गन्दगी से नहीं, शर्मिन्दगी से बचाव

Fourth Pocket

वह तनिक भी शर्मिन्दा नहीं हैं। उस जैसा नेता तो बस, लीडर्स ही तय कर सकता है। भीड़ ही जुटा सकता है। और उसने ऐसा करके दिखा भी दिया था। भविष्य के एक होन-हार पीएम से इससे ज्यादा आस नहीं रखनी चाहिए।

बुजुर्ग कह गये हैं कि सुख और दु:ख सहोदर हैं। और क्योंकि सहोदर हैं, एक ही छत के नीचे रहेंगे भी। हाँ, इनमें से कौन बड़ा होगा और कौन छोटा या कौन दीर्घायु होगा और कौन अल्पायु, इस बारे में सस्पेन्स को बुजुर्गों ने कायम ही रखा है। इन फैक्‍ट, सब कुछ भुगतने वाले पर ही छोड़ दिया है। बिल्कुल इन्डियन डेमोक्रेटिक इलैक्शन-प्रक्रिया की तरह। ‘प्रक्रिया’ हर बार दूसरे तय करते हैं और भुगतना वोटर नाम की उस आबादी को पड़ता है जो इस प्रक्रिया से गुजरने को अभि-शप्‍त है। मोदी महान तो अपना यह कीमती खयाल तक जाहिर कर चुके हैं कि ‘वोट देने’ को कम्पलसरी किया जाना चाहिए। क्या पता, कुछ और ताकत पाकर वे यह भी कर डालें कि जिसने वोट नहीं दिया उसकी भारतीय नागरिकता ही दफ़न कर दी जाए!

जाहिर है, खबरें डरावनी भी हैं और सुहावनी-लुभावनी भी। इसलिए आपके लिए इनकी खिचड़ी ही परोसूँगा।

आप शायद भूल गये होंगे कि अफ़रा-तफ़री के इन बुरे दिनों में थॉमस हुजूर ने देश को ढाढस बँधाया था कि साफ-सुथरी तस्वीर वाला हमारा आज का पीएम बहुत सोच-समझ कर ही निर्णय लेता है। भरोसा करने को तैयार हों तो, उन्होंने बतलाया भी था कि उनका यह दावा सुनी-सुनाई बातों की खोखली नींव पर नहीं खड़ा था। वे पीएम की इस योग्यता से एकदम निजी रूप से वाकिफ़ थे। दरअसल, हाथ-पैर मारकर सीवीसी बने इस पुराने बद-नाम आदमी ने पद को त्यागने के बढ़ते दबाव पर आलोचकों पर पलट-वार किया था। कहा था कि उनकी अपनी नियुक्‍ति ’दार जी की ‘सोची-समझी’ नीति की देन थी। यह अल-हदा बात है कि उन्होंने देश-हित में यह डिटेल्स लीक करना ठीक नहीं समझा कि पीएम ने आखिर क्या सोचा और क्या समझा था? और, जब सीवीसी ने इसी को सीक्रेट माना था तो पब्लिक से उनका यह निहायत निजी ज्ञान कैसे शेयर किया जा सकता था कि पीएम को यह सोच और समझ देने लायक मैटीरियल आखिर सप्लाई किसने किया था?

सप्लाई से याद आया। सप्लाई को लेकर प्राइवेट सैक्‍टर का ही खयाल आता है। लेकिन आज की डेमोक्रेसी में सप्लाई का ठेका पब्लिक सैक्‍टर वाले भी उठाते हैं। बा-कायदा प्राइवेट से कॉम्पीट करके। और, यह कॉम्पिटीशन बिजनेस से जुड़े हर प्वाइण्ट पर होता है। अब यह पूछ कर मुझे संकट में मत डालिए कि क्या मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह बिजनेस कॉम्पिटीशन सुरा-सुन्दरी और सम्पत्ति-सम्पदा से जुड़े प्राइवेट उपकारों तक में होता है? फिर भी, जो पूछे बिना मानने वाले नहीं हैं; उनकी तसल्ली के लिए बीते दिनों की एक इन्नोसेण्ट सी खबर दिये देता हूँ। बिना सच-झूठ की कोई टीका-टिप्पणी किये।

खबर है कि भोपाल के पुलिस कप्‍तान इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। परेशान इसलिए कि, उनके अनुसार, वे अपने पुलिसिया दायित्व को पूरी क्षमता-कुशलता से निभा नहीं पा रहे हैं। नहीं, ऑफ़ीशियली इसमें उनका निजी दोष कुछ भी नहीं है। वे तो कानून के शासन की बहाली में जी-जान से जुटे हैं। मुआ, सिस्टम ही उनकी करनी की राह में रोड़े अटका रहा है। सिस्टम बोले तो, बीएसएनएल सिस्टम। महकमे की बे-बसी है कि सरकार ने उसके ऑफ़िशियल इस्तेमाल के लिए मोबाइल सेवाएँ बीएसएनएल से ही लेना कम्पल्सरी कर रखा है। इस आला अधिकारी की लाचारी है कि बीएसएनएल के मोबाइल उसके बँगले के भीतर मिलते नहीं हैं। अपनी बात करने के लिए उन्हें बाहर लॉन तक जाना पड़ता है। बहुत जरूरी लगे तो सड़क तक भी। जाहिर है, इस परेशानी से पुलिसिया सूचना-नैटवर्क कमजोर होता है।

उधर बीएसएनएल का दावा है कि उसके एक्सपर्ट्स ने बँगले के भीतर जाकर सिग्नल इण्टैन्सिटी चैक कर ली है। वे ठीक-ठाक हैं। यानि, कोई चाहे तो बातें की जा सकती हैं। अब आपको बीएसएनएल के इस दावे में कुछ दबे-छिपे ट्विस्ट दिखाई दे रहे हों तो यह आपका अपना पर्सनल एक्सपीरिएन्स होगा। क्या पता यह आपकी निजी शिकायत हो कि पुलिस के आला अधिकारी ने सूचना-तन्त्र की सूचनाओं की अनदेखी के लिए ‘सुन-बहरे पन’ की यह अनोखी ढाल ढूँढ़ ली है। वैसे बीच-बीच में, बीएसएनएल के गलियारों से आती ऐसी फुस-फुसाहटें भी सुनाई दे जाती हैं कि, हो न हो, ऐसी मीडियाई अफ़वाहों के पीछे किसी दूसरे सर्विस प्रोवाइडर का लेटेस्ट लॉबीइंग आइडिया काम कर रहा हो।

लेकिन ऐसी ओछी बातों से किसी को भी परेशान नहीं होना चाहिए। कम से कम उस शख़्स को तो बिल्कुल भी नहीं जिसके सपनों की मंजिल खासम-खास हो। यों ही, गली-कूचों से उठते शोर-शराबे से हलाकान होने लगे तो उसकी हालत भी राजा राम सी हो जाएगी। आज हर स्वप्न-दृष्‍टा को समझना होगा कि एक अदना से धोबी के ना-समझे कॉमेण्ट पर पत्‍नी-विछोह त्रेता तक में त्रास-दायी हुआ था। फिर, कलियुग तो निहायत भौतिक-वादी है। शर्मो-हया का आज जरा सा भी रोल नहीं है।

जिन्हें मेरी बात डेमोक्रेसी के लिए घातक लगती हो वे बाबा गांधी के दिए सबकों से थोड़ा-बहुत तो सीखें। क्या वे भूल गये हैं कि भविष्य के इस नेता ने पब्लिक प्लेट-फ़ॉर्म से कितनी बार ऐसे सबक दुहराये हैं? ज्यादा पुराने नहीं, लेकिन अभी हाल ही में कहे उनके उद्‍गार याद कीजिए। बिहार चुनाव के बाद इतिहास की इस सबसे करारी हार पर थू-थू करने को आतुर अपने आलोचकों को कैसा मुँह-तोड़ जवाब दिया था इस नेहरू-गांधी खान-दानी ने? याद कीजिए। सीना ठोक कर बोला था कि वह तनिक भी शर्मिन्दा नहीं है। उस जैसा नेता तो बस, लीडर्स ही तय कर सकता है। भीड़ ही जुटा सकता है। और उसने ऐसा करके दिखा भी दिया था। कितनी सादगी से पूरे देश को समझाया था कि यही उसकी सीमा है। अब, भीड़-दार वृक्ष में गिनती के पाँच फल भी नहीं लगे तो यह काम तो पार्टी की लोकल लीडर-शिप का था जो पंजा लहराने में लालू से भी ज्यादा ना-कारा सिद्ध हुई। शर्मिन्दगी का ठीकरा इन लीडरानों के माथे ही फोड़ा जाना चाहिए। भविष्य के एक होन-हार पीएम से इससे ज्यादा आस नहीं रखनी चाहिए।

(१२ दिसम्बर २०१०)