बलिहारी इस ईमान (दारी) की!

Fourth Pocket

घुटे-छँटे राज-नैतिक श्रेष्‍ठि अपनी बे-नकाबी के आसन्‍न गहरे संकट को, काम के अतिरेक से उपजी रोजमर्रा की भुला दी जाने वाली, छोटी-मोटी ना-कामयाबियों की तरह जनता के सामने रखने की बिसात बिछाने जुट गये हैं।

राज-नेता बे-वजह ही राजनीति के शिकार होते हैं। पर शायद नहीं। ‘राज-नीति’ एक बड़ी वजह है आज के राज-काज में। इसे बे-वजह मानना मेरी भूल है। सो, अभी के अभी क्षमा माँगे लेता हूँ।

वैसे, क्षमा माँगने से ध्यान आया कि ‘क्षमा माँगना’ तो राज-नेताओं के लिए पान की गिलौरी मुँह में देने जैसी तुच्छ बात है। बस, फ़ायदा देती हो। यानि, बैंक-बैलेंस बढ़ाती हो। माँग लेंगे। कौन याद रखता है कि किसने और किस चौखट पर कितने हजार बार नाक रगड़ी थी? अब, मेरे इस कहने को आप दो-धारे अर्थ में ले जाते हैं तो ले जायें। अपनी तरफ़ से मैं यह साफ़ कर देता हूँ कि ‘बैंक’ से मेरा मतलब वोट-बैंक था, मुद्रा-बैंक नहीं। क्योंकि, वैसा कहने का मतलब भ्रष्‍टाचार का आरोप लगाने जितना सिरियस है। और, एक अदना से आम आदमी में इतनी हिम्मत कहाँ कि वह सचाई जानते हुए भी ऐसा कर पाये? राज-नेताओं की बात और है, वे तो ‘न सूत न कपास, जुलाहों में लठा-लठी’ वाली खान-दानी घुट्‍टी पीकर ही पनपते-बढ़ते हैं।

देखिये ना! न कोई दस्तावेज, न कोई गवाह। ‘लोटस’ नाम के बेनामी स्विस खाते का आरोप उछाल दिया। आरोप को भर-पूर कैश कराया और बे-शर्मी से भूल भी गये कि कैसी फुस्सी निकली? इमरजेन्सी में जयपुर महल के आँगन-चौबारों की खुदाई करके रात के कर्फ़्यू में ऊँटों की कतारों में खजाने को लूट ले जाने का आरोप गरमाया। वह भी धरा का धरा रह गया। बोफ़ोर्स के गोले अपने ही पीएम पर दागे। दनादन। एकाध इलेक्शन छोड़ कर कोई खास असर नहीं दिखा पब्लिक में। सो, खीसें निपोरते उसे ही बोफ़ोर्स तोप की ना-काबलियत का पैमाना साबित करने की राजनीति में भिड़ गये। वह तो भला हो तवारीखी दुश्मन पाकिस्तानी सदर का, कारगिल में हाथ डाल दिया। तोप को सचमुच की तोप साबित होने का मौका दे दिया। एक और निहायत राज-नैतिक आरोप की फुस्सी निकल गयी। यों, देखने वाले इसमें भी राज-नीति का अजब खेल दिखा सकते हैं। तोप दागी वाजपेयी ने, वाह-वाही लूटी राजीव ने!

प्रताप कैरो से लेकर छोटे-बड़े बादल तक और देवीलाल से लगाकर हुड्‍डा-चौटाला तक पंजाबी मिट्‍टी के तमाम नये-पुराने सपूतों पर राज-नीति से प्रेरित आरोपों की क्या कम बौछारें पड़ी हैं? लेकिन नतीजे वही सिफ़र के सिफ़र। कोर्ट ऑफ़ लॉ में कुछ भी नहीं ठहरा। कश्मीर पर भी यही सब हुआ। अब्दुल्लाओं और सईदों जैसे लोकल पॉलिटिकल बन्दों की कौन कहे, नेहरू भी आरोपों की गहरायी में ढकेले गये। पर कहने को, एकदम बेदाग निकले।

लालू हों या मुलायम, करुणानिधि या जयललिता, रामाराव या चन्द्राबाबू, देवगौड़ा या सीवाईआर, आडवानी या महाजन। गोवा तो ट्रेडिशिनल भण्डार ही साबित हुआ है, एक से बढ़कर एक आरोपों के घेरे खींचे जाने का। शुक्र है उस ऊपर वाले का, जिसके बारे में ही अब यह शुबहा किया जाने लगा है कि वह है भी या नहीं; ये सभी के सभी ‘ऊपर वाले’, और इन जैसे ही सारे के सारे आला रहनुमा भी, बेदाग निकले हैं। बैक-ग्राउण्ड में चाहे जो कुछ भी रहा-किया हो, देशी डेमोक्रेसी के रिकॉर्ड पर तो यही दर्ज हुआ है कि देश ने इन पर लगे हर आरोप को न-कार दिया था। महज ‘राज-नीति से प्रेरित’ हुआ मान कर।

हर पका हुआ राज-नेता इस पॉलिटिकल फलसफ़े को तहे दिल से मंजूर करता है। दरअसल, यही उसकी असली राज-नैतिक ताकत है। पार्टी और कार्य-कर्त्ता तो निचली सीढ़ी के औजार हैं। ‘असली’ ताकत रहेगी तो पार्टी, कार्य-कर्त्ता और मत-पेटी में पड़ते वोट कभी कम नहीं होंगे। यही है इस पॉलिटिकल फण्डे का बीज-मन्त्र। इस गुरु-मन्त्र को जिस-जिसने दिलो-दिमाग़ में मढ़ रखा है, वह तो वह, उसकी पीढ़ियाँ तक ऐश के हिण्डोले झूलती हैं। कभी-कभार कुछ ‘राज-नैतिक’ बाधायें आती जरूर हैं लेकिन वे भी उसकी ‘असली ताकत’ के आगे ठहर नहीं पाती हैं।

हाँ, वक्‍त ने एक नयी समस्या जरूर खड़ी कर दी है। कुछ अ-परम्परागत्‌ इन्सान भी अब इस जुए में बाजी लगाने उतरने लगे हैं। बीते कल की नहीं, एक-दम ताजी खबर को ही याद कर लें। मिस्टर मोदी, अरे गोधरा फ़ेम नरिन्दर भाई नहीं आईपीएल वाले ललित भाई, ने कोर्ट की चौखट में दाखिला लिया है। अपने निलम्बन को चुनौती देने का पाँसा फेका है। इतने साल गल-बहिय़ाँ की हैं पवार, प्रफ़ुल्ल, नरेन्द्र, लालू, अबदुल्ला और जेटली के साथ। सब के सब धुरन्धर गोटी-बाज। सो उनके पाँसे देखे भी हैं और कुछ-कुछ सीख भी लिये हैं। ‘संगत गुन, फल अनेक’ चरितार्थ करने जुट गये हैं। यानि, मियाँ की जूती, मियाँ के सिर करने की ठान ली है। नयी आशा दिखने लगी है, भोले भारत-वासी को। कोई नयी दिशा खुलेगी देश की।

वैसे आम नागरिक ही नहीं, घाघ राजनेता भी शायद इसी सोच में घिर गये लगते हैं। घोर निराशा से घिरा आम आदमी तो आशा से उस ओर ताक रहा है। लेकिन घुटे-छँटे राज-नैतिक श्रेष्‍ठि भय-भीत होकर उस ओर देख रहे हैं। कोई नयी सी चाल चलने की जरूरत समझने लगे हैं। अपनी बे-नकाबी के आसन्‍न गहरे संकट को, काम के अतिरेक से उपजी रोजमर्रा की ऐसी भुला दी जाने वाली, छोटी-मोटी ना-कामयाबियों की तरह जनता के सामने रखने की बिसात बिछाने जुट गये हैं। यकीन करने को दिल ना करे तो जरा मेरे ऐंगिल से देखिये —

आईसीसी की सदारत फ़ाइनली कबूलने से पहले तक शकर-सम्राट पवार देश को भरोसा दिलाते थक नहीं रहे थे कि इस नयी वैश्‍विक जिम्मे-दारी के बाद भी वे देश-सेवा को उसी तरह उपलब्ध रहते आयेंगे, जैसे अभी हैं। लेकिन नयी कुर्सी पर बिराजते ही जैसे बोधिसत्‍व हो गये। पीएम से बा-कायदा निवेदन किया कि उनकी जिम्मे-दारियाँ कम करें। लगा, जैसे क्रिकेट के किसी ट्रेडीशनल जैंटिल-मैन की संगत पाकर सच बोलने की हिम्मत पा गये हों। तभी, शागिर्द बीड़ी-किंग प्रफ़ुल्ल भाई का निवेदन भी सामने आ गया। ताजे-ताजे अतीत में झाँकें तो दोनों महारथी आईपीएल के घोषित आरोपी मोदी के दायें-बायें खड़े पाये जा चुके थे। पर्दे के पीछे। बचने के रास्ते बहुत सँकरे और दु:साध्य हैं। ऊपर से, बड़े मियाँ को सोचे समझे तरीके से मँहगायी बढ़ाने के, तो छोटे मियाँ को देशी उड़न-खटोलों को आज की दुर्दशा तक पहुँचाने के, लग रहे गम्भीर आरोपों की सफाई सूझती दिख नहीं रही थी। सो, काम का बोझ कम करने का पॉलिटिकल निवेदन उछाल दिया!

खुद ही आगे बढ़कर, प्रशासनिक ना-कामयाबियों को काम के अतिरेक से उपजी हुई विवशता बतलाते हुए, अपनी बे-नक़ाबियों को इस तरह सफ़ाई से ढाँकना। है ना, शह और सम्भावित मात की परफ़ेक्‍ट सादगी से भरी एक शानदार राजनैतिक बिसात?

(१८ जुलाई २०१०)