वैक्सीन की पोल : स्वयं पंगु है, पोलियो-मुक्‍ति का दावा

आज २०१०-११ में, स्वयं पोलियो-प्रतिरक्षण ही पोलियो फैलाने वाला सबसे बड़ा कारक बनने के जोखिम पर खड़ा है। पिलायी जाने वाली पोलियो वैक्सीन का कमजोर किया गया विषाणु बीमारी फैलाने लायक अपनी मजबूती एक बार फिर से पाने के लिए उन बच्चों के एण्टेरोवायरसेज़ से आनुवांशिक जानकारी एकत्र कर लेता है जिनको यह प्रभावित करता है।

समाचारों की दुनिया का एक ताजा समाचार यह है कि पोलियो को ‘जड़ से मिटाने’ सम्बन्धी सारी बड़ी घोषणाओं और टीकों के विज्ञापनों तथा अभियानों पर करोड़ों रुपये मिटा देने के बाद भी इस आपदा पर नि:शंक त्रुटि-रहित नियन्त्रण पाने में भारत सरकार सरासर असफल रही है। केन्द्रीय स्वास्थ्य व परिवार मन्त्री गुलाम नबी आज़ाद ने संसद्‌ में स्वीकारा है कि २००९ में पूरी दुनिया में पोलियो के सर्वाधिक मामले भारत में ही सामने आये हैं। असफलता की यह कहानी कितनी स्पष्‍ट है इसकी एक झलक पाने के लिए केवल इतनी ही जानकारी पर्याप्‍त है कि अतीत में, भारतीय गणतन्त्र के केन्द्रीय स्वास्थ्य व परिवार मन्त्रालय ने भारी-भरकम दावों-घोषणाओं के बीच इस महाव्याधि की समूल समाप्‍ति के लिए २००७ की अन्तिम सीमा निर्धारित की थी। लेकिन अब इसके लिए २०१२ की नयी समय-सीमा तय की गयी है!

वैसे, बीते लम्बे समय से एक सरकारी विज्ञापन भी बुद्धू-बक्से पर आ रहे मनोरंजन के प्राय: हर चैनल पर लगातार दिखाया जा रहा है। विज्ञापन की शुरूआत में ऐसा लगता है जैसे वह किसी साबुन का हो लेकिन पूरा होते न होते चकित दर्शक को मालूम पड़ता है कि वह तो पोलियो अभियान की लाश ढोते सरकारी महकमे की ओर से पोलियो की ‘दो बू‍न्दों’ को पिलवाने की बरसों पुरानी सिफारिश कर रहा है। बस, थोड़ा सा अन्तर यह है कि ताजे प्रचार-प्रसार में अब अभियान की बरसों पुरानी असफलता का एक नया बहाना भी बड़ी चतुराई से जोड़ दिया गया है। कहा जा रहा है कि बच्चों के हाथ साबुन से अच्छी तरह से धुलवाते रहें नहीं तो पोलियो की वैक्सीन का लाभ ‘पूरी तरह’ मिलने से रह सकता है। अर्थात्‌, पोलियो की वैक्सीन देने के बाद भी उन्हें पोलियो हो सकता है! इस चतुराई की गहराई में झाँकने की कोशिश करें तो समझ पड़ेगा कि पोलियो-मुक्‍ति की असफलता की सफाई की आड़ में, लगे हाथों, सफाई और स्वच्छता की शासन की बन्धनकारी जवाबदेही से भी पल्ला झटकने की कोशिश की जा रही है।

इससे पहले के सालों में भी, विशुद्ध वैज्ञानिक आधार पर हाथ लगी भारी असफलता को छिपाने की इसी कोशिश में, भारत में एक समय शिखर पर रहे अभिनेता से लेकर तब के राष्‍ट्र के प्रथम नागरिक तक के सहारे यह बात बार-बार प्रचारित की जाती रही है कि १०० करोड़ से ऊपर की जनसंख्या के इस देश में एक भी बच्चे का ‘पल्स पोलियो’ के अभियान से छूट जाना प्रतिरक्षण की पूरी की पूरी मेहनत पर पानी फेर देगा! जहाँ किसी न किसी के छूट जाने की सम्भावना के हमेशा बने रहने की गारण्टी इन्हीं शून्य से पाँच वर्ष के लक्षित बच्चों में से कोई भी स्वयं दे सकता है; वहीं भारत के पोलियो-उन्मूलन कार्यक्रम की सफलता के अन्तत: एक तरह से अल्प-जीवी सिद्ध होने और पोलियो-विषाणु के भारत की सीमा लाँघने की सम्भावना की घोषणा सी करते हुए विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर-जनरल ली जाँग वूक ने तो, ११ सितम्‍बर २००३ को ही, जैसे पोलियो उन्मूलन के भविष्य की पूरी इबारत दीवार पर लिख दी थी।

दरअसल, सन् १९४३ में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के आवाहन पर शुरू हुआ पोलियो से मुक्‍ति का कार्यक्रम सन् १९८८ तक विकासशील देशों में पोलियो-मुक्‍ति के ‘अभियान’ के रूप में बदल गया। १९९७-९८ में अमेरिका तथा यूरोप के अन्तिम पोलियो रोगी की पहचान की गयी और १९९९ आते-आते इन महाद्वीपों को पोलियो से मुक्‍त होने का प्रमाण-पत्र दे दिया गया।

पोलियो, मेरु-दण्ड के ‘इण्टीरियर हॉर्न’ के ‘ग्रे मैटर’ में विकार की बीमारी है जो अधिकांशत: पैरों की मांसपेशियों की कम या अधिक कमजोरी के कारण होने वाली अपंगता में परिणत होती है। बहुत सीमित मामलों में यह श्‍वाँस की तकलीफ भी उत्पन्न करती है। हाँ, पोलियो से मृत्यु होने की सम्भावना से मना नहीं किया जा सकता किन्तु यह भी बहुत सीमित है। ‘आधुनिक’ औषधि-विज्ञान का दावा है कि शून्य से पाँच वर्ष तक के सभी बच्चों को, छह से दस सप्‍ताह के अन्तराल से, एक साथ पोलियो की प्रतिरक्षक दवा पिलाने से पूरी दुनिया पोलियो की त्रासदी से मुक्‍ति पा लेगी। यों तो पोलियो से मुक्‍ति का कार्यक्रम भारत में भी वर्षों से चल रहा है किन्तु विद्वानों के इस दावे तथा विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के बहकावे में समूचा भारत देश सन् १९९५ से पोलियो-मुक्‍ति की महाकसरत में लगातार ही भिड़ा हुआ है।

टाइम्स ऑफ इण्डिया डॉट कॉम की ४ जनवरी २००३ की खबर ‘पोलियो इन गोट्स बैफल्स एक्सपर्ट’ के अनुसार इस दौरान भारत में इतनी अधिक पोलियो-प्रतिरक्षक दवा उँड़ेल दी गयी है कि कोई चाहे तो यहाँ की घास से भी उसे पृथक कर सकता है। सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि पोलियो के विषाणु के अनियन्त्रित होते जाने जैसी सम्भावनाओं की ही तरह उसकी प्रतिरक्षक दवा पिलाये जाने का कार्यक्रम भी तार्किक वैज्ञानिक नियन्त्रण से फिसलने की कगार तक पहुँच चुका है। यह स्थिति मानव-जीवन के अस्तित्व के लिए घातक नहीं है, ऐसा मानना शुतुरमुर्गीय सोच से बेहतर नहीं है। कहने को, भारत में पोलियो के मामलों में पर्याप्‍त कमी आयी है लेकिन यदि यहाँ यह कहा जाये कि इस भेड़-चाल की सचाई आम आदमी से छिपायी जा रही है तो इस कथन पर सन्‍देह करना बड़ी गलती होगी।

विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर-जनरल ली जाँग वूक ने ११ सितम्‍बर २००३ को दिल्ली में, भारत के पोलियो-उन्मूलन कार्यक्रम की सफलता के अन्तत: एक तरह से अल्प-जीवी सिद्ध होने की सम्भावना स्वीकार की और चिन्ता व्यक्‍त की कि यह पूरी दुनिया के लिये खतरे की घण्टी है। उनका दावा था कि पोलियो के विषाणु विगत वर्षों में भारत की भौगोलिक सीमा लाँघ कर चीन, जॉर्जिया, नेपाल और बल्गारिया पहुँच गये थे। उनकी बातों पर भरोसा करें तो २००३ में भी इस घातक विषाणु की यह यात्रा थमी नहीं थी और वह भारत से ही लेबनान पहुँच चुका था जहाँ वह बच्चों को अपंग कर रहा था। विशेषज्ञों के बीच और केवल बन्द कमरों में स्वीकार किया जाने वाला यह एक अमिट सत्य है कि पोलियो के इस तरह से भौगोलिक विस्तार की सम्भावनाएँ कभी समाप्‍त भी होंगी इस बात का कोई लक्षण दिखायी नहीं दे रहा है।

गम्भीर सचाई तो यह है कि विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का भारत पर एक तरह से लगाया जा रहा उपरोक्‍त परोक्ष लांछन इस संगठन द्वारा दी गयी अव्यवहारिक सलाह की उन खामियों के सामने आने की खीझ भर है जो अब पकड़ी जा चुकी हैं। ऐसी झांसे-बाजी में इस संगठन से बेहतर तो उन मजमे-बाजों को मानना चाहिए जो साधारण सी समझ आने वाली, लेकिन बड़ी सफाई से रखी, एक निहायत असम्भव शर्त के पुछल्ले की छाया में कुछ भी कर गुजरने का दावा ठोंक देते हैं। मजा यह कि न शर्त पूरी होनी है, न दावा। उदाहरण के तौर पर, आप उन्हें केवल दो ग्राम शेर का ताजा पित्त लाकर देंगे तो वे देखते ही देखते मुर्दे को भी श्मशान से वापस उसके घर तक दौड़ा देंगे!

कितने व्यक्‍तियों ने इस बात पर गौर किया है कि पोलियो के समूल उन्मूलन से भी शेर के ताजे पित्त को उपलब्ध कराने जैसी ही एक शर्त चस्पा है — एक भी बच्चे में इसका विषाणु बच रहा तो सालों की सारी मेहनत और राजस्व भी, व्यर्थ जायेगा। अर्थात्‌, इस असम्भव सी शर्त के पूरी नहीं होने पर यह महाव्याधि पलटकर दुबारा महामारी का आतंक फैला सकेगी, उसे कोई रोक नहीं पायेगा! अनेक देशों की भौगोलिक सीमाएँ परस्पर जुड़ी होने के साथ ही साथ दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी कोने तक व्याधियों के फैलाव की, और भी दूसरी, सहज तथा अनन्त सम्भावनाओं के चलते क्या इस तरह हम सचमुच ही पोलियो-मुक्‍त हो पायेंगे?

लेकिन, इस देश में इतने उजागर तथ्य को स्वीकारने कोई भी जिम्मेदार व्यक्‍ति अथवा संस्था आगे नहीं आ रही है। जाहिर है कि इसके भी कारण वही हैं जो विश्‍व संस्था पर लागू होते हैं। यही नहीं, जबकि २४ अक्टूबर २००३ को नेचर डॉट कॉंम में जॉन व्हिटफील्ड के हवाले से प्रकाशित खबर ‘पोलियो फोकस शिफ्ट्स टु नाइजीरिया’ के अनुसार अटलाण्टा स्थित सेण्टर फॉर डिसीजेज कण्ट्रोल एण्ड प्रिवेन्शन के ग्लोबल इम्युनाइजेशन डिवीजन के उप निदेशक बॉब कीगन का कहना है कि रोग के नये उत्पात्‌ को रोकने के लिए ८० प्रतिशत् तक बच्चों में रोग-प्रतिरक्षण ही पर्याप्‍त होता है। जबकि, प्रतिरक्षण के नाम पर भारत में आज भी शत्-प्रतिशत् बच्चों में पोलियो-प्रतिरक्षक दवा पिलाये जाने के दौर पर दौर जारी हैं।

पोलियो से मुक्‍ति दिलाने की महज मसीहाई में पूरी मानवता को एक अँधेरी खाई में ढकेला जा रहा है। अब तो, अन्तर्राष्‍ट्रीय व्यवसायिक हित भी इसमें शामिल हो गये हैं जिनके चलते प्रचार-प्रसार के स्वतन्त्र माध्यम भी जाने-अनजाने इस कपट-जाल में उलझते जा रहे हैं। इसी के प्रभाव में बीते सालों में कुछ प्रसार माध्यमों ने तो पूरी गैर-जिम्मेदारी के साथ यहाँ तक कह दिया था कि (१) पोलियो की खुराक बच्चों के लिए पूर्ण सुरक्षित है। इसकी खुराक बार-बार और एक साथ पिलाये जाने से इस बीमारी से लड़ने की क्षमता बढती है; (२) उसने एक दिन पूर्व ही दवा पी हो, तब भी नियमित टीकाकरण अभियान के दौरान पोलियो की खुराक बच्चे के स्वस्थ भविष्य के लिए लाभ-प्रद है। यह उसे अतिरिक्‍त सुरक्षा ही प्रदान करती है और (३) प्रत्येक चक्र में छूट जाने वाले बच्चों को शामिल करने की जरूरत ही ‘पोलियो की बूंद बार-बार क्यों’ का तर्क-संगत जवाब है।

भारत वर्ष में बच्चों को, ‘पल्स पोलियो’ से छूट मिलने की उम्र तक पहुँचने से पहले, नियमित-अनियमित अन्तराल से पोलियो की दस से पन्द्रह तक खुराकें पिला दी जाती हैं। जबकि यह एक सर्व-स्वीकृत वैज्ञानिक तथ्य है कि ऐसा करने से पोलियो के महामारी के रूप में लौटने के खतरे बढ़ जाते हैं। नेचर डॉट कॉम में अपने लेख (१५ मार्च २००२) ‘पोलियो वैक्सीन बाइट्स बैक’ में टॉम क्लार्क लिखते हैं कि पिलायी जाने वाली पोलियो वैक्सीन का कमजोर किया गया विषाणु बीमारी फैलाने लायक अपनी मजबूती एक बार फिर से पाने के लिए उन बच्चों के एण्टेरोवायरसेज़ से आनुवांशिक जानकारी एकत्र कर लेता है जिनको यह प्रभावित करता है। इसके लिए वह खुद ही ईजाद की गयी किसी ‘कट एण्ड पेस्ट’ जैसी शॉर्ट-कट तकनीक का उपयोग करता है।

यहाँ यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि, सिद्धान्तत:, पिलायी जाने वाली पोलियो-प्रतिरक्षक दवा में उसका विषाणु कमजोर, लेकिन जीवित, अवस्था में रहता है। प्रतिरक्षक दवा बनाने की तकनीक के नाम पर इन विषाणुओं में केवल पोलियो की प्रचण्डता के लिए जिम्मेदार जीन ‘स्विच्‍ड-ऑफ’ कर दिये जाते हैं। होमिअपैथी के दर्शन की अपनी समझ के आधार पर यहाँ मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि इस प्रकार की प्रतिरक्षक दवा यदि कोई लाभ देती भी है तो भी वह पोलियो की प्रचण्डता के विरुद्ध प्रतिरक्षण तो नहीं ही दे सकती। ९ दिसम्‍बर २००३ के ‘पल्स पोलियो’ के दौर में मध्य प्रदेश के जबलपुर और सतना जिलों से आयी बच्चों की पोलियो वैक्सीन-जनित मृत्यु की खबरें शायद यही बात प्रमाणित भी करती हैं। इन जिलों के प्रभारी चिकित्सा-अधिकारियों और प्रदेश के भोपाल स्थित राज्य स्तरीय पल्स पोलियो कण्ट्रोल रूम ने तब जितने आनन-फानन में और जिस तरह से इन खबरों का खण्डन किया था, वह शंकाओं के निवारण के स्थान पर उनकी पुष्‍टि ही अधिक करता है।

सन् १९९९ के आसपास, डोमिनिकल गणतन्त्र तथा हैती के साझे स्वामित्व वाले कैरीबियन द्वीप हिस्पानिओला में तो पोलियो से ग्रसित हुए बच्चों से संकलित किये गये पोलियो-विषाणु के नमूनों में नि:सन्‍देह रूप से पाया गया था कि उन्हें पिलायी गयी दवा में मौजूद विषाणुओं ने किसी तरह अपने दु:प्रभावी जीन को फिर से ‘स्विच-ऑन’ कर लिया था। क्लार्क लिखते हैं कि यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है क्योंकि अटलाण्टा स्थित यू एस सेण्टर्स फॉर डिसीज कण्ट्रोल एण्ड प्रिवेन्शन के वायरॉलिजिस्ट ओलेन क्यू के शब्दों में, “यह (पोलियो विषाणु) हमें अब तक ज्ञात तमाम विषाणुओं में सबसे तेजी से विकसित होने वालों में से एक है।”

शोध-कर्त्ताओं के अनुसार अपनी प्रचण्डता पुन: प्राप्‍त करने में हिस्पानिओला विषाणु को लगभग एक साल का ही समय लगा। मिस्र और फिलिपीन्स में सामने आये मामलों में भी वैक्सीन-जनित विषाणु को दोषी ठहराया गया था।

सन् १९९९ में अमेरिका को पूरी तरह पोलियो-मुक्‍त घोषित कर गया था। इसी दावे के प्रभाव में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने पिलायी जाने वाली पोलियो-प्रतिरक्षक दवा के बूते, सन् २००५ तक पृथ्वी को पोलियो-विहीन करने का, अपना लक्ष्य घोषित कर दिया था! घोषणा भर की देर थी, इस अविवेकी और अतिरेक भरे लक्ष्य को पाने के लिए उसकी सलाह (बल्कि दबाव कहना अधिक सही है) पर हाल के वर्षों में, खास तौर पर कम विकसित और पिछडे हुए देशों में, पोलियो की पिलायी जाने वाली प्रतिरक्षक दवा का अन्धाधुन्ध उपयोग किया गया। इससे पोलियो के विषाणु के और अधिक प्रतिरोधी होने को तो बल मिला लेकिन परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’ ही रहे। सावधानी से देखने पर जॉन व्हिटफील्ड के ऊपर सन्दर्भित लेख में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के पोलियो-मुक्‍ति के प्रयासों के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर ब्रूस आइलवर्ड के हवाले से इस जोखिम के परोक्ष संकेत मिल जायेंगे। सरल शब्दों में कहें तो, आज २०१०-११ में, स्वयं पोलियो-प्रतिरक्षण ही पोलियो फैलाने वाला सबसे बड़ा कारक बनने के जोखिम पर खड़ा है।

भारत में पिलायी जा रही पोलियो-प्रतिरक्षक दवा पोलियो के जीवित विषाणु पर आधारित है। वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर, यह एक बहुत बड़ा जुआ है और इसके दुष्परिणाम सामने आने भी लगे हैं। हिन्दू (पोलियो इन गोट्स; ३१ दिसम्‍बर २००२) और टाइम्स ऑफ इण्डिया (पोलियो इन गोट्स बैफल्स एक्सपर्ट; ४ जनवरी २००३) ने खबर दी थी कि तामिलनाडु के गोम्बली नामक ग्राम में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेबिल डिसीजेज (एनआईसीडी) ने बकरों तथा अधेड़ व्यक्‍तियों में वैक्सीन-जनित पोलियो विषाणु फैलने के पक्के सबूत पाये हैं। व्यापक पोलियो प्रतिरक्षण-जनित दुष्परिणाम के सन्दर्भ में यह अपनी तरह की, दुनिया भर की, पहली खोज थी जो जान-बूझकर उठाये गये जोखिम के दूरगामी परिणामों के अब उतने दूर नहीं होने की साफ-साफ तथा बड़ी गम्भीर चेतावनी दे रही थी। लेकिन, क्योंकि सारा कुछ जानते-बूझते ही किया जा रहा है इसलिए, इस घटना से जुड़े तथ्यों को झुठलाने की भरपूर कोशिशें भी हो रही हैं। स्थिति की गम्भीरता को हल्का करने की सुनियोजित नीयत का पहला प्रमाण यहाँ ऊपर दिया गया वह कथन है जिसमें गोम्बली के मृतक बकरों में पोलियो की एण्टीबॉडीज और अधेड़ व्यक्‍तियों में पोलियो (वैक्सीन) विषाणु के पाये जाने को देश की घास से भी पोलियो के विषाणु निकाल सकने जैसे उदाहरण से जोड़कर बताया गया था।

खबरों के अनुसार एनआईसीडी के एक भूतपूर्व उपनिदेशक सुभाष आर्य ने तो संस्था द्वारा गोम्बली में की गयी जाँच-पड़ताल की समूची प्रक्रिया की प्रमाणिकता पर ही सवालिया निशान जड़ दिये। लेकिन इस आरोप को जारी करने वाली देश की (अन्तर्राष्‍ट्रीय पहचान रखने वाली) समाचार एजेन्सी ने तब उनसे यह पलट सवाल करने का नैतिक साहस नहीं जुटाया कि उनके इस कथन का परोक्ष अर्थ क्या यह नहीं है कि यह संस्थान, जिसके कि एक समय वे स्वयं भी जिम्मेदार पदाधिकारी रहे हैं, इसी तरह अप्रमाणिक निष्कर्ष निकालने की आदी रही है? निहित स्वार्थों के बढ़ते दायरे ही शायद अब इस तरह के साहस की स्पष्‍ट होती जा रही कमी के कारण बन रहे हैं क्योंकि गोम्बली का एक तथ्य यह भी है कि एनआईसीडी ने अपने निष्कर्ष के समर्थन में मुम्बई स्थित एण्टेरोवायरसेज रिसर्च सेण्टर द्वारा की गयी स्वतन्त्र जाँच से सामने आयी यह जानकारी भी प्रस्तुत की थी कि वहाँ से एकत्र किये गये विषाणु के नमूने ‘पल्स पोलियो’ अभियान में उपयोग में लाये जा रहे पोलियो-विषाणु के उत्परिवर्तित रूप हैं।

चौंकाने को जैसे केवल इतना ही पर्याप्‍त नहीं है। एनआईसीडी के विज्ञानियों के माध्यम से उक्‍त खबरों में यह भी कहा गया था कि भोपाल (मध्य प्रदेश) स्थित एनिमल हाई सीक्योरिटी लैबोरेटरी (एएचएसएल) में होने वाली भविष्य की जाँच-पड़ताल ही यह बता सकेगी कि गोम्बली में प्रभावित व्यक्‍तियों से दिसम्बर २००२ में एकत्र किये गये विषाणु के नमूने बकरों के माध्यम से फैलने की क्षमता रखते हैं अथवा नहीं। लगभग ग्यारह माह बीत जाने के बाद एएचएसएल के संयुक्‍त निदेशक डॉ० एच० के० प्रधान ने यह चौंकाने वाली जानकारी दी कि ऐसी कोई सामग्री उनके संस्थान के पास किसी जाँच-पड़ताल के लिए कहीं से भी नहीं भेजी गयी! संस्थान की ओर से सफाई देने के प्रयास में दो कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि इस तरह की कोई खबर उनके व्यक्‍तिगत्‌ ज्ञान में ही नहीं आई!

संक्षेप में कहें तो, प्रतिरक्षण के लिए प्रयुक्‍त पोलियो-विषाणु अब नियन्त्रण से बाहर हो गया है और इस स्थिति में यदि वह कुछ कर सकता है तो यह कि उम्र तथा जीव की प्रजाति से परे अतिसुग्राही लक्ष्यों में, पोलियो का आतंक फैलाये क्योंकि वैक्सीन-आधारित शत्-प्रतिशत् प्रतिरक्षण अथवा इसके आधार पर पोलियो से मिली (काल्पनिक) पूर्ण मुक्‍ति पोलियो के मामलों में अस्थायी कृत्रिम कमी तो ला सकती है किन्तु पलट-वार करने में समर्थ यह स्थिति अपने आप में पोलियो की, भीषण महामारी के रूप में किसी चौंकाने वाली और अचानक, वापसी की पक्की गारण्टी भी है।

विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के जिनीवा दफ्तर के हवाले से वेब पर आयी रायटर की १३ जनवरी २००४ की खबर के अनुसार पोलियो से पूरी तरह मुक्‍त हो चुके कैमरून तथा बैनिन में एक बार फिर से पोलियो के मामलों का सामने आना पुष्‍ट हो गया है। कहा गया कि इन दोनों देशों में यह बीमारी पड़ोसी देश नाइजीरिया से पहुँची है। यहाँ अत्यन्त दु:खद यह तथ्य है कि इस तरह के जोखिम की ठीक-ठीक जानकारी बहुतेरे पोलियो-विशेषज्ञों को बहुत पहले से रही है। और अब, जब पोलियो-मुक्‍त अमेरिका केवल अपनी इसी ‘मुक्‍ति’ के कारण से ही पोलियो के विषाणु का सुग्राही होता हुआ नजर आ रहा है तो विशेषज्ञ सुझाव देते फिर रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप को पोलियो की किसी नयी चपेट में आने से बचाने के लिए दुनिया भर के उन तमाम स्थानों के बच्चों को पोलियो की वैक्सीन यथा-शीघ्र पिलायी जानी चाहिए जहाँ यह अभी तक पिलायी नहीं गयी है। यही नहीं, वे आगे यह जोड़ने से भी नहीं चूक रहे हैं कि, फिर, वहाँ इसका प्रयोग तत्काल बन्द भी कर दिया जाना चाहिए!

वैसे भी, इस स्थापित तथ्य की उपेक्षा कैसे की जा सकती है कि विषाणुओं में स्वयं को इतनी तेजी से विकसित करने की क्षमता है कि अनेक अवसरों पर, जब तक उसके सबसे ताजे स्वरूप की पहचान और तब उसके आधार पर उसकी कोई प्रभावी वैक्सीन बन पाती है, तब तक वह स्वयं को उससे भी आगे के किसी दूसरे नये स्वरूप में बदल चुकता होता है? और तब, ऐसा होने पर तार्किक रूप से, इससे प्रतिरक्षण की गारण्टी देने के लिए एक ऐसी किसी नयी दवा की आवश्यकता एकदम नये सिरे से खड़ी हो जाती है जो विषाणु की इस तरह विकसित हुई नयी पीढ़ी पर आधारित हो। इस विशुद्ध वैज्ञानिक तथ्य के प्रकाश में थोड़ी देर के लिए, यदि यह तर्क मान भी लिया जाये कि भविष्य की उपरोक्‍त भयावह तस्वीर के पीछे किसी प्रच्छन्न व्यवसायिक स्वार्थ अथवा अतिवादी वैज्ञानिक सोच का कोई योगदान नहीं है; तब भी, कम से कम इतना तो निश्‍चित है कि उत्साह के अतिरेक में व्यापक प्रतिरक्षण-आधारित पोलियो की रोकथाम की तमाम सम्भावनाएँ स्वयं ही पंगु हो गयी हैं।

ऐसी भयावह स्थिति में अब यदि कोई विकल्प शेष बच रहा है तो वह होमिअपैथी के दर्शन पर आधारित सोच ही है जो उपचार और बचाव, दोनों ही परिप्रेक्ष्य में मनुष्य की अपनी मूल जैविक क्षमताओं के पुनरुत्प्रेरण पर केन्द्रित है।

(०५ दिसम्बर २०१०)