‘बे-रंग’ लौटा छोटा

कोई अनहोनी होनी नहीं थी सो नहीं हुई। सभी जानते थे। खुद ‘छोटा भाई’ भी। लेकिन वोट की राजनीति में इस ‘जानने’ का कोई अर्थ नहीं होता। मायने रखती है तो यह बात कि राज-नेता सचाई को झुठलाने में किस कदर सफल होता है?

इस सारी कवायद में म० प्र० का सीएम बुरी तरह फेल हुआ। पिछले दिनों मैंने बिल्कुल साफ शब्दों में लिखा था कि कैसे केवल कुर्सी से चिपके रहने के लोभ में इस शब्द-वीर ने उपवास का इरादा छोड़ा था? पार्टी को अन्धेरे में रखकर ‘बड़े भाई’ के सम्मान में घुटने टेके थे। दिल्ली में महज दिखावे की इज्जत-बचाऊ बात के लिए बैठे शिवराज के हाथ में ऐसा कुछ नहीं था जो उन्हें पीएम से अपनी बात मनवाने की ताकत देता। लचर सी दलीलों के पुलन्दे के साथ बैरंग लौट आये हैं।

(२१ फरवरी २०११)