रीडिंग बिटवीन द लाइन्स

Fourth Pocket

बैक-ग्राउण्ड में वर्ल्ड-कप के तमाशे की ज्वाला की धधक थी। ‘कौन जीता, कौन हारा’ से कतई परे। भला हो, आक्‍टोपस बाबा का! इसी ‘परे’ होने में अ-लौकिक साम्प्रदायिक सद्‍भाव की अनपेक्षित गल-बहियाँ हिलोरें ले रही थीं।

सुहानी शाम की पहली चाय का मजा ठीक-ठीक ले भी नहीं पाया था कि पण्डित जी ने जैसे सारा कुछ किर-किरा ही कर दिया। हाँफ़ते-लुढ़कते हुए से जितना तेज दौड़ सकते थे, ठिले हुए से कोर्ट यार्ड में घुसे आये। मंजूर करता हूँ कि मन ही मन घबरा गया था। हो न हो, देश में फिर कोई उथल-पुथल मच गयी थी। डर लगा, जैसे एक नये साम्प्रदायिक तनाव का नोटिस फिर सर्व होने वाला है।

लेकिन, रहम सबसे ऊपर वाले का। कुछ अच्छे करम हमने भी किये ही होंगे। सो, चाय ठण्डी और बे-स्वाद होने से बच गयी! बल्कि, उल्टे कुछ ज्यादा ही कड़क और मजे-दार हो गयी। उखड़ती-सम्हलती साँसों से पण्डित जी ने जो कुछ उवाचा उससे तसल्ली हुई कि भारत जैसे अचानक ही जाति और सम्प्रदाय की संकीर्णता से ऊपर उठ गया था। तो क्या यह फुटबाल के महा-कुम्भ का प्रसाद था?

फु्टबाल का महा-कुम्भ मंजे वर्ल्ड-कप। लेकिन, एक समझ-दार को मेरी बात हजम नहीं होगी। मेरी इस सरासर ना-समझी पर सवाल दाग सकता है कि गुजर चुके वर्ल्ड-कप में ऐसा क्या खास हुआ था जो भारत में उथल-पुथल मचा दे? वह भी तब, जब आयोजन दक्षिण अफ़्रीका में हुआ हो और भारत उसमें खेल पाना तो दूर, उसके किसी स्टेडियम के बाहर की किसी सड़क के पास तक फटक भी न पाया हो।

यों, बात पेचीदा है लेकिन लब्बो-लुबाब तकुए की तरह बिला शक सीधा।

कन्धे पर झूलते सनातनी झोले से सुबह का अखबार निकाल गुस्से से फूत्कार करते पण्डित जी के क्रोध का सार था कि एक कोर्ट ने भगवान की पैसे-धेले की ‘व्यापारिक’ समझ को न-कार दिया था। कह दिया था कि भगवान अपना सारा ध्यान पूजा-अर्चना और प्रसादी पर ही केन्द्रित रखें। बिल्कुल वैसे ही, जैसे अभी तक करते आये हैं। इस दुनिया के किसी नये पचड़े में सीधे हाथ न डालें। क्योंकि, भगवान का अपना डीमेट खाता ‘कानूनन’ नहीं खोला जा सकेगा! तसल्ली के दो शब्दों से ब्रह्म-क्रोध को जरा ठण्डा कर कुछ और निचोड़ा तो मुद्दा आगे साफ हुआ। बैक-ग्राउण्ड में वर्ल्ड-कप के तमाशे की ज्वाला की धधक थी। ‘कौन जीता, कौन हारा’ से कतई परे। भला हो, आक्‍टोपस बाबा का! इसी ‘परे’ होने में अ-लौकिक साम्प्रदायिक सद्‍भाव की अनपेक्षित गल-बहियाँ हिलोरें ले रही थीं।

दरअसल, मैदानी तमाशे से बाहर भी एक तमाशा हुआ था इस बार। बिल्कुल इण्टर कॉण्टिनेण्टल एक-रूपता से। इसी ने जैसे भारत के नामी-गिरामी अतीन्द्रिय ‘ईश्‍वर-जीवी’ व्यवसाइयों की चूलें हिला कर रख दी थीं। वैसे, यही काम इस देश के मौसम-खगोल विज्ञानी सालों से करते आ रहे थे। पोथी-पत्रों के सहारे बताये जाने वाले मौसम-ग्रहण के प्रभावों का खुला मजाक उड़ाते हुए। यह दीगर बात है कि ऊपर वाले ने खुद इन अंग्रेजी पढ़ाकुओं की ही पढ़ाई-लिखाई का फालूदा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपने लौकिक प्रतिनिधियों पर भगवान की इसी ‘कृपा’ से आम धारणा बन गयी है कि भारत का मौसम विभाग जो कहे उससे उल्टी तैयारी करके चलो तो साल की बैतरणी पार लग जायेगी।

लेकिन, फुटबाल के इस महा-कुम्भ के दौरान मैदान के बाहर हुए ‘बाबा’ तमाशों ने भारत के अपने ‘बाबा-बाजार’ को गहरा सदमा तो दे ही दिया है।

तोता, मैना, ऊँट, कुत्ता, बैल, मगर और आक्‍टोपस बाबाओं ने भविष्‍य के एक लम्बे दौर के लिए हमारे यहाँ के दैवीय प्रतिनिधियों की रोजी-रोटी में अड़ंगे डाल दिये लगते हैं। इन्हें लगने लगा है कि जब बाबा पॉल आक्‍टोपस सटीक लाटरी बता सकते हैं तो कई-कई बार फेल हो चुके भभूत, लोभान या पोथी-पत्रों में झाँकने वाले इन भारतीय बड़-बोलों की ‘सेवा’ करने को आम धर्म-भीरु भारतीय अब कैसे तैयार होगा? जाति और धर्म से ऊपर उठकर ‘सर्व धर्म, सम भाव’ वाली रेयर साम्प्रदायिक एकता के अचानक सामने आये सुर इसीलिए भारत के कोने-कोने से उठने लगे हैं।

पण्डित जी मेरे पास आये थे कि भभूत, लोभान या पोथी-पत्रों में झाँकने वाली भारी भरकम ईश्‍वर-जीवी बिरादरी समझ चुकी थी कि हिन्दू हों या मुसलमान, सिख हों या फिर ईसाई; धर्म-भीरु समझा जाने वाला आम भारतीय अब उन जैसों की नहीं सुनेगा। वे सन्देशा लाये थे कि, उनकी और उनके जैसे अतीन्द्रिय व्यवसाइयों की नजरों में, देश के आम आदमी में मेरी विश्‍वसनीयता अभी भी कायम है। वे सभी चाहते थे कि मैं इस भरोसे-मंदी का कुछ हिस्सा ‘कैश’ कराकर उनकी मदद करूँ।

वैसे, इसके लिए वे सब्सटेंस देने को तत्पर थे। दोनों तरह से। कन्विंसिंग सपोर्टिव मैटीरियल देकर भी और उनके जैसों की मारी जाने वाली भविष्य की इनकम की ‘पुनर्स्थापना’ का हिस्सा देने का वायदा करते हुए भी। और उनके हिसाब से, बदले में मुझे कुछ खास नहीं करना था। मुझे तो बस, उनके द्वारा सप्लाई की गयी खबरें जनता के खुले दरबार में परोसना भर थीं। खबरें भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, निखालिस सच्‍ची। उसी फुटबाल वर्ल्ड कप की फेल हुई कुछ भविष्य-वाणियों की खबरें। बस, लहजा मेरा अपना हो। जैसे यह कि, अमरीकी कुत्ते मैरविक को जब फ़ाइनल में जीतने वाले देश की भविष्‍य-वाणी करने के लिए बुलाया गया तो उसने खालिस अमरीकी चरित्र का पालन करते हुए दोनों ही देश के कटोरों में रखी केक चट कर डालीं और ‘थैंकू-थैंकू मूर्खो’ वाली शाश्‍वत्‌ अमरीकी मुद्रा में मुस्कुराती अपनी दुम बाकी दुनिया को लहराकर दिखा दी।

सितारों की चाल को बाँचने वाली भारतीय बिरादरी मानती थी कि इससे आदमी-जनावर का हिसाब बराबर हो जायेगा! बात में दम थी। स्टेक पर करारी रकम थी। और सामने था कृष्ण की अश्‍वत्थामा वाली उद्‌घोषणा का पाक-साफ उदाहरण। लेकिन, इधर दिल सौदे को मान नहीं रहा था। रट लगाये था कि मेरे जैसों को इस फेर में नहीं पड़ना चाहिए। उधर बुद्धि लगी थी कि पैसे के लिए ना सही, देशज मान के लिए तो यह कर ही सकते हो। और बुद्धि का भी अपना एक जोर होता है। जाहिर है, मुझे मँझ-धार में फँसा देख पंडित जी मेरी जैसी ही कोई और चौखट खट-खटाने चले गये। लगा, आज की रात तारों को गिनते बीतेगी।

लेकिन नहीं। शाम के अखबार में खबर आयी कि आक्टोपस बाबा रिटायर हो गये हैं। अब जीत-हार की भविष्य-वाणी नहीं करेंगे। गोया, गुनी-ज्ञानियों की आत्मा की कलप देख सट्‍टे-बाज को दिव्य ज्ञान हो गया। कि, ‘फिसल पड़े की हर गंगे’ बार-बार करने में टाँगें टूटने का जोखिम तो रहता ही है। कि, बिल्ली का भाग्य कितना भी प्रबल क्यों न हो इसकी गारण्टी नहीं कि हर बार छींका टूटा ही मिले!

(२५ जुलाई २०१०)