नम्बरियों का बे-नम्बरी खेल

बे-नम्बरी और बे-नामी में बहुत फ़र्क है। बेनामी चोरा-चोरी का खेल है। बे-नम्बरी खेल खुला फरुक्खाबादी है। जैसे, छपे हुए अखबार के पेज गिनने तो बीस मिलेंगें लेकिन देखेंगे तो आखीर में छपा हुआ अठारह ही पढ़ेंगे।

पुराने टीवी सीरियल ‘नुक्कड़’ जैसा ही माहौल होता है यहाँ। यों, रोजमर्रा ही यहाँ आने-जाने की जहमत उठाने वालों को मेरी यह बात खल रही होगी। आप सोच रहे होंगे कि रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर के झटक उल्टे, इण्टेलेक्चुअल्स की भारी भीड़ की क्रीमी लेयर में बिराजने वाले इन कीमती नगीनों को मेरी बात खलनी ही थी — मैंने उनके पसन्‍दीदा कॉफ़ी हाउसों को गली-कूचों की आम ईरानी होटलों से जो तौल दिया है। लेकिन प्यारे दोस्तो, थोड़ा सुधार लें। ये लोग मुझसे खफ़ा इसलिए हुए हैं कि मैंने मुद्दे की इस बात को जरा भी तवज्जो नहीं दी कि यहाँ ऑर्डर लेने तम्बी जैसा एक भी बन्दा नहीं आता है — सभी के सभी साफ-सफेद बुर्राक हैं।

खैर, इण्टेलेक्चुअल्स की क्रीमी लेयर में बिराजने वाले कॉफ़ी हाउसों के ये रेग्युलर विजिटर्स ब्लैक इण्डियन कॉफ़ी जितने ही किसी निखालिस गहरे सवाल में डूबे हुए थे। डूबे क्या, उलझे हुए थे। इनमें से कुछ को तो मैं जानता भी था। दो किश्तों में। मेरा मतलब है, दो गुच्छों में। एक गुच्छे में वे थे जो खबर-नबीसों में नम्बरी होने के खिताब कब्जाये हुए थे। दूसरे गुच्छे में वे थे जो नम्बरियों की चुनिन्दा मैरिट लिस्ट में शामिल होने को बेकरार थे, हर कभी और हर कहीं हाथ-पैर मार रहे थे लेकिन पहले वाले थे कि टस से मस नहीं हो रहे थे। लिहाजा, अपनी-अपनी किश्त का इन्तजार ही कर सकते थे। कर भी रहे थे। और, इन्तजार की इसी घड़ी में अपने प्रतिद्वन्द्वियों से इतने ऊँचे सुर में भिड़ने को उधार रहते थे कि आस-पास तो क्या, दूर-दूर तक यह मैसेज पहुँच जाये कि मुद्दे पर छिड़ने वाली बहसों में अपना गला फट जाने तक की चिन्ता नहीं करते हैं।

पास जाकर सुनने की कोशिश के अपने नुकसान हैं। इसलिए दूरी तो मुझे बनाये ही रखनी थी। लेकिन दूर से सुनने की भी अपनी मुसीबतें हैं। कान वहीं लगाये रखना होते हैं। इससे कभी-कभी गरदन इतनी अकड़ जाती है कि उस समय वहाँ से गुजरने वालों के बीच मेरे भारी अकड़ू होने की इमेज बन जाती है। लेकिन क्या करें? समझौतों की मजबूरियों को आखिर सहना तो पड़ता ही है। आपकी मुस्कराहट देखकर लग रहा है कि आप मानकर चल रहे हैं कि मैंने मनमोहन के ताजा-तरीन टीवी उवाच को चुरा लिया है। पर यह सच नहीं है। यह मेरा अपना ओरीजिनल आइडिया है जो अभी-अभी सूझा है। वह कहते हैं ना, आवश्यकता ही आविष्‍कार की जननी है!

तो, दूर से बैठकर कान लगाने से समझ में आया कि नम्बरियों के बे-नम्बरी खेल पर बड़ी कटीली बहस हो रही थी।

लेकिन, मेरी इस बात को सुनकर उभरने वाली अपनी कटीली मुस्कान को जरा अपनी ही जेब में रखिये और आगे कुछ भी कहने से पहले मेरा यह नोट ऑफ़ कॉशन जरूर सुन लीजिए कि यह सच है कि उस बहस में शरीक हर शख़्श हर खबर की तलहटी को छूकर आता था लेकिन क्योंकि डायन भी एक घर छोड़ देती है, उन्होंने भी एक न एक मीडिया-हाउस को बख़्शा हुआ था। जाहिर है, खुद को नम्बर एक पर बिराजा हुआ बताने वाले ओरीजिनली हिन्दी के अखबार के निहायत बे-नम्बरी खेल पर कोई उँगली नहीं उठायी गयी थी। बात को कुछ और विस्तार देता हूँ। साफ भी कर देता हूँ। न तो किसी ने पीत-पत्रकारिता की कोई बात की थी और न किसी ने मुद्दे यह सवाल उठाया था कि महज रेवेन्यू के लिए एक अखबार कैसे अपने दो-दो फ़्रण्ट पेज छाप देता है। बाहर वाला, बे-नम्बरी, विज्ञापन-दाता के लिए और भीतर वाला, लीगली नम्बर्ड, पब्लिक और रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज पेपर्स के लिए।

यहाँ लगे हाथ, एक दूसरी जरूरी सफाई देकर मैं उन लोगों को भी निराश करूँगा जिन्होंने खुद ब खुद मान लिया है कि तब तो मैं इज्जत-दारों के बे-नामी खेल की ओर इशारा कर रहा हूँ। ठीक है, मुझे यह मानने में ऐतराज नहीं है कि आज-कल राज-नेता, अधिकारी, पूँजी-पति, माफ़िया और बाबा-बैरागियों के बे-नामी खेलों के खुलासों की बहार आयी हुई है। जहाँ देखो वहीं इनके काले धन की धना-धन मची हुई है। लेकिन माई डियर, ध्यान रखिये। मैंने बे-नम्बरी खेल की बात की थी, बे-नामी खेल की नहीं।

मुझे मालूम है, मीन-मेख निकालने वाले पीठ-पीछे यह फुस-फुसाये बिना नहीं रह पायेंगे कि बे-नम्बरी और बे-नामी में फ़र्क क्या है? तो, ये लोग सुन लें और आप सब लोग जान लें कि बहुत फ़र्क है। बे-नामी दबे-छिपे, चोरा-चोरी का खेल है। जबकि, बे-नम्बरी खेल खुला फरुक्खाबादी है। यानि, सबको बताकर। सबको दिखाकर। इसमें कुछ भी नहीं छिपाया जाता। वैसे ही, जैसे छपे हुए अखबार के पेज गिनने बैठेंगे तो बीस मिलेंगें लेकिन अखबार को पलट कर देखेंगे तो आखीर में छपा हुआ अठारह ही पढ़ेंगे।

वैसे, बुरा न मानें तो एक बात कहूँ? हैं आप पूरे के पूरे …। भैये, ऐसी बातों को हमेशा ही ताजा-तरीन माहौल से परखते हैं। और, आज-कल पूरी दुनिया में माहौल के नाम पर क्या छाया हुआ है? अब भी नहीं समझ पाये हों तो ‘लानत है’ तो नहीं कहूँगा लेकिन कुछ-कुछ उसी अन्दाज में बतला जरूर दूँगा कि भारत में बैठकर अपुन को तो यही समझ में आ रहा है कि पूरी दुनिया बल्ले-बल्ले हुई जा रही है।

बहस इसी क्रिकेट से जुड़े एक बड़े गम्भीर मुद्दे पर हो रही थी। आप में से कम जान-कार किस्म के लोग यह सवाल कर सकते हैं कि कुल मिलाकर नम्बर की गुड़क-तान वाले इस खेल में यह ‘बे-नम्बरी’ कहाँ से घुस आया? जीरो पर आउट होने वाले के भी तो नम्बर ही काउण्ट होते हैं! तो, मैं कहूँगा कि बन्दे में दम हो तो वह क्रिकेट तक में बे-नम्बरी खेल को दिखा सकता है! अब, खास ‘ऊपर-कट’ वाले अपने सहवाग भाई ने दिखा दिया कि नहीं? अपनी जर्सी पर से नम्बर को काट दिया। जानकारों के बीच बहस छिड़ गयी है, नम्बरियों में नम्बर वन रह चुका खिलाड़ी ऐसा खेल कैसे खेल सकता है? उस दिन, यही बहस उन जीनियसों के बीच भी छिड़ी हुई थी।

(२० फरवरी २०११)