हमारी ब्राण्ड न्यू पहचान

Fourth Pocket

हम पर इन्वेस्ट किया जा सकता है। एक-दम बे-खौफ़। अपनी यह नयी इण्टर-नेशनल पहचान कायम करने में सफल हो ही गये हैं हम। कथनी के क्यूट से मुखौटे के पीछे करनी के भयावह चेहरे को छिपा पाने की एक-दम अन-पैरेलल पहचान!

ख़्वाबों की बात छोड़ दें तो, हकीकी दुनिया में जेब में डाल कर घूमने को एक भी बड़ा नोट नहीं रहता है। लेकिन, लिखने-लिखाने के फ़रिस्ते की मेहर से हकीक़त के एकाध सच-मुच के बड़े दुनिया-दारी आदमी से साबका पड़ ही जाता है। और, अपनी किसी न किसी अटकी पर वह इस जान-पहचान को, अपनी जरूरत भर, निभाता भी है।

ऐसे ही किसी परिचय की झोली बीते कुछ समय से भरी हुई सी है। गाहे-बगाहे, अपनी पसन्दीदा किसी होटल पर चाय की चुस्कियों पर वह ले भी जाता है। एक-दम जबरन। ऐसे ही, एक दिन जिद करने लगा कि घर आओ, सुबह की चा वहीं चुस्‍केंगे। लगा, मेरी किसी करतूत से खुश हो गया होगा। अनुभव ने सिखाया है कि ऐसी खुशी परमानेन्ट नहीं होती है। वक़्त की हवा की तरह झौंके में आती है और झौंके में ही चली भी जाती है। सो, हवा थामी नहीं यूँ ही ढीली छोड़ दी। लेकिन, ऊपर वाले को यह मंजूर नहीं था। न्यौता आये दिन रिपीट किया जाने लगा। विवशता बढ़ गयी तो एक सुबह उनकी चौखट की बैल दबाने पहुँच ही गया।

सुबह क्या? सूरज आधा तो चढ़ ही चुका था। लेकिन जानता था, बड़े वालों की सुबह के लिए यही बखत फिक्स है। वह तो गनीमत थी कि उसने बता कर रखा था। इसलिए, जब चाकरों की पूछ-गच्छ की औपचारिकता पूरी कर भीतर बैठक में पहुँचा तो आँखें मलते हुए वे खुद भी पधार गये। पर, दुआ-सलाम के बाद फारिग होने की पाँच मिनिटी बड़प्पनी इजाजत ले तुरत भारी-भरकम गुसल-खाने घुस भी लिए। समझ गया। घर चाय पिलाने नहीं, इम्प्रैस करने बुलाया था।

टेंट के ही नहीं, ठाठ-बाट के भी बड़े आदमी थे। गुसल-खानों में भी टीवी, रेडियो और फोन के इनके किस्से मशहूर थे। डर गया कि इतने बड़े आदमी हैं तो फारिग होने में बड़ा समय लेंगे। पर नहीं। वे तो कोई तीन मिनिट में ही ‘यूरेकी! यूरेकी!!’ चिल्लाते दौड़े आये। कुछ समझ नहीं पाया तो मुँह फाड़े उज-बक की तरह उनको ताकने लगा। मेरा अ-ज्ञान वे समझ गये। आर्कमिडीज़ का बीता वाकया पूरा सुना कर समझाया कि कैसे ‘यूरेका! यूरेका!!’ चिल्लाते हुआ वह सनकी विज्ञानी बाथ-टब से राज-महल तक दौड़ा था। फिर बताया कि ‘यूरेका’ का मतलब ‘मिल गया’ होता है। लेकिन ‘यूरेकी’? मेरे मूर्खता भरे इस सवाल पर ठहाका मारते हुए बोले भाई, यह उसकी स्‍त्री-लिंग है। यानि, वह चिल्लाया था, ‘मिल गया’ और मैं ‘मिल गयी’ चीखा था! गनीमत मानी, ये बस, टॉयलेट सीट से उठ कर भागे थे…।

लेकिन, ऐसी क्या चीज थी जो बिल्कुल आर्कमिडीज़ की नाईं इन्हें गुसल-खाने में मिली थी? बूझा तो, संक्षेप में बताया कि ताजी खबर सुनकर आये थे कि देश को एक ब्राण्ड न्यू ‘पहचान’ मिल गयी थी! हाँ, डिटेल पूछने-बताने के पहले उन्हें कोई निहायत अरजेण्ट काम निकल आया। सो, वे ड्रेस-अप होने भीतर घुस लिए और हमें एक प्याली चाय की तलब लिए घर-वापसी डालनी पड़ी।

चाय के इन्तजार और बीबी के तानों के बीच दिमाग उस लिस्ट में उलझ गया जो देश की किसी ‘यूरेकी’ पहचान का खुलासा कर सकती हो। तो क्या, पाकिस्तान के विदेश मन्त्री की कृष्‍णा साहिब पर की गयी ‘होम-वर्क करके न आने’ की कुछ ज्यादा ही तल्ख टिप्पणी को दुनिया ने सीरियसली ले लिया था? या, हेडली की बताई बातें दुनिया को बताने को लेकर आये अमरीकी बयान से उभरी वादा-खिलाफ़ की तस्वीर ही हमारी पहचान मान ली गयी थी? या फिर, एक ही दिन देश की तीन-तीन स्टेट असेम्बलियों में हुड़-दंग जैसी होने की खबरों से दुनिया भर में भारतीय डेमोक्रेसी की कोई डेम-ओ-क्रेसी इमेज एस्टेबलिश हो गयी थी?

लेकिन, दिल ने समझाया कि इन सब बातों में ऐसा क्या नया था जिसे बाकी दुनिया, देश की पहचान के रजिस्टर होने जितना, सार्थक वेटेज दे? तभी, मुँह बाती मँहगायी के साये में देशी रुपये की घटती-घिसती सी शक़ल का विचार कौंध गया। टीवी के कान उमेठे तो सारा माजरा साफ हो गया। रुपये के ‘रु’ को तोड़-मरोड़, काट-छाँट कर बने एक सिम्बल को भारतीय मुद्रा की पहचान मंजूर कर लिया गया था।

जरा घुमाकर देखें तो, इस सिम्बल को मंजूर करके हमारे वजीरे आजम ने देशी ईमान-दारी को भी, बैठे-ठाले, एक नयी पहचान दे डाली थी। नहीं, अमरीकी डॉलर का पिछ-लग्गू होने की पहचान तो हमने तभी कायम कर ली थी जब हमारे आज के वजीरे आजम अपने देशी रिजर्व बैंक के अदना से गवर्नर भर हुआ करते थे। तो क्या, अपनी मुद्रा के सिम्बल को मुड्‍ढे के नीचे बीचों-बीच, क्वीन्स बैटन जैसे आड़े खींचे डण्डे से, काट देने भर से हमारी नयी पहचान ‘ब्रिटिश पौण्ड के पिछ-लग्गू बन जाने को सरी-दुनिया स्वीकारने वाले’ ईमान-दार देश की हो गयी थी? नहीं। अपने रुपये के वजूद को कटा-घिसा हुआ दिखलाना तो हम, बीते सालों से, जब-तब करते ही आ रहे थे। उसके ऑफ़ीशियल डिवेल्यूशन को घोषित करते हुए। और, इतिहास गवाह है कि हमारे देसी आकाओं और ब्रिटिश कल्चर के बीच कितना पवित्र रिश्‍ता रहा है।

तो फिर? कुछ-कुछ समझ में आ रहा है। अपनी सर-जमीं के भीतर चीन के किलोमीटरों घुस आने के बाद भी इस जमीनी सचाई को बोल्डली रिजेक्‍ट करते रहकर, वैसे तो, हम इसकी झलक पूरी दुनिया को दिखा चुके थे। लेकिन रुपये के इस नये सिम्बल में नेशनल फ़्लैग के सिम्बॉलिज़्म की भी मौजूदगी को, जोड़-तोड़ कर ही सही, जस्टीफाई करके अपनी एक बिल्कुल पुख्ता नयी पहचान कायम करने में हम सफल हो गये हैं। अपनी पर उतर आयें तो, सूरज की सिर-चढ़ी चिल-चिलाती धूप में भी तारे देख पाने की दौंदा-पेली करने की औकात रखने की पहचान।

हम पर इन्वेस्ट किया जा सकता है। एक-दम बे-खौफ़। अपनी यह नयी इण्टर-नेशनल पहचान कायम करने में सफल हो ही गये हैं हम। कथनी के क्यूट से मुखौटे के पीछे करनी के भयावह चेहरे को छिपा पाने की एक-दम अन-पैरेलल पहचान!

(०१ अगस्त २०१०)