‘भारत-रत्‍न’ नहीं हैं सचिन

‘भारत-रत्‍न’ राष्‍ट्र का एकमतेन निर्विवादित कृतज्ञता-ज्ञापन है और इसकी आधारभूत इकलौती और बन्धनकारी शर्त यही है कि इससे सम्मानित किये जाने वाले व्यक्‍ति ने, सायास, ऐसे कामों को अपना जीवन समर्पित किया हो जिससे यह देश कभी भी, और किसी तरह से भी, उऋण नहीं हो सकता हो। उसे ‘भारत-रत्‍न’ स्वीकारने की राष्‍ट्रीय घोषणा से भी नहीं।

एक बार फिर विवादों में घिरता दिख रहा है देश का सर्वोच्च मान। सोचने वाले सोच सकते हैं कि यह कोई बड़ा संकट नहीं है। ऊँट इस करवट बैठे कि उस, क्या अन्‍तर पड़ता है? आखिर ऊँट को बैठना तो है ही। उन्हें कोई अन्तर नहीं दिखता कि सचिन तेन्दुलकर को भारत-रत्‍न मिलता है या नहीं। यही मानसिकता है बहुतेरे भारतीय जन की। और ऐसा तटस्थ मन राष्‍ट्र के लिए सचमुच त्रासदायी है।

त्रासद इसलिए कि, भारत-रत्‍न किसी भी अर्थ में राष्‍ट्रपति या प्रधानमन्‍त्री या फिर किसी दल अथवा गुट-विशेष की हाईकमाण्ड द्वारा दिया जाने वाला कोई ‘राष्‍ट्र-स्तरीय पुरस्कार’ नहीं है। मूलत: तो, यह कृतज्ञ राष्‍ट्र द्वारा अपने ही किसी राष्‍ट्र-जन के प्रति सर्वथा सार्वजनिक रूप से किया गया निर्विवादित सर्वोच्च कृतज्ञता-ज्ञापन था जो देशी राजनेताओं की अन्‍तर्देशीय महत्वाकांक्षाओं की सूली चढ़ते-चढ़ते कालान्तर में विदेशियों को भी ‘दिया’ जाने लगा।

सारे विवादों का मूल इसी ‘देने’ के मूल में है और सचिन के सहारे, शायद, अब यह मँगरे पर चढ़ने को उद्यत है।

इसी दोष के चलते जैसे एक समय का, परोक्ष रूप से, सर्वोच्च सम्मानित विशेषण ‘स्वन्त्रता-सेनानी‘ अब जिस तरह से बाप-दादों के नाम पर कुछ धन-सम्‍पदा की भीख जैसी माँगती नकारी भीड़ का प्रतीक बन चुका है। ठीक उसी तरह ही अब ‘भारत-रत्‍न’ को भी असम्मान की दिशा में ले जाने की तैयारी चल पड़ी दिखती है।

यों, मुद्दा अत्यन्त संक्षिप्‍त है। फिर भी, किसी ठाकरे या किसी महाराज के तर्कों, या कहें कि सोच, से कहीं बहुत ऊपर है। यह इन जैसों को पचेगा भी नहीं। नहीं पचेगा क्योंकि इसको स्वीकारते ही उनके अपने अन्तर्मन में गहरे छिपी एकदम निजी महत्वाकाँक्षाएँ भी कतई धूल-धूसरित हो जायेंगी।

दो टूक मुद्दा यह है कि ‘भारत-रत्‍न’ जब राष्‍ट्र का एकमतेन निर्विवादित कृतज्ञता-ज्ञापन है तो इसकी आधारभूत इकलौती और बन्धनकारी शर्त यही हो सकती है कि इससे सम्मानित किये जाने वाले व्यक्‍ति ने, सायास, ऐसे कामों को अपना जीवन समर्पित किया हो जिससे यह देश कभी भी, और किसी तरह से भी, उऋण नहीं हो सकता हो। उसे ‘भारत-रत्‍न’ स्वीकारने की राष्‍ट्रीय घोषणा से भी नहीं।

मात्र भाषा, क्षेत्र या समुदाय केन्द्रित क्षुद्र भावना के प्रवाह में अपने किसी चहेते अथवा कथित आदर्श को ‘भारत-रत्‍न’ से नवाजे जाने की जो माँगें हमेशा से उठायी जाती हैं उनमें इस आधारभूत सोच का कोई स्थान नहीं होता है। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में शतकों के पहले अर्ध शतक-धारी बनने का गौरव हासिल करने वाले पर सचिन को ‘भारत-रत्‍न’ से ‘पु्रस्कृत’ करने की माँग कर लता मंगेशकर ने इस शाश्‍वत्‌ बहस को नये सिरे से खोला है।

सचिन की उपलब्धियाँ, नि:सन्देह, महान्‌ हैं। उन्हें एक खेल-विशेष के ‘भगवान’ होने का दर्जा देने वालों से भी कोई बहस नहीं है। क्योंकि ऐसों के भगवान तत्कालीन ही होते हैं, सर्वकालीन नहीं। किन्तु, लाख टके का सवाल यह है कि इस या इन एकदम निजी उपलब्धियों को सहेजकर सचिन ने वृहत्तर समाज या राष्‍ट्र को आखिर दिया क्या है? केवल कुछ सम्मान ही ना! इस ‘कुछ’ का आकार किसी के लिए ‘बहुत कुछ’ की सीमा तक विस्तरित भी हो सकता है। किन्तु इस कथित असीमित विस्तार से भी ‘राष्‍ट्रीय-कृतज्ञता’ के मूल तथ्य पर क्या अन्तर पड़ता है? सचिन की क्रिकेट-उपलब्धियों को लहरा-लहराकर दिखाने वालों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वे राष्‍ट्र को अनन्त काल के लिए ऋणी बनाने वाली हैं। हाँ, यह ऐतिहासिक हैं; इसमें दो राय नहीं हैं। लेकिन, इसमें भी दो राय नहीं होनी चाहिए कि इसी सचिन ने अपनी इन्हीं ऐतिहासिक उपलब्धियों को, सचेत रूप से, भुनाते हुए ही ऐसे-ऐसे व्यावसायिक विज्ञापन समाज के बीच उँड़ेले हैं जो गहरे सामाजिक दायित्व की निष्‍पक्ष तराजू पर कतई खरे नहीं रहे। बल्कि इसके उलट, यदि यह कहा जाये कि वे भारतीय सामाजिक परिवेश के प्रति आपराधिक भी रहे हैं तो इस धारणा को कोई गम्भीर चुनौती नहीं मिलेगी। स्वयं सचिन द्वारा भी नहीं।

इसीलिए, इस राष्‍ट्र को स्वीकार नहीं है कि सचिन ‘भारत-रत्‍न’ हैं।

(२७ दिसम्बर २०१०)

1 comment

    • hd motiramani on May 10, 2012 at 4:39 pm

    Main sahmat hun. Bharat Ratna ki Paatrata ke anurup main Sachin ko nahin maanta. Is baat me sanshay nahin ki Sachin ek mahaan khilaadi hain. Par Mahaan khilaadi kai anya bhi hain to sabhi ko kyon na Bharat ratna praapt ho.

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