौती नहीं है मुग़ालतों पर। यह तो खुली खेती है। मुफ़्त की जमीन पर और बिना धेला खरचा किये की जा सकने वाली। देखिये ना, अमर मुग़ालते में ही रह गये और जया (बच्चन) मुलायम से टिकिट और सीट दोनों पा गयीं। जयललिता और करुणानिधि के मुग़ालतों की तो पूरी की पूरी शृंखलाएँ ही हैं राज-नैतिक गठ-जोड़ों की। क्या अकाली, क्या चौधरी और क्या ठाकुर, बामन, यादव या दीगर लोहियाइट? उत्तर भी अटा पड़ा है, मुग़ालतों से। देखें तो, इन मुग़ालतों का अ-सहनीय होता जा रहा बोझ न जाने कितने सालों से ढो रही है हमारी संसद्‌।

बीजेपी ने भी क्या कम मुग़ालते पाले हैं? औरों की कौन कहे, जिस राम को पकड़ा उसी को छोड़ दिया। जरूरी लगा तो एक बार फिर से पकड़ लिया। दाहिने और बाँये खूँटों के फेरे भी लगा लिए। ऐसा भी दिखा दिया कि लौट कर नागपुर झाँकेंगे भी नहीं। लेकिन फिर, उल्टी साँस, नागपुर का ही सुर चला मारा। मुग़ालते नहीं तो और क्या कहेंगे इन पैंतरों को? बात बहुत पुरानी नहीं है। सन्यासिनी मुख्य मन्त्री ने मुग़ालता पाल लिया कि वे पार्टी में अ-परिहार्य हो गयी हैं। सो, पहले तो राज-नैतिक पैंतरे-बाजी करते हुए ‘महज कुछ दिनों के लिए’ सीएम की कुर्सी किसी को सौंप दी। जेल हो आयीं और बाहर भी आ गयीं। भूल गयी थीं कि कुर्सी आखिर कुर्सी होती है। ऐसे कभी किसी को फिर वापस मिली है जो उन्हें मिल जायेगी?

खुदा ख़ैर करे! अब तो विधायिका-कार्यपालिका से बाहर झाँकने की जुर्रत करती भी दिख जाती है मुग़ालते की यह राष्‍ट्रीय बीमारी।

चलिए, बिना धीरज की और परीक्षा लिए साफ कर ही दूँ कि म० प्र० भाजपा के नये-नये बने सदर ने फरमाया है कि वे पद बाँटने की मशीन बन कर रह गये हैं! गोया, कम्प्यूटराइज़्ड वैंडिंग मशीन को मुग़ालता हो गया कि वह माल की वैंडिंग अपनी मर्जी से कर सकती है। है ना, आज का सबसे बड़ा मुग़ालता? कम्प्यूटर प्रोग्रामर को जैसे ‘गोबर-गणेश’ साबित कर देने का मुग़ालता!

(११ जुलाई २०१०)