छाछ भी फूँक-फूँक कर पीना

Fourth Pocket

सरकोजी ने दूसरे तलाक की घड़ियाँ गिनना चालू कर दिया है। कन्फ़र्म नहीं हूँ। फिर भी अनुमान है कि पहली बीबी भी पाँच फुट छह इंच से नीची नहीं रही होगी। नहीं तो, और क्या खास वजह हो सकती थी?

छुट्‍टी का दिन था। कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी। यानि, बिल्कुल खाली था। सो बतियाने किसी के यहाँ चला गया। खबरची आदमी हैं। अक़ल और बाल दोनों से पके हुए। इधर-उधर की बातों के बाद पूछ बैठे कि क्या मेरी कारो-बारी छुट्‍टी का दिन है? लेकिन फिर न जाने क्या सोच कर खुद ही बोल बैठे, हम लोगों की भी क्या कोई छुट्‍टी होती है, कभी? बोले, दिमाग़ भी अजीब चीज है। चलने लगे तो समस्या, न चले तो भी समस्या। संकेत समझने की कोशिश की तो अपने ही दिमाग ने चलना शुरू कर दिया। ढेरों संकेत पहले से ही खोपड़ी झन-झना रहे थे। और नये थे कि क्यू में खड़े भेजे का दरवाजा खट-खटा रहे थे। सारी छुट्‍टी का रायता बगर गया। बैठे-ठाले काम मिल गया।

खैर, आप कुछ कहें इससे पहले ही साफ कर दूँ कि मुलायम-अमर-आजम की तिकड़ी के नित नये खुलते संकेतों से मुझे क्या लेना? ‘पारिवारिक’ मामला है। मान-मनौअल के ग्रह-नक्षत्र आ-जा रहे हैं। कुछ ज्यादा वक्री जरूर हैं लेकिन इनके अपने-अपने तांत्रिक किस्म के तारन-हार कुछ न कुछ निवारण तो बतला ही देंगे। आपको लगता रहेगा कि ‘सप्लाई’ का राज अब खुला कि तब। लेकिन टापते रह जायेंगे। हासिल होगा शून्य ही। ऐसे मामलों में जैसा अक्सर होता आया है, आगे न तो ‘दल्ला’ कुछ बोलेगा और न ही जीव-निर्जीव ‘सप्लाई’ खुद को बे-पर्दा करेगी। और, पाने वाले ने क्या भाँग घोट रखी है जो बात को और आगे ढकेलेगा? जो कहा जा चुका, सो कहा जा चुका। पॉलिटिकल बैलेंस सब ओर से बराबर हो गया। त्रि-कोण के तीनों कोण हमेशा से जानते आये हैं कि सीमा से आगे तो बस खाई ही है। बहुत उमर पड़ी है उसमें गिरने की चाहत के लिए। कुछ कहना ही होगा तो वसीयत में छोड़ देंगे।

मेरी इस समझ-दारी भरी बात से दिमाग के किसी न किसी कोने में मीरा कुमार की नेक सलाह जरूर कौंधी होगी आपके जेहन में। लेकिन जिन्होंने बकवास मान कर उनकी बातों को कान देने से खुद को रोक रखा था, वे निराश न हों। सैकेण्ड अपारचुनिटी को मौलिक अधिकार मानते हुए मैं बतला ही देता हूँ। दर असल, पार्लियामेण्ट के गति-रोध के रिकॉर्ड बनने की एक पूर्व-संध्या पर उसकी जलवा अफ़रोज़ हैड ने फरमाया था कि अच्छा ड्राइवर वही समझा जाता है जो न तो जाम खुद लगाये और न किसी को लगाने दे। बात सटीक थी। लेकिन मीडिया के कीड़े ने इसमें भी एक पॉलिटिकल संकेत को सूँघ लिया। दाग दिया सवाल — आप किस ड्राइवर की बात कर रही हैं? पीएम की या विपक्ष की? मार्के की बात यह है कि जवाब के लिए किसी को भी इन्तजार नहीं करना पड़ा था — ‘इसका मतलब तो आप खुद निकालिए कि संसद्‌ चलाने की जिम्मेदारी किसकी है?’ अब अगर अपने समय के घाघ जगजीवन की इस दुहिता का मैच्योर रिमार्क इमर्जेन्सी के बाद के तख़्ता-पलट दिनों की याद ताजा कराता कोई संकेत देता दिखे तो इसमें मेरी क्या जिम्मेदारी है?

पार्लियामेण्ट के गति-रोध से आपको एक दूसरा शिगूफ़ा याद आ सकता है। फुस-फुसाहटें जोर पर हैं कि पार्लियामेण्ट स्थगित तो जरूर होगी लेकिन जरा रुक कर। कब और क्यों जैसे सवालों को ऑफ़ीशियली तो कोई नहीं सुन रहा लेकिन संकेत छोड़ रहा है कि मैडम का जनम-दिन मन जाने दीजिए। सांसद्‌ उस दिन दिल्ली-दरबार में अपनी भी शकल दिखने की एण्ट्री कराना चाहते हैं। बस, आइडिया जरा डिफ़रेण्ट है। वे ‘एट एनी कॉस्ट’ के लहजे में अपनी जेब पर पाई भर का भी बोझ नहीं चाहते हैं। यानि, प्रजेन्स ‘एट एनी कॉस्ट’ तो हो लेकिन सारी की सारी कॉस्ट पार्लियामेण्ट के खाते में आये। वैसे, एक निहायत बे-जोड़ शिगूफ़ा और भी है। सैण्ट्रल हॉल की दीवारों के नाम पर कहा जा रहा है कि जेपीसी के गठन का असली विरोध पीएम की तरफ से हो रहा है, सोनिया मैडम और प्रणव सर तो इसके लिए कब से तैयार हैं!

संकेतों को समझने में चूक कितनी मँहगी पड़ती है, यह खुद येदुरप्पा से बेहतर कौन जानता होगा? लेकिन, लगता है कि हंसराज भारद्वाज ने बीड़ा उठा लिया है कि वे पूरे देश को जागरूक करेंगे। बीते समय के इस केन्द्रीय कानून मन्त्री और आज के कर्नाटक-गवर्नर ने जमीन घोटाले की न्यायिक जाँच के येदी के निर्णय पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा दिया है। तुर्रा यह कि हाल ही में कुछ बड़े खास ‘निर्देश’ जारी करने वाले महामहिम ने यह कहते हुए अपनी ‘सीमा’ को याद किया है कि वे तो बस ‘सलाह’ ही दे सकते हैं। अब यह आपका मौलिक अधिकार है कि आप इस तरह सोचें कि अपने पॉलिटिकल कैरियर पर चढ़ रही जंग को साफ करने की खातिर इस स्टेट कॉन्टिट्यूशनल हैड ने ऐसा कह कर अपने चीफ़ मिनिस्टर की कम-अक़ली की ओर संकेत किया है। हो सकता है कि आप ठीक समझे हों कि उसने तो विधान-सभा को आहूत करने की सांकेतिक सलाह भर दी थी। संकेत समझिए। मीडिया के भरमाये येदी सच में भ्रमित हो गये तो उसमें गवर्नर हुजूर का क्या दोष?

यूँ, लिस्ट लम्बी है। लेकिन फिलहाल तो मैं उस संकेत से हैरान हूँ जो विदेश से आया था। जिसने हमारी संप्रभुता को ठेस पहुँचाई। अगर-चे, हमारी काबिज सरकार भी ऐसा ही समझती हो तो। खबर है कि सरकोजी के भारत आने के चन्द घण्टों पहले फ़्रांस से एक जरूरी इन्सट्रक्शन आया। सवा पाँच फुटिये से ऊपर एक भी सुरक्षा-कर्मी सरकोजी की सेवा-टहल में न लगाया जाये। गोया, हाइट को काबलियत पर तरजीह दी जाए। कयास है कि पाँच-पाँच के सरकोजी अपनी औसत हाइट को लेकर कुछ खास ही सैंसिटिव हैं। वैसे, मेरे जैसे औसत हिन्दोस्तानी के लिए दिखने-दिखाने के शौकीन दीवानों और उनके चोचलों की अहमियत नहीं है लेकिन उत्सुकता का एक कीड़ा दिमाग में न जाने कैसे घुस गया — कार्ला की हाइट का क्या? फिर, टीवी क्लिपिंग्स देखीं और साइड-लाइन्स में आई खबरें भी पढ़ने को मिलीं। लगा कि कुछ तो गड़बड़ है।

सरकोजी ने दूसरे तलाक की घड़ियाँ गिनना चालू कर दिया है। कन्फ़र्म नहीं हूँ। फिर भी अनुमान है कि पहली बीबी भी पाँच फुट छह इंच से नीची नहीं रही होगी। नहीं तो, और क्या खास वजह हो सकती थी? बहरहाल, मिल रहे संकेतों से इतना तो प्रिडिक्‍ट कर ही सकता हूँ कि दाम्पत्य की अगली जोड़ी में सरकोजी ही लम्बे दिखेंगे।

(०५ दिसम्बर २०१०)