यूज़ एण्ड थ्रो का म्यूचुअल गेम

जो दिखायी दे रहा है वह नियति का आखिरी पल नहीं है। थकी हुई साँसों को थामकर रिबॉर्न हुआ मँजा खिलाड़ी धोबी पाट लगाते हुए सारे खेल को पलट सकता है। हुआ ना, यूज़ एण्ड थ्रो का अन-एण्डिंग म्यूचुअल गेम?

चण्डू-खाने का एक ऑकेज़नल विजिटर मेरा भी परिचित था। एक दिन न जाने क्या हुआ, उसे सूझा कि अपनी विजिट से मुझे चौंका दे। सो, घर धमक आया। किसी चण्डू-खाने की हों या दोस्तों-परिचितों के घरों की, उसकी ये विजिट्स खासा समय काटने के लिए हुआ करती हैं। काफी समय लेकर आता है और अपने कीमती समय का भर-पूर सदुपयोग करता है। हाँ, इसका कोई खयाल कभी नहीं रखता कि ऐसा करते समय वह किसी दूसरे का कीमती समय कितना बरबाद कर रहा है? इस पर्सनालिटी के मद्देनजर, आपसी बातचीत की सुविधा के लिए दोस्तों ने उसका नाम ‘खाऊ’ रख छोड़ा था।

खाते में उस दिन मेरा नम्बर था। बताने लगा कि कैसे एक दिन चण्डू-खाने से लौटते में किसी दूसरे दोस्त की दूकान पहुँच गया था। यह दोस्त डिस्पोजेबल आइटम्स का डीलर था। चुनिन्दा दोस्तों के लिए उसका यह ठीया भी कभी-कभार एक तरह का चण्डू-खाना हो जाता था। उस दिन ये दो फुरसतिये ही इकट्‍ठे हुए थे और दूकान का बोनी-बट्‍टा नहीं हुआ था। उकताये बैठे डीलर ने मियाँ खाऊ को डिस्पोजेबल गुड्स पर खासी तकरीर दे डाली। खाऊ जान छुड़ाकर जैसे-तैसे भागा और फ्रैश होने मेरे पास धमक लिया।

शुरूआत डरावनी थी। लेकिन, बातों का सिलसिला जो आगे बढ़ा तो लगा कि खाऊ ने दूकान से मेरे घर के बीच तक का सफ़र कतई जाया नहीं किया था। खासा होम-वर्क करते हुए ही मेरी चौखट लाँघी थी। आते ही फटाके के मानिन्द फट पड़े — क्या जमाना आ गया है? पीढ़ियों तक सहेजी जाने की बातें अब बे-मानी हो गयी हैं। हर कुछ डिस्पोजेबल हो गया है। वापरो और फेक दो! कल की कल से देखी जायेगी। वापरने के लिए नया पीस ले आयेंगे। लगा, कितनी ठीक बात की थी मियाँ खाऊ ने।

तब तो नहीं लेकिन, उनके जाने के बाद, जब जान में जान वापस आयी तब लगा कि मैं उनसे इतनी जल्दी इसलिए सह-मत हो गया था क्योंकि उनका वह सडन अटैक मेरी अकल पर कुछ ज्यादा भारी पड़ गया था। इस सैकेण्ड थॉट ने मुझे एक बिल्कुल डिफरेण्ट थीम थमा दी। पर, इस डिफ़रेंस को बताने से पहले आपको यह तो बताना ही होगा ना कि उनकी ओरीजिनल स्पीच का लब्बो-लुबाब आखिर क्या था?

दरअसल, खाऊ पण्डित आइटम्स या गुड्स से आदम-जात की खूबियों पर उतर आये थे। रंज में थे कि उपभोक्‍ता-वाद ने आदमी को इस कदर लपेट लिया है कि आदमी की निगाह में अब आदमी भी जिन्स होकर रह गया है। वह भी, पीढ़ियों तक सहेज कर रखने वाला नहीं; महज डिस्पोजेबल। जाहिर है, बात सदमा पहुँचाने वाली थी। सदमा भी ऐसा-वैसा नहीं, बड़ा गहरा। अब, आप कहेंगे कि इसमें सदमे और बड़े गहरे सदमे की क्या बात थी? पहले जब डिस्पोजेबिलिटी के मग़रिबी फण्डे की बयार भी हमारे मुल्क में नहीं आयी थी तब यहाँ बन्धुआ मजदूरी की प्रथा आम थी। बड़े आदमी के लिए ये बन्धुआ पीढ़ी दर पीढ़ी सहेज कर रखने की चीज हुआ करते थे। नये जमाने की आमद ने पुश्तैनी इन्वेस्टमेण्ट की इस परम्परा को मिटा कर रख दिया है।

बिल्कुल ठीक कहते हैं आप। लेकिन, मैं फिर भी कहूँगा कि मैं भी गलत नहीं हूँ। खाऊ के उस बयान ने मुझे गहरा सदमा दिया था क्योंकि उसने मुझे समझाया था कि बेबस-बेचारे आदमी की पहचान की धुरी बदल गयी है। बल्कि, यह कहना ज्यादा सही होगा कि बेबस-बेचारे की मार्किंग लाइन शिफ़्ट हो गयी है। बेबसों की पहचान का दायरा फैल गया है। एक जमाने का ठसक-दार आदमी भी अब, धीरे-धीरे, किसी न किसी ऊँचे ठसके के आगे बेचारा होकर रह गया है। अपने प्वाइण्ट को प्रूव करने के लिए उस दोस्त ने जो नजीरें रखीं वे, यूँ तो, इज्जत-दार समझे जाने वाले हर तबके और हर फ़ील्ड से उठायी गयी थीं लेकिन उन सब में एक कॉमन फ़ैक्‍टर की मौजूदगी बड़ी इण्टरेस्टिंग थी — हर किसी का एक न एक डायरेक्‍ट-इनडायरेक्‍ट पॉलिटिकल कनेक्शन था।

बस, ‘पॉलिटिकल कनेक्‍टिविटी’ का यही सैकेण्ड थॉट था जिसने मुझे डिफरेण्ट थीम थमायी थी। आज के पॉलिटिकल सेनेरियो की बारीकियों पर ग़ौर करेंगे तो आप भी मुझसे एग्री करने लगेंगे। एक जमाना था कि आधुनिक भारत के पॉलिटिकल हीरो खुद को हीरो के रूप में एस्टेबलिश करने के लिए चुनिन्दा एस्टेबलिश हीरोज़ को इस्तेमाल करके दूध में गिरी मक्खी की तरह फेक देते थे। लेकिन इसी दौर में, इन्दिरा की माइनॉरिटी सरकारों के समय से एक दूसरी तरह की पॉलिटिक्स भी चल निकली। समाज-वादी जब भी अविश्‍वास-प्रस्ताव लाते थे, इन्दिरा सबसे पहले इसका हिसाब करती थी कि जनसंघ या वाम दलों में से उसका समर्थन कौन करेगा? इसी हिसाब से वह लेफ़्ट या राइट में से चुने हुए दुश्मन नम्बर दो को भड़काती और उसका समर्थन झटक लेती थी। इस तरह यूज़ एण्ड थ्रो का पहला सीरियलाइज़्ड एपीसोड बना। इसके बाद यूपी में कांग्रेस, मुलायम, माया और भाजपा की राजनीति के बनते-बिगड़ते समीकरणों ने, इसका नया सीक्वेल शुरू किया। यानि, आज की बेशर्मी भरी बोली में बोलें तो, यूज़ एण्ड थ्रो की कण्डोमी संस्कृति का जल-जला कब से छाने लगा था।

लेकिन, आज माहौल कुछ और आगे बढ़ गया है। यह यूज़ एण्ड थ्रो अब किसी एक धुरी पर नहीं टिका है। बल्कि, खुद ही धुरी बन गया है। यूँ कहें कि सी-सॉ का अनोखा मॉडल विकसित हो गया है। इसके कायम रहते प्रिडिक्‍ट करना मुश्किल हो गया है कौन सीट पर टिका रहेगा और कौन हवा में उछलेगा? क्योंकि, भर-पूर वापरने के बाद जिसे दूध की मक्खी की तरह हवा में उछाला जा रहा है उस दूसरे ने हाथ में एक न एक ऐसा वजन-दार नुक्‍ता थाम रखा है जो उसे वापस अपनी सीट पर सुरक्षित बैठायेगा। यह नुक़्‍ता इतना वजन-दार है कि दूसरे की इस वापसी में सहयोग नहीं करने वाले सी-सॉ के पहले पार्टनर की अपनी हालत बिल्कुल वैसी हो जायेगी जो दूसरे की हुई थी।

कलमाडी, लाली, राजा और थॉमस ही नहीं अब तो मनमोहन के तुर्रे भी इसी अन्दाज की कलफ़ में कड़क हो रहे हैं। आज जो कुछ भी कन्क्लूसिव रिजल्ट की तरह दिख रहा है, वह परफ़ैक्‍ट फ़ाइनल नहीं है। बी एश्योर्ड, आज जो यह देख रहे हैं कि किसी ने किसी को इस्तेमाल कर फेक दिया है, वह नियति का आखिरी पल नहीं है। थकी हुई साँसों को थामकर रिबॉर्न हुआ मँजा खिलाड़ी धोबी पाट लगाते हुए सारे खेल को पलट सकता है। हुआ ना, यूज़ एण्ड थ्रो का अन-एण्डिंग म्यूचुअल गेम? लेकिन, थैंक्स टु सोनिया एण्ड करुणा ईक्वेशन वाया मनमोहन एण्ड राजा, ‘परस्पर मजबूरी’ हैड-लाइन से एक ब्रेकिंग न्यूज़ यह भी है कि यूज़्ड आइटम्स अब न तो फेके जा पा रहे हैं और न वापरे!

(२७ फरवरी २०११)