गिरना अपनी ही खोदी खाई में

Fourth Pocket

थैंक्स टु विकीलीक्स एण्ड राजा, रह-रह कर खयाल आ रहा है कि एक न एक को भगवान सद्‌-बुद्धि जरूर देगा कि जिनके अपने घर शीशे के होते हैं उन्हें दूसरों के शीश-महलों पर पत्थर फिकते देख कर खुश नहीं होना चाहिए।

सुन रखा था। जो लोग दूसरे के लिए गड्‍ढे खोदते हैं वे खुद ही उसमें गिरते हैं। इस साल देख भी लिया। गड्‍ढा क्या, खाई ही खोदी थी। अब उसमें खुद ऐसे गिरे हैं कि कराह भी सुनाई नहीं दे रही। किस्से एक नहीं अनेक हैं। पर कुछ किस्से ऐसे भी हैं कि न तो अभी तक शिकार गिर पाया है और ना खुद शिकारी गिरा है। शायद इसलिए कि इनमें ‘शिकार’ लगातार घुड़की दे रहा है कि जिनके अपने घर शीशे की दीवारों के बने होते हैं उन्हें दूसरों के शीश-महलों पर पत्थर नहीं फेकने चाहिए और शिकारी डरे-सहमे हैं। आगे नहीं बढ़ रहे हैं।

एक बात कहूँ। मुलायम, अमर और आजम की तिकड़ी अपनी अ-राजनैतिक करनियों के फेर में वह औकात खो चुकी है कि इनकी कीचड़-होली को जरा सा भी सिरियसली लिया जाए। सब कुछ ‘फिसल पड़े की हर गंगे’ की तरह। गोवा के हालात भी कमो-बेश ऐसे ही हैं। नथिंग रियली सीरियस। सब कुछ ऐसा जैसे सत्ता के ताश की गड्‍डी खुद को फेंटे जाने को विवश हो। इसके हाथों या फिर उसके हाथों। फायदे में कोई है तो बस फड़-बाज। हर बाजी की कटी नाल उसी की जेब भर रही है। फड़-बाज बोले तो…! छोड़िए। लेकिन वक़्‍त की नजाकत यह है कि हर सूबे में एक नहीं, छोटे-मझोले कई फड़-बाजों के खूँटे गड़ गये हैं। मीडिया की चिकनी-चुपड़ी इज्जत-अफ़जाऊ बोली में क्षत्रप बजते हैं। आम आदमी तो दर्शक बन कर रह गया है। बेचारा देख रहा है कि अदल-बदल कर इन्हीं में से किसी न किसी की तूती बोलती है। जिसकी तूती की दम फूलने को होती है, दूसरे की तूती में फच्चर फँसाने पिल पड़ता है।

अपने चौहान की तो याद होगी? ‘आदर्श’ का हाई वोल्टेज लगा तो आँय-बाँय बोलने लगे। बिना लिखी एक लिस्ट तक मीडिया में लहरा दी। लहजा ऐसा था कि मेरी एक फोड़ी तो कईयों की दोनों फोड़ कर धर दूँगा। गुस्से में भूल गये कि इन कईयों का किसी खास एक से खासम-खास कॉण्‍टेक्‍ट है। बिल्कुल सीधा। इनमें से एक की भी फूटती तो उस खास एक की आँखों के सामने भी धुन्ध छा जाती। निपट गये। दूसरे चौहान दीवान बहादुर नॉमिनेट हो गये।

नॉमिनेट होने से ध्यान आया। एक और क्षत्रप लम्बे समय से छट-पटा रहे हैं। मौके-बेमौके संकेत देते रहते हैं कि नॉमिनेटेड वली अहद राज-नीति के ककहरे के जरूरी पाठ इनसे ही सीख रहे हैं। वह तो सितारे हैं कि साथ नहीं दे रहे। कमो-बेश हर पाँसा उल्टा ही पड़ रहा है। एक समय था जब अपने ही सूबे में सिमटे हुए थे। तब हर चाल हण्डरेड परसैण्ट सटीक बैठती थी। उसी ओवर कॉन्फिडेन्स की बलिहारी जिसने हरी घास के झाड़ पर टाँग दिया। अपनी प्रतिद्वन्द्वी साध्वी की तरह ही सत्ता-संन्यास के टाइम बाउण्ड संकल्प की चाल चल दी। वह दिन था कि आज, सत्ता-सिंहासन पर इज्जत-दार वापसी के सारे रास्ते जैसे गुर्जर-जाम में ठप्प हो गये। कई बार तो नौबत इतनी तक बुरी होने को आयी कि आलोचकों ने ‘थूक कर चाटने’ जैसे मुहावरों तक का लुत्फ़ लिया।

थूक कर चाटने जैसे दिन देखने वालों की फेहरिस्‍त इस साल कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी है। लेकिन टॉप पर कोई है तो वह चिदम्बरम हैं। जिम्मेदारी से पल्ला झटकने की आला-कमान की योग्यता के कायल लगते हैं। यों तो, वह इकलौते नहीं हैं कायल होने वालों में। लेकिन लगता है कि ‘कायल होना दिखाने’ और ‘तहे दिल से कायल होने’ के पॉलिटिकल डिफ़रेन्स को समझने में चूक जाते हैं। यह बात मैं इस अनुमान के भरोसे कह रहा हूँ कि अनेक पहुँचे हुए राज-नेताओं की तरह चिदम्बरम किसी होश-गँवाऊ नशे के गुलाम नहीं होंगे। लेकिन यदि हों तो, मैं अपने इस कहे के लिए अभी से माफ़ी माँगे लेता हूँ। बिना किसी शर्त के और सेण्‍ट-परसेण्‍ट एडवान्स में।

बिल्कुल ठीक समझे हैं। जाने किस झौंक में कह बैठे कि दिल्ली में बढ़ते ही जा रहे अपराधों का असली कारण यह है कि यहाँ ‘प्रवासी’ भारतीयों की भीड़ बढ़ती जा रही है। अपराध-शास्‍त्र के ज्ञाता है। अंग्रेजी पढ़े-लिखे भी हैं। सो, अपनी बात को फ़िलॉसफ़िक टच का चोला भी दे बैठे। मीडिया के माध्यम से देश को प्रवचन दिया कि क्राइम दो तरह के होते हैं — प्रि-मेडिटेटिव और अपॉरचुनिस्टिक। यह थ्योरी भी दी कि प्रि-मेडिटेटिव किस्म के अपराधों को तो पुलिस रोक भी सकती है। उनका मतलब था कि चाहे तो। लेकिन अपॉरचुनिस्टिक प्रवृत्ति के क्राइम्स को रोक पाना पुलिस के बस में नहीं है। जैसा कि लाजिमी था, इस पर यूपी-बिहार खेमों से काफ़ी गम्भीर पलट-वार हुए। तब ध्यान आया कि वे खुद भी रोटी-रोजगार के जुगाड़ में दक्षिण से आकर दिल्ली में बसे हैं। लेकिन-किन्तु-परन्तु के साथ पलटे जरूर। लेकिन देर हो गयी थी।

वैसे, कहने वाले यह भी कहते हैं कि आला-कमान भी खफ़ा हुआ था। उसे डर बैठ गया था कि कहीं चिदम्बरम के अपराध-फलसफ़े के दोनों ही तीर खुद उसे भी न बींध डालें। जहाँ एक ओर सत्ता की संविधानेतर सुपर पॉवर के रूप में बदनाम की जा रही सोनिया तो आज की सबसे बड़ी माइग्रेण्‍ट हैं वहीं दूसरी ओर सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे सिर-फिरे यह सिद्ध करने नॉन-स्टॉप पीछे पड़े हुए हैं कि यही बेचारी अबला विधवा देश के अब तक के सबसे बड़े तीन प्रि-मेडिटेटिव क्राइम्स की रियल क्वीन है।

आज के इस सिनारियो से भाजपा काफ़ी खुश है। क्योंकि कही हुई बात से पलटने का संकट सुरसा की तरह कांग्रेस के सामने मुँह बाये खड़ा है। इस कदर कि कांग्रेस का महा-अधिवेशन भी इसकी छाँव में आ गया। थैंक्स टु विकीलीक्स एण्ड राजा, बड़ी-बड़ी बातें बघारने की जगह माँ-बेटे को सफाई-देह होना पड़ा। वैसे, मुझे एक भय भी सता रहा है। भाजपा की खुशी की यह बहार ज्यादा लम्बी नहीं चलेगी। अपना पक्का कायल हुआ दिखलाने के बाद विकीलीक्स भाजपा की लीडर-शिप को जल्दी ही कोई गहरी पटकनी देगी। बिल्कुल चारों खाने चित्त करने वाली। बोले तो, तब न उगलते बनेगा और न निगलते। इसीलिए, रह-रह कर खयाल आ रहा है कि एक न एक को भगवान यह सद्‌-बुद्धि जरूर देगा कि जिनके अपने घर शीशे की दीवारों के बने होते हैं उन्हें दूसरों के शीश-महलों पर पत्थर फिकते देख कर बहुत खुश नहीं होना चाहिए।

(२६ दिसम्बर २०१०)