डज़ नॉट कण्टेन लेमन एण्ड चन्दन

राहुल महज एक इन्सान की अपनी नहीं, अपने भरे-पूरे कुटुम्ब की ‘आत्म-कथा’ लिखने जैसी कोई परम्परा शुरू करने की किसी ‘सलाह’ पर सच में कुछ और आगे बढ़ गये हैं? झूठ कोई कहेगा नहीं। सच कोई जानेगा नहीं।

नई दुनिया में मिस-फिट घोषित मेरे एक सिर-फिरे दोस्त, भाषण पिला कर अपनी अन-पच दूर करने की ठाने, सिर पर सवार थे। यह दीगर बात है कि उनकी कही बातों का मुझ पर धेला भर भी असर नहीं हुआ।

सबसे पहले यह बता दूँ कि सुबह-सुबह की इस घुट्‍टी में उन्होंने मुझे क्या पिलाना चाहा था? घुट्‍टी क्या, एक तरह का गुबार ही था जो उनके तम-तमाए मुखड़े से फूटा था। बोले, “हाथों से की जाने वाली बढ़िया सफाई के गुण वाले एक डिटर्जेण्ट का विज्ञापन इन दिनों बुद्धू बक्से को उतनी ही धूम-धाम से ‘यथा नाम तथा गुण’ साबित कर रहा है। एकदम साफ़ लब्जों और पूरी दबंगी के फ्रेम में इस टीवी एड की पंच लाइन है — नीबू और चन्दन की खुशबू के साथ। लेकिन एड के आखिरी फ्रेम में सबसे नीचे, छोटे हरफ़ों और लीगल इन्फ़र्मेशन फ़ार्मेट में, एक बिल्कुल सायलेण्ट सचाई मौजूद है — डज़ नॉट कण्टेन लेमन एण्ड चन्दन।” लेकिन, जब देखा कि मैं उल्टे घड़े की मानिन्द एक्सप्रैशन-लैस ही रहा तो झल्ला पड़े — “चौ-तरफ़ा फैले उपभोक्‍ता-वादी माहौल में अच्छे खासे पढ़े-लिखे इन्सान को भी मूर्ख बना कर ठग लेने का कितना सटल सा तरीका है ये!”

दोस्त जिगरी थे और मैं उन चुनिन्दा लोगों में शुमार था जो उन्हें सिर-फिरा मान कर हल्के में नहीं लेते थे। सो, भरोसा दिलाती आँखों से उन्हें दुलारा तो ठण्डे पड़े और मेरी एंग्ज़ाइटी को कुछ इस तरह पैसिफ़ाई किया कि वे किसी कॉमर्सियल कॉर्पोरेट का उलाहना लेकर नहीं पधारे थे। वे तो आम आदमी को महज मूर्ख उपभोक्‍ता मान लेने की समाज में घुस गयी गिरावट का मुद्दा लेकर हाजिर हुए थे।

अब, मेरे बैक-फुट पर आने का वक़्त था। इस खयाल के जेहन में आते ही लगा कि वे तमाम लाव-लश्‍कर के बीच आडवानी और शिवराज द्वारा जैत में साथ बैठकर राम-कथा सुनने को इस तरह लक्षणा में बता रहे हैं कि दोनों राम-भक्‍तों ने कांग्रेसी नेता के अति-प्रिय कथा-वाचक के प्रवचन एक साथ इसलिए सुने कि पॉलिटिक्स में और चाहे जो हो, अर्थ एक ही निकले। गोया, ‘सनद रहे और वक़्‍त पर काम आए’ कि मतभेद होने पर २०१४ में राम-राज्य की गुंजाइश खटाई में पड़ जायेगी। लेकिन दोस्त ने पूरी बे-दर्दी से मना कर दिया।

इस मतभेद को पाटने के लिए मैंने प्रस्ताव किया कि तब, जरूर ही, किरीट सोमैया के उस बयान से विचलित हुए होंगे जिसके द्वारा भाजपा के राष्‍ट्रीय सचिव ने चार सौ करोड़ के चावल-घोटाले के लिए ब्लैक-लिस्ट हुई कम्पनी को ‘निर्यात श्री’ से सम्मानित करने को यूपीए मन्त्रियों की मँहगाई बढ़ाने की कोशिशों के एग्ज़ाम्पल की फेहरिश्‍त में शुमार किया था। लेकिन दोस्त था कि मनाही में आँखें तरेरने से आगे जाने को बिल्कुल तैयार नहीं था।

इस पर दिमाग ठनका कि, क्योंकि उसकी बात ‘ईमानदारी’ की धुरी पर टिकी थी, बात को बेवजह ही घपलों-घोटालों-मतभेदों जैसे फालतू मुद्दों में उलझाने से बचूँ। तुरन्त ही बीते दिनों की वह खबर कौंधी जिसके अनुसार काले धन की वापसी की अटकलों पर अभी तक का सबसे बड़ा विराम लगाते हुए बाबा गांधी ने बयान दिया था कि उसे वापस लाने के किये गये प्रयास ना-काफ़ी थे, इन्हें बढ़ाना होगा। छा जाने वाली चोखी सचाई थी। किसने कहा था और क्यों कहा होगा जैसे तुच्छ सवालों से कोसों परे। तो क्या, मेरा दोस्त इशारा कर रहा था कि राहुल महज एक इन्सान की अपनी नहीं बल्कि अपने भरे-पूरे कुटुम्ब की ‘आत्म-कथा’ लिखने जैसी कोई नयी परम्परा शुरू करने की किसी ‘सलाह’ पर सच में कुछ और आगे बढ़ गये हैं? शायद, रियल थ्रिल देने के लिए देशी पाठकों को चुनौती देने के लहजे में — झूठ कहूँगा नहीं, सच कोई जानेगा नहीं! हो सकता है कि, इन काले खाता-धारियों को माफ़ी देने की प्रणव दा के मध्यम से सामने आयी ‘यूनाइटेड पीपुल्स’ एलाएन्स की मंशा के पूरे होने के बाद वे कुछ और मैटीरियल भी छोड़ें। अपनी भावी पीढ़ी के लिए। शायद, किसी सशर्त वसीयत में।

लेकिन, लगा जैसे उस दोस्त का सिर सच में ही फिर गया था। वह बिल्कुल भी टस से मस नहीं हुआ। अपने इस अज्ञान पर मैं भीतर ही भीतर घबरा उठा था। लिहाजा हड़-बड़ी में उल्टा उसी से सवाल उठा दिया कि क्या वह इस शहीद दिवस पर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ़ किये गये जंग के ताजा-तरीन ऐलान का राग अलापने आया था? मुस्कान में डूबी मनाही के साथ वह बोला, “यह सच है कि इस ‘जंग’ के अनेक पुरोधा खुद भी कहीं न कहीं ऐसी ही किसी न किसी झंझट में फँस चुके हैं। मसलन, ‘बाबा’ रामदेव को ‘गुप्‍त’ भेंट में मिला बताया जाने वाला हैलिकॉप्‍टर। पर मैं तो एक ऐसी घटना से बेचैन हूँ जिसे सिरे से ही उड़ा दिया गया। चौतरफा रूप से।”

ज्ञान-चक्षु खोलने के जिज्ञासु गरुड़ जैसे मेरे विनम्र निवेदन पर इस आधुनिक काकभुसुण्डि ने जो कहा उसे, बिना किसी टीका-टिप्पणी के, यथा-सम्भव संक्षेप में आपके सामने रख रहा हूँ।

“बात भाजपा की तिरंगा-यात्रा से जुड़ी है। बेबस यूपीए में घबराहट थी। यूपीए के बेताज बादशाह की सर-परस्ती में तख़्तानशीन जे एण्ड के के सूबेदार भी बेहद घबराये हुए थे। सत्ता से बाहर बैठी बीजेपी की दोस्त और दुश्मन पार्टियाँ भी घबरायी नहीं तो बेचैन तो थीं ही। बाकी का देश भी आशंकित था। ठेठ दक्षिण से आडवानी-गडकरी के छोरे श्रीनगर के लिए ट्रेन से निकल चुके थे। संकट गहरा था। अचानक किसी के दिमाग की बत्ती जली। बदले में महाराष्‍ट्र की एक स्टेशन की बत्ती ‘गुल’ हो गयी। अन्‍धेरे में रेल इंजन आगे से निकल पीछे जुड़ गया। रेल्वे पुलिस से भरे दो डिब्बे भी जुड़ गये। अन्धेरे के साये में ही गाड़ी देर रात कर्नाटक की तरफ वापस रवाना हो गयी। बाकी यात्रियों की मंजिल की कुर्बानी लेकर। झूठ किसी ने कहा नहीं, सच किसी ने जाना नहीं। या ठगी, तेरा ही आसरा!”

(०६ फरवरी २०११)