बहू भी तो कभी सास होगी

उस तानाशाह की कहानी दुहराई जा रही थी जिसने अपने फोटो वाले डाक टिकिट छपवाये। गोंद भी उम्दा लगवाई। धड़ा-धड़ बिके भी। लेकिन, लिफाफों पर चिपक नहीं सके। दरअसल, खिसियाई जनता अपना थूक उल्टी तरफ लगा रही थी।

चाण्डाल-चौकड़ी बैठी तो थी गुलाबी ठण्ड को गरमा-गरम चाय की चुस्कियों से सहलाने। लेकिन हुआ कुछ यूँ कि चाय के साथ निकल पड़ी बातों ने इतनी गर्मी पकड़ ली कि जाती ठण्ड में भी माहौल खासा गरम हो गया। कोने में उदास बैठे अचानक ही मैंने सुना, कोई बुद्धू बक्से के एक सीरियल की पैरोडी में बोल पड़ा था — सब के सब भूल रहे हैं कि बहू भी तो कभी सास होगी। जैसा अन-एण्डिंग सा वह सिरियल था बहस भी वैसी ही हो गयी थी। एक के बाद इतने सारे एग्ज़ाम्पल्स रखे गये कि याद रख पाना बड़ा मुश्किल था।

एक जमाना था जब ऐसी अन्त-हीन बातों के लिए ‘हनुमान की पूँछ’ की उपमा दी जाती थी। लेकिन सैक्युलरिज़्म की ओर तेजी से बढ़ रहे इस देश में अब ऐसी उपमाओं से बचने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। ईसाई-मुसलमान को आरक्षण देने से संविधान की मूल भावना को कोई चोट पहुँचेगी या नहीं, कम लोग ही समझते होंगे। लेकिन ऐसी वोट-जुगाड़ू बातों से सैक्युलरिज़्म बिल्कुल भी आहत नहीं होता है, यह मानने को सारे के सारे सैक्युलर दल उधार बैठे हैं। प्रोग्रेसिव एप्रोच से चिपका इण्डिया का हर सैक्युलर शख़्स मानता है कि ‘हनुमान की पूँछ’ और ‘हुइहै वही जो राम रचि राखा’ कहना घोर कम्युनलिज़्म की निशानी है।

खैर, भटकने के लिए माफ़ी माँगते हुए एक बार फिर से चाय की चुस्कियों के बीच छिड़ी उस अन-एण्डिंग बहस पर वापस आता हूँ। लेकिन, सबसे पहले इतना साफ़ कर हूँ कि ऐसी कोई बात नहीं करना चाहता जिससे बड़-मनई मियाँ-बीबी की निजी उलझनें उछलें। मुझे यह सफ़ाई केवल इसलिए देनी पड़ रही है क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूँ कि कुछ लोगों को मेरी इस बात में मिस्टर एण्ड मिसेज़ बुच के घसीटे जाने की दबी-छिपी मंशा दिख रही है।

कल के इस नौकर-शाह दम्पत्ति की जोड़ी के बारे में कम जानकार आम लोगों के मन में बड़े ऊँचे खयाल हैं — दोनों नियम-कानून और नीयत के गजब के कायल हैं! लेकिन जिन कुछ लोगों की बात मैं कर रहा हूँ उनके अपने खयाल कुछ दूसरे हैं। इस साल पद्मभूषण से खुद को नवाजे जाने की घोषणा पर मियाँ जी ने अखबारों को सहज भाव से जो यह कह दिया था कि ‘इसके लिए चुने जाने पर उन्हें आश्‍चर्य हुआ है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी’ उसे इन लोगों ने अपनी ही नजर से देखा था। ऐसे लोगों को अब मुस्कराने-फुसफुसाने का एक नया शिगूफ़ा मिल गया है। खबर है कि बेईमानों की नीयत पर उँगली उठाने को तत्‍पर नजर आती इस आईएएस जोड़ी की बीबी जी का एनजीओ आरटीआई को खुले आम ठेंगा दिखा रहा है। छपा है कि खुद निर्मला बुच ने भी अखबारी नुमाइन्दे से कहा है — ‘आरटीआई की क्या जरूरत? जानकारी तो बिना आवेदन किये ही दे देंगे!’

मेरे इतना कहने से कुछ लोगों को यह भ्रम होना लाज़मी है कि तब तो मेरा इशारा टू जी घोटाले में अपने किये कुछ ज्यादा ही ऊँचे हो-हल्ले से बीजेपी को हुए नुकसान की तरफ़ होगा। ये लोग मानते हैं कि मनमोहन के बहाने सोनिया की लुटिया डुबोने में जुटी भाजपा को अब अपनी ही लँगोटी उतरती दिख रही है — सीबीआई ने एनडीए दौर के दूर संचार मन्त्री शौरी को पूछ-ताछ के लिए बुला जो लिया है। इन लोगों से मेरा कहना है कि बाजपेयी-शौरी की जोड़ी ने कुछ गुल खिलाये थे या नहीं यह या तो सीबीआई बतलायेगी या सुप्रीम कोर्ट या फिर वक्‍त। लेकिन कांग्रेस के पास भी इससे खुश होने के नहीं, चिन्तित होने के कारण हैं। दरअसल, २००४ में दूर संचार मन्त्री रहे सुखराम की तब की बातों ने शौरी को बुलाये जाने से मिले सुख से कांग्रेस को महरूफ़ कर रखा है।

वैसे, मनमोहन के बहाने सोनिया की सचाई सामने लाने की बातें एक बिल्कुल दूसरे धरातल के सास-बहू झमेले की याद दिलाती हैं। मेरा मतलब है कि देखें तो दोनों के दोनों ही, किसी तीसरे टारगेट पर निशाना साधा हुआ दिखाते, आपस में ही मरने-मारने का तख्ते ताऊसी जुआ खेल रहे हैं। शुरूआत, बेशक, माँ-बेटे ने की थी। माँ का दर्द था कि यह मोहरा बेटे के लिए आसन छोड़ने की जगह अपनी दल-दली जमीन को पुख़्ता करने में जुटा हुआ है। अब, मीडिया इण्टरेक्शन में, मोहरे ने भी इशारों ही इशारों में देश के सामने अपनी मजबूरी का रोना कुछ इस तरह रोया है — ‘रामस्वरूप ने चोरी की, फलस्वरूप पकड़ा जायेगा!’

हाँ, याद आया। उस दिन बहस का पहला तूफ़ान कांग्रेस महा-सभा में बँटी प्रणब की उस किताब के जिक्र से उठा था जिसने कांग्रेस के इतिहास को झकझोर दिया था। उसमें एक समय ‘आयरन लेडी’ कही गयी लेट पीएम को एक निहायत गुण्डे किस्म के युवक के आगे बेबस हुआ बताया गया था। और क्योंकि, बेचारी सास पर यह तोहमत उसकी अपनी सगी बहू की निगरानी में मढ़ी गयी थी इसलिए बहस में शामिल हुए सारे लोग उस दिन इससे आगे कुछ नहीं कह पाये कि जिन्दा देवरानी की खुन्नस स्वर्गीया सास पर निकली थी। राजनैतिक तात्‍कालिकता में बहू भूल गयी थी कि एक न एक दिन वह भी तो सास होगी।

वैसे, गर्मी का क्लाइमेक्स ‘एक्सपायरी’ वाले स्टेटमेण्ट से आया। सोनिया ने रिटायरमेण्ट के लिए उम्र की सीमा क्या बाँध दी, सारे के सारे पॉलिटिकल एक्सपैक्‍टेण्ट्स, जिसकी जहाँ तक पहुँच हो सकती थी वहाँ तक पहुँच कर, हाथों में आइना थामे लाइन में खड़े हो गये। लेकिन चाय के प्यालों पर बौद्धिक बहस में डूबने वालों ने तो हद ही कर दी। इन्हें एक सुविधा भी थी। अपनी खींची सीमा खुद पार कर चुकी सोनिया न तो इन्हें देख सकती थीं और न ही इन्हें सुन सकती थीं। उनकी इस सीमा का गैर वाजिब लाभ उठाते हुए नक्कारखाने की ये तूतियाँ सोनिया को ही उनका अपना छेड़ा राग सुनाने लगीं। और, डर के मारे बेचारे खबरी कारिन्दे, उन्हें सचाई बता भी नहीं सकते थे।

यानि, उस तानाशाह की कहानी दुहराई जा रही थी जिसने पॉपुलरिटी के लिए अपने फोटो वाले नये पोस्टल स्टॉम्प छपवाये। गोंद भी उम्दा लगवाई। धड़ाधड़ बिके भी। लेकिन, लिफाफों पर चिपक नहीं सके। दरअसल, खिसियाई जनता अपना थूक उल्टी तरफ लगा रही थी।

(१३ फरवरी २०११)