स्पैक्‍ट्रम-आबंटन महा घोटाले की जाँच : सुलगता सवाल

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोटाले की जाँच की निगरानी के सूत्र अपने हाथ में रखने के निर्णय को लेकर यदि यह कहा जाए कि इसने स्वतन्त्र भारत के, अब तक के, सबसे कठिन प्रजातान्त्रिक पहलू की सर्वथा नई, श्रृंखला -बद्ध, दार्शनिक बहस को भी सुलगा दिया है तो इसे प्रतिष्‍ठा का अहंकारी सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए।

टू जी (2nd Generation / दूसरी पीढ़ी) के दूर-संचार स्पैक्‍ट्रम के लायसेंस-आबंटन के बहुचर्चित घोटाले की जाँच के प्रश्‍न पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने रुख को सार्वजनिक कर दिया है। यह खबर इस अर्थ में बहुत अच्छी है कि कम से कम एक न्यायिक निर्णय के लिए देश के आम जन को न्याय-पालिका की ओर टकटकी लगाये बैठने और उलझन भरी उबासियाँ लेने की आवश्यकता नहीं बची।

जो कुछ भी हुआ उसका सार-संक्षेप यह है कि स्वार्थ-निष्‍ठ राजनीति, स्खलित प्रशासन-तन्त्र और मूल्य-च्युत व्यवसाइयों की अपवित्र तिकड़ी ने राष्‍ट्रीय हितों को जैसे कोठों पर ले जाकर नीलाम कर दिया था। कारण चाहे जो भी रहे हों, सुखद यह रहा कि यह गठजोड़ सरे आम बे-पर्दा भी हो गया। संसद्‌ के दोनों सदनों के बीते सत्र व्यवहारिक अर्थ में पूरी तरह से ठप्प हुए। विवाद, अनेक रूपों में, सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। न्याय-पालिका ने भी प्रधान मन्त्री सहित केन्द्रीय सरकार के लगभग सभी पक्षों से जवाब-तलबी की।

अन्यथा कारण से, न्याय-पालिका के सामने यह प्रश्‍न भी खड़ा हुआ था कि लगभग एक लाख तेरासी हजार करोड़ के सम्भावित राजस्व में से लगभग एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ को डकार जाने के इतने गम्भीर घोटाले की निष्‍पक्ष जाँच भी इतने ही गम्भीर सवाल से घिरी हुई है क्योंकि ऐसे मामलों की जाँच की निगरानी का संवैधानिक तन्त्र भी अपने आप में निष्‍कलंकित नहीं है। इस तन्त्र का सर्वो-सर्वा न्याय-पालिका के उठाए अनेक गम्भीर सवालों के सामने बगलें झाँकता फिर रहा है।

इन परिस्थितियों के परिदृश्य में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोटाले की जाँच की निगरानी के सूत्र अपने हाथ में रखने के निर्णय को लेकर यदि यह कहा जाए कि इसने स्वतन्त्र भारत के, अब तक के, सबसे कठिन प्रजातान्त्रिक पहलू की सर्वथा नई, श्रृंखला-बद्ध, दार्शनिक बहस को भी सुलगा दिया है तो इसे प्रतिष्‍ठा का अहंकारी सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने, प्रकारान्तर से ही सही, इस बात को हवा दे दी है कि समीक्षा के शुद्ध-सात्विक प्रजातान्त्रिक प्रयास को भी किस दिशा में ले जाया जाएगा। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के सामने दी गयी इस प्रतिक्रिया का भाव था कि न्यायालय के निर्णय में राजनीति की छाया नहीं ढूँढ़ी जानी चाहिए।

इसे स्वस्थ परम्परा माना जाता है कि सर्वोच्च न्यायिक निर्णयों की, न्यायालयीन प्रक्रिया से बाहर, कोई जन-समीक्षा नहीं की जानी चाहिए। अतीत में भी इस पर असहमति के स्वर उठ चुके हैं कि इस परम्परा को ‘श्रेष्‍ठता’ से उठाकर ‘सर्वथा अपरिहार्य बन्धन’ के रूप में प्रतिष्‍ठित करना क्या, व्यवहारिक यथार्थ में, लोक-तन्त्र के मूल को बधिया करने जितना गम्भीरतम्‌ अपराध नहीं है? केवल निहित-स्वार्थी कारण से, जिस किसी को भी सर्वथा सापेक्ष से इस विशुद्ध निरपेक्ष प्रश्‍न में न्यायालयीन अवमानना जैसा बेहद सरसरा मुहावरा याद आता है; उसके सामने मेरा एक अत्यन्त सरल सवाल है कि मृत्यु-दण्ड के न्यायिक निर्णय पर राष्‍ट्रपति के पुनर्विचार के अधिकार को क्या वह, एक बार भी, न्यायिक अवमानना के रूप में न्यायालय के सामने लेकर गया है?

इसमें द्विविधा नहीं है कि लोक-तन्त्र के कुल तीन व्यवहारिक तन्तु हैं। कार्य-पालिका, विधायिका और न्याय-पालिका के नाम से ज्ञात यह तीनों ही पक्ष यथार्थ लोक-तन्त्र के ऐसे व्यवहारिक संतुलनकर्त्ता हैं जिनके कर्त्तव्यों और दायित्वों को जितना इनका, और केवल इनका ही, विशेषाधिकार बनाये रखा जाएगा उतना ही उसके यथार्थ में भी लोक-तन्त्र होने की अश्‍वस्ति हो सकेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो लोक-तन्त्र नामक जीवन-शैली में जहाँ एक ओर कार्य-पालिका प्राण-तत्व का प्रतीक है वहीं दूसरी ओर विधायिका को उसके दार्शनिक और न्याय-पालिका को आध्यात्मिक पक्ष के रूप में समझा जाना चाहिए।

जहाँ दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्षों का यह विशेष दायित्व है कि वे अपने अस्तित्व के तुच्छ अहम्‌ से ऊपर उठकर प्राण-तत्व की जैविक निष्‍ठा की पवित्रता हर स्थिति में कायम रखे। वहीं आध्यात्मिक पक्ष का यह अतिरिक्‍त दायित्व भी है कि वह इस बात पर निरपेक्ष लेकिन सजग नियन्त्रण रखे कि प्राण और दार्शनिक तत्वों अर्थात्‌ कार्य-पालिका और विधायिका का कोई अपवित्र गठ-जोड़ कभी विकसित न होने पाए। विधायिका के सदस्‍यों के अंक गणितीय बहुमत की स्पष्‍टता के बाद भी प्रत्येक विषय पर होने वाली बहस, और विशेष स्थितियों में मतदान की औपचारिक बाध्यता का निर्वाह भी, इस पवित्र प्रतीक की पुष्‍टि करते हैं। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि लोक-तन्त्र का आध्यात्मिक पक्ष, अर्थात्‌ न्याय-पालिका, जब चाहे अपना निर्द्वन्द्व एकाधिकार स्थापित कर सकता है। उसकी मर्यादाएँ बड़ी स्पष्‍ट हैं। आध्यात्मिक-तत्व कभी भी प्राण-तत्व अर्थात्‌ कार्य-पालिका का स्थानापन्न नहीं हो सकता है। अपने ही प्रांगण से स्वयं न्याय-पालिका ने भी इस बिन्दु पर अपने विचार अनेक बार सार्वजनिक किए हैं।

हमारे देश में संवैधानिक संस्थाओं के रूप में एक और सूक्ष्म तत्व को प्रतिष्‍ठा दी गयी है। व्यवहारत:, यह है तो कार्य-पालिका का अंश ही लेकिन, राजनैतिक स्खलन की आसन्न छाया तले कार्य-पालिका में होने वाले किसी निहित स्वार्थ की घुस-पैठ की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए अपने क्रिया-कलापों के लिए, सीमित और सैद्धान्तिक रूपों से, इसको कार्य-पालिका के प्रत्यक्ष नियन्त्रण से मुक्‍त रखा गया है। इस पर कार्य-पालिका की निगरानी करते हुए अपने मूल्यांकनों से देश को अवगत कराने का दायित्व है। केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ऐसी ही एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है।

दूसरी पीढ़ी के दूर-संचार स्पैक्‍ट्रम के लायसेंस-आबंटन के बहुचर्चित घोटाले की जाँच की निगरानी के सूत्र केन्द्रीय सतर्कता आयोग से छीनकर अपने हाथ में रखने के निर्णय को घोषित कर भारत की न्याय-पालिका ने न केवल कार्य-पालिका के इस नियामक संवैधानिक तत्व के दायित्व-निर्वाह को, लगभग अवांछित रूप से, हथिया लिया है बल्कि इससे जुड़े कुछ ऐसे और भी गहरे सवालों को, जाने-अनजाने, सुलगा दिया है जो यदि तत्काल ही ठण्डे नहीं किये गये तो हमारी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था को अपूरणीय क्षति पहुँचाने की क्षमता रखते हैं।

किसी अतिरेक भरे उत्साह के प्रवाह में, महज भोले और भलेपन में अथवा एक सम्भावित संकट के टूट पड़ने की आशंका से घिर कर, अलग-थलग और विशुद्ध स्वतन्त्र रूप से देखने पर, सम्भव है कि निहितार्थों की गम्भीरता समझ में आये ही नहीं। और तब, एक अधिक गहरे संकट की नींव रख जाए। क्योंकि, यदि इसे न्याय की अकाट्य मंशा के रूप में, ऐसे ही, बिना विवेक-विचार के स्वीकार कर लिया गया तो यह भविष्य की अनेक अप्रिय न्यायिक समस्याओं के मूल के रूप में स्थापित हो जायेगा। एक ऐसी परम्परा के रूप में जिसे लोक-तन्त्र में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए।

विवेचना को समझने के लिए ताजी घटनाओं की क्रम-बद्धता को दीवार पर चिपके पोस्टर की साफ पढ़ी जा सकने वाली इबारत की तरह सदा ध्यान में रखना होगा। भारतीय लोक-तन्त्र के आज के महत्वपूर्ण दौर में राष्‍ट्रमण्डल खेल घोटाला, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्‍त के रूप में विवादास्पद पी जे थॉमस की नियुक्‍ति और दूसरी पीढ़ी के स्पैक्‍ट्रम के लायसेंस-आबंटन में हुए महा घोटाले जैसे सार्वजनिक विवाद भी समानान्तर रूप से गूँज रहे थे। सीवीसी की नियुक्‍ति पर बड़ी गम्भीर बहस सर्वोच्च न्यायालय में छिड़ चुकी थी। न्यायालय केन्द्रीय सरकार और स्वयं सीवीसी से भी जवाब-तलबी कर चुका था। कानूनी रणनीति की तरह प्रक्रियागत्‌ समय कबाड़ा जा रहा था। ऐसे परिदृष्य में थॉमस-विरोधियों द्वारा एक नया रणनैतिक सवाल यह उठाया गया कि जब कोई व्यक्‍ति न केवल अपने ही दामन के दागदार होने की सफाई देने के लिए वैधानिक गलियों की गुंजाइशें तलाश रहा हो बल्कि जिसके दामन पर दिखायी गयी कीचड़ उसी गन्दगी से सनी बतायी जा रही हो जिसकी निगरानी और सफाई का पदेन दायित्व उसके अपने वैयक्‍तिक ईमान की पवित्रता पर निर्भर है तब, केवल इसी एक आधार पर, उसकी नियुक्‍ति को निरस्त क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए? थॉमस-विरोधियों ने यह सवाल अपने मूल पक्ष को अतिरिक्‍त बल देने के लिए उठाया था।

जाहिर है, उन्होंने सोचा भी नहीं था कि यह दाँव उल्टा पड़ेगा। किन्तु, थॉमस पक्ष-पोषकों ने इतने गम्भीर न्यायिक बिन्दु का भरपूर दोहन करने की न केवल कानूनी रण-नीति अपनाई बल्कि ‘भागते भूत की लँगोटी भी भली होती है’ जैसी कहावत को प्रमाणित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। बल्कि, उसे चरितार्थ करके भी दिखा दिया। कानूनी दाँव चलते हुए, सीवीसी ने न्यायालय को ‘आश्‍वस्त’ किया कि वह टू जी घोटाले की जाँच की निगरानी नहीं करेगा। सीबीआई ने ‘माँग’ की कि प्रकरण में उसकी जाँच-प्रक्रिया की निगरानी सीवीसी के स्थान पर न्यायालय स्वयं ही करे। माना जाना चाहिए कि सम्पूर्ण पारदर्शिता की निर्विवाद स्थापना के दायित्व की पूर्ति के लिए मुख्य सतर्कता आयुक्‍त के रूप में गठित और प्रतिष्‍ठित किये गये संवैधानिक तन्त्र और उसके कार्य-सम्पादन के सबसे महत्‍वपूर्ण औजार सीबीआई की लोक-तन्त्रीय प्रतिष्‍ठा को अक्षुण्ण बनाये रखने की नीयत से न्यायालय ने टू जी घोटाले की निगरानी का अधिकार अपने हाथ में ले लिया।

यद्यपि आम भारतीय का सिर इस एक सवाल को लेकर सदा ही चकराता रहेगा कि ‘निगरानी’ करते हुए न्यायालय की यथार्थ भूमिका, सीबीआई द्वारा जुटाए गये तथ्यों और फिर उसी के द्वारा उन तथ्यों से निकाले गये निष्‍कर्षों की समीक्षा से आगे और क्या होगी?

अतीत के पन्नों से सार्वजनिक हुई सीमित सी जानकारियों का अनुभव है कि ऐसी न्यायिक निगरानियों की परिणति जाँच एजेन्सी द्वारा अन्तरिम अथवा अन्तिम रपट प्रस्तुत किये जाने तक ही सीमित रही है। परिवर्तन के रूप में, यदा-कदा असहयोग के लिए की गयी कुछ शिकायतें भी इसमें शामिल हुई हैं। इसके उलट तथ्य यह भी है कि सीबीआई द्वारा की जाने वाली जाँच की निगरानी केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा ही किये जाने की स्थिति में, जाँच में सामने आये तथ्यों के विशेष प्रकाश में, समय-समय पर प्रक्रिया-विशेष की समीक्षा की गुंजाइश तो खुलती ही है; किसी भी निष्‍कर्ष तक पहुँचने में, सामने आये, तथ्यों की सीवीसी द्वारा बेहतर समीक्षा किये जाने की सम्भावना भी रहती है। यही नहीं, न्यायालय के माध्यम से ऐसे निष्‍कर्षों की पुनर्समीक्षा का एक अतिरिक्‍त अवसर भी सदा खुला रहता है।

इन परिस्थितियों में, यदि कोई परम्परावादी निगरानी को अपने हाथ में लेने के न्यायालयीन निर्णय से उत्पन्न हुई परिस्थितियों को देश की स्वातन्त्रोत्तर न्यायिक पहुँच के अब तक के सबसे काले अध्याय के रूप में रेखांकित कर बैठे तो अचरज नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि, एकदम सरसरे ढंग से भी देखें तो सीवीसी की नियुक्‍ति को चुनौती देने वाला सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल अब सवाल ही नहीं रहा था। ऐसे ही किसी नये विवाद में उलझने से बचे रहकर और कानूनी दाँव-पेंचों के सहारे समय कबाड़ते हुए थॉमस अपनी सेवा-निवृत्ति तक पदासीन ही बने रहने के लड्डू मन ही मन फोड़ सकते हैं।

इस सर्वथा सात्विक आलोचना को यह कहते हुए ठुकराना अनुचित होगा कि यह पहली बार नहीं हुआ है कि न्याय-पालिका ने विवेचना और निष्‍कर्ष निकालने की स्वाभाविक प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप किया है। इसके उलट, देखने का यह दृष्‍टिकोण ही इस समालोचना में विहित आधारभूत भाव के न्याय-संगत होने को पर्याप्‍त आधार देता है। सच है कि अतीत में ऐसे अनेक निर्णय हुए हैं। किन्तु, यह भी उतनी ही बड़ी सचाई है कि असहमतियों के बाद भी उन्हें केवल इसीलिए शिरोधार्य किया गया कि वे न्याय-मन्दिर से आये थे। न्याय-मन्दिर में आम भारतीय की यही निष्‍ठा है जो यह कहने के लिए विवश कर रही है कि अब नहीं तो फिर कभी नहीं। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं होगा जब स्वयं यह निष्‍ठा ही श्‍वाँस तोड़ देगी।

वैसे देखें तो, न्यायिक हस्तक्षेप से दायित्व-हस्तान्तरण के प्रकरणों की मोटी-मोटी तीन श्रेणियाँ हैं। पहली श्रेणी उन मामलों की है जिनमें हस्तान्तरण न्यायिक मर्यादा की रक्षा के लिए आवश्यक हो गया था। और इसीलिए, ऐसे निर्णयों को लेने की प्रक्रिया में विवाद या क्लेश का किंचित्‌ सा भी अंश कभी परिलक्षित नहीं हुआ था। दूसरी श्रेणी में वे मामले हैं जिन पर किसी न किसी निहित-स्वार्थी विवाद की छाया इतनी सघनता से पड़ चुकी थी कि उनका हस्तान्तरण न्यायिक मर्यादा की रक्षा के लिए केवल आवश्यक ही नहीं बल्कि बन्धनकारी भी हो गया था। सीमित से, निहित, पक्षों को छोड़कर ऐसे हस्तान्तरणों पर भी कोई व्यापक जन-विवाद कभी सामने नहीं आया।

न्यायिक हस्तक्षेप से हुए दायित्व-हस्तान्तरण के प्रकरणों की तीसरी श्रेणी में वे मामले हैं जिनमें हस्तान्तरण के लिए जी-जान एक करने वाले ऐसा इसलिए नहीं कर रहे थे कि उनके ऐसा करने से न्यायिक मर्यादा हिम-शिखर को छूने वाली थी। बल्कि, उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि ऐसा करना उनकी सोची-समझी कानूनी रण-चातुरी का एक अंग थी। कम गहराई वाले ऐसे बहुसंख्य मामलों में इन तत्वों को मुँह की खानी पड़ी थी। लेकिन, अधिक व्यापक गहराई वाले, कुछ मामलों में इन्होंने मनचाही सफलता भी पायी थी। हर स्थिति में आवश्यक हो गया ऐसे मामलों का प्रतिकार, दुर्भाग्य से, हर बार न्याय-मन्दिर में आम भारतीय की निष्‍ठा की बलि चढ़ गया।

इस बार तो मामला अतीत के ऐसे सारे मामलों से अधिक व्यापक और गहरा है। इसलिए, स्वयं न्याय-मन्दिर की ही दुहाई है कि इस सवाल की सर्वथा सात्विक और पवित्र जन-समीक्षा होनी ही चाहिए कि जो कुछ भी हुआ है उसमें विशुद्ध न्यायिक तत्वों-तथ्यों पर पक्ष-विशेष की किसी कानूनी रण-चातुरी का कोई अंश कतई प्रभावी नहीं हुआ था। इस बिन्दु पर, यह स्वीकारने में किसी भी जिम्मेदार लोक-तान्त्रिक नागरिक को थोड़ा सा भी संकोच नहीं होगा कि एक लोक-तन्त्र की आश्‍वस्ति उसके न्याय-मन्दिर की प्रतिष्‍ठा के सर्वोपरि होने में ही विहित है।

(१९ दिसम्बर २०१०)