सत्ता-भूख में उपवास की नौटंकी

वह सत्ता की भूख की बेहद अनोखी मिसाल होती। सरकार तो खाती-पीती रहती लेकिन अपने सियासी बयानों और लोक-लुभावनी अदाओं से बेबस किसानों को, पेट भरने लायक मुआवजा देने-दिलवाने की, बरसों से चली आ रही नौटंकी का नया संस्करण दिखाता उसका मुखिया भूखा बैठा रहता।

देश के लिए भले ही न हो लेकिन मध्य प्रदेश के लिए यह सर्वथा नई बात थी। यहाँ किसानों द्वारा आत्म-हत्याएँ की गयीं। एक तरह से श्रृंखला-बद्ध रूप से। आगे अब और नहीं होंगी, इसकी शर्त बदने की हिम्मत शायद ही किसी में हो। ऐसे में, राजनीति की तराजू के सत्ता-धारी और विपक्ष नाम के दोनों पलड़ों पर प्रदेश के हर नागरिक की निगाह बड़ी उत्सुकता से टिकी थी। दोनों की जिम्मेदारी बराबरी की थी। अपनी नीयत की सफाई भी दोनों को ही देनी थी।

पीड़ित किसान और बहुसंख्य निष्‍पक्ष नागरिक की मिली-जुली कसौटी पर परखें तो दोनों ने निराश किया। निराश क्या, राजनैतिक रोटी सेकने के इकलौते ध्येय को पाने की आपा-धापी में सीधे-सीधे गुनाह ही किया। पाले की मार से चौपट हुई फसलों और उसके बाद ऋण-वसूली के दबाव की दोहरी मार से बेहाल हुए ग्रामीण समाज में इन दोनों की राजनैतिक चाल-बाजियों ने गहरी निराशा भरी है। ठोस जमीनी सचाई के पैमाने पर राजनैतिक रूप से प्रदेश में सक्रिय सभी दलों, समूहों और व्यक्‍तियों का स्कोर शून्य रहा है। हाँ, शुरूआत में लगा कि भरमाते दिखावे वाले करतब में भाजपा ने बाजी मार ली है। वह भी भारी अन्तर से। भारी अन्तर से इसलिए कि मुख्य मन्त्री के उपवास की घोषणा के भारी प्रचार से आम जन में यह धारणा बनने लगी थी कि यूपीए सरकार ने मुआवजे में बाँटने के लिए प्रदेश को जो ४२४ करोड़ की राशि देने की घोषणा की थी उसके पीछे यूपीए की स्व-प्रेरणा नहीं बल्कि मुख्य मन्त्री द्वारा ‘राज्य-विरोधी केन्द्रीय नीतियों’ के विरोध में उपवास पर बैठने की घोषणा से कांग्रेस में फैली भारी घबराहट थी। लेकिन इस उपवास के स्थगित होते ही लगने लगा है कि कांग्रेस ने पूरी बाजी पलट दी है। वह भी अपनी बन्दूक को राज्यपाल के कंधे पर टिकाते हुए।

भाजपा द्वारा कांग्रेस की राज्य को ४२४ करोड़ की राशि देने की घोषणा के बारे में बताया जा रहा था कि घोषित राशि दो अलग-अलग मदों से स्वीकृत की गयी थी। २२४ करोड़ तो प्राकृतिक आपदा कोष में म० प्र० के लिए पहले से ही नियत उस कोटे के हैं जो संघीय ढाँचे में इस प्रदेश का वैधानिक अधिकार है। इसका घोर विपत्ति की घड़ी में मुआवजे की म० प्र० की विवादित याचना से कुछ भी लेना-देना नहीं है। राज्य सरकार के अनुसार, जहाँ एक तरफ पाला-पीड़ितों को बाँटने के लिए केन्द्र ने केवल २०० करोड़ ही देने की घोषणा की है वहीं दूसरी ओर कथित रूप से स्वीकृत इस पूरे ४२४ करोड़ में से एक धेला भी अभी तक राज्य के खाते में नहीं पहुँचा था।

जाहिर है, आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच दोनों प्रमुख विरोधी आमने-सामने थे। एक तरफ सुरेश पचौरी थे। पार्टी हाई कमान के सामने निरीह से। २०१४ के आम चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाकर मुख्य मन्त्री की लुभावनी कुर्सी को कब्जाने के सपने को पूरा होते देखना चाहते हैं। जानते हैं कि करवट लेती कांग्रेस की राजनीति में यह उनका अन्तिम अवसर है। दूसरी ओर शिवराज सिंह थे। क्योंकि, पचौरी की चाहत वाली कुर्सी के आज के अधिकृत कब्जेदार हैं, इनके मामले में पार्टी हाई कमान ही कुछ-कुछ लाचार है। सत्ता-सुख २०१४ से आगे भी बरकरार रखने की तमन्ना संजोये हैं जिसके सामने बड़ी समस्या यह है कि न जाने किस दिन अपनों के किस विवाद का कोई एक अकेला खाता मारक तूल पकड़ ले।

अपने नेतृत्व में विधान सभा चुनाव जीतने के बाद के पहले दो सालों में जानकारों के बीच कसी जाती रही एक फब्ती शिवराज सिंह पर बड़ी सटीक बैठती थी। कहा जा रहा था कि राज्य के गुरु-घण्टाल प्रशासनिक प्रधानों ने मन्त्रालय को अपनी बेरोक-टोक पकड़ में रखने के लिए शपथ-ग्रहण के दिन से ही इस राजनैतिक मुखिया को यह घुट्‍टी पिला रखी है कि वह अगले आम चुनाव को लक्ष्य में रख वल्लभ भवन के अपने आधिकारिक कमरे को भूल जाए और प्रदेश की ‘सफल यात्राएँ’ करता रहे। बीते सालों में मुख्य मन्त्री इस झाँसे से कितने उबरे हैं, इस बारे में कोई सटीक टिप्पणी आनी अभी बाकी है। लेकिन लगता है कि कुछ जमीनी सचाइयों से जरूर वे दो-चार हो चुके हैं। खास तौर से, आत्म-हत्या करते किसानों की चिताओं की आँच और संघ की देख-रेख में किसानों द्वारा बीते दिसम्बर को अचानक किये गये ‘भोपाल-कब्जे’ के सदमे से।

अपने माथे पर लगे ‘जमीनी सचाई की अनदेखी करने’ के कलंक को साफ करने का अन्तिम अवसर देने का अनोखा पाँसा फेका था कांग्रेस ने। इस साल २९ जनवरी की दोपहर को पचौरी ने मौसम की मार से चौपट हुए किसानों के धरना-प्रदर्शन का नेतृत्‍व करते हुए भोपाल में कथित रूप से लाठियाँ झेलीं। बदले में, राज्य सरकार द्वारा किसानों को मुआवजा बाँटने का दबाव बनाने के लिए, देर रात को आमरण अनशन पर बैठ गये। तीन दिन बाद, तबीयत बिगड़ने से अस्पताल में भर्ती हुए जहाँ उनसे मिलने मुख्य मन्त्री भी पहुँचे। औपचारिक खैर-ख़्वाहिश के बाद जब शिवराज ने मनमोहन और पवार को लिखे पत्रों का धन्यवाद देते हुए उन्हें यह सुझाया कि वे अपना अनशन तोड़ दें तो उन्होंने राजनैतिक पलट-वार करते हुए कहा कि पहले मुख्य मन्त्री न केवल बजट में आपदा राहत कोष के लिए प्रावधानित ४८२ करोड़ की पूरी राशि को मुआवजे में बाँटें बल्कि अभी तक उसमें से जिलों को जारी हो चुके २५६ करोड़ का पूरा-पूरा हिसाब भी दें, तभी वे उनके सुझाव पर विचार करेंगे। और हाँ, इस बीच वे सीहोर जाकर वहाँ किसानों के धरने में शामिल भी हो आये। इस तरह, मुनाफ़े वाली राजनैतिक फसल काटने के लिए किये जाने वाले कोरे दिखावे के आमरण अनशनों में एक नया आयाम जुड़ गया।

कांग्रेस की राजनीति कारगर हुई। आखिरकार, म० प्र० का भाजपाई ‘किसान’ मुख्य मन्त्री राजनीति की चौरस में उलझ ही गया और अन्य माँगों के साथ ही पाला-पीड़ितों के लिए पर्याप्‍त मुआवजे की अपनी मुख्य माँग को लेकर केन्द्र के खिलाफ़ १३ फरवरी से उपवास पर बैठने को उतावला हो गया। इससे आगे किसी और विकल्प के सारे दरवाजे पचौरी ने बन्द कर दिये थे। बातों को घुमाते हुए, ३१ जनवरी को खुद शिवराज ने भी स्वीकारा था कि वे अनशन नहीं करना चाहते थे लेकिन केन्द्र सरकार ने उन्हें इसके लिए मजबूर किया। भाजपा ने इस सार्वजनिक अनशन-धरने को ‘सविनय अवज्ञा उपवास’ नाम दिया और मुख्य मन्त्री ने दावा किया कि यह महज औपचारिक नहीं रहेगा — २४४२ करोड़ के विशेष राहत पैकेज की उनकी माँग के पूरे हुए बिना उनका यह ‘उपवास’ समाप्‍त नहीं होने वाला। और हाँ, आमरण अनशन पर रहते हुए राजनैतिक दौरा करने के पचौरी के जोड़े नये आयाम का मुँह-तोड़ जवाब देने के लिए शिवराज ने यह व्यवस्था भी की थी कि उनके इस अवज्ञा उपवास के दौरान उपवास-स्थल पर ही औपचारिक रूप से न केवल कैबिनेट की साप्‍ताहिक मीटिंग होती बल्कि वहीं बाकायदा दरबार लगाकर राज-काज भी किया जाता।

यों, उपवास की घोषणा के पीछे मुख्य रूप से पाला-पीड़ित किसानों के लिए २४४२ करोड़ की माँग मानने का राजनैतिक दबाव बनाने की नीयत ही काम कर रही थी लेकिन अपनी उजागर हो चुकी राजनैतिक-प्रशासनिक कमजोरियों को ढाँकने-मूँदने के लिए शिवराज ने दिखावे का एक बहु सूत्रीय माँग-पत्र लहराया। इसमें शामिल किये गये मुख्य सूत्र यह थे —

• किसानों की उपज का समर्थन मूल्य ‘न्यूनतम’ के स्थान पर ‘लाभ-कारी’ नीति पर आधारित किया जाए।

• राष्‍ट्रीय कृषि-बीमा योजना को क्षेत्र-केन्द्रित नहीं, किसान-केन्द्रित बनाया जाए।

• पाला-प्रभावित किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज स्वीकार किया जाए।

• बीपीएल कोटे में खाद्यान्न का आबण्टन औचक विचार पर आधारित नहीं हो। इसके उलट इसे ऐसे परिवारों की संख्या के आधार पर निर्धारित किया जाए।

• इन्दिरा आवास योजना के दोष-पूर्ण आँकड़ों को दुरुस्त किया जाए।

• प्रदेश को पीएमजीएसवाई में राशि उपलब्ध करायी जाए।

अनोखी संवैधानिक स्थिति थी। संघीय ढाँचे में, सम्भवत:, घोर असंवैधानिक ही। क्योंकि एक व्यक्‍ति नहीं, एक राजनैतिक दल नहीं बल्कि एक समूची प्रादेशिक सरकार ही खुद को संघ के खिलाफ़ अवज्ञा के अन्दाज में खड़ा हुआ दिखाने पर तुली थी। लेकिन राजनैतिक घेरेबन्दी की परिस्थितियों ने तेजी से करवट ली। सबसे पहले कांग्रेस की ओर से ढेरों आँकड़े रखे गये। उपवास के पीछे छिपी उनकी नीयत को लेकर शिवराज पर तीखे शब्द-प्रहार किये गये। परिस्थितियों के प्रकाश में मुख्य मन्त्री ने राज्यपाल से बात कर अपना पक्ष रखा।

फिर, ११ फरवरी को राज्यपाल दो दिन के दिल्ली प्रवास पर चले गये। चले गये क्या, बुलाये गये। राजनैतिक रणनीति के तहत, घोषित रूप से १३ फरवरी के दिन उन्हें तभी भोपाल लौटना था जब मुख्य मन्त्री का सविनय अवज्ञा उपवास शुरू हो चुका होता। उत्साहित मुख्य मन्त्री ने अपनी योजना की तरफ कुछ कदम और बढ़ाए। लेकिन राज्यपाल १२ को ही रात ८ बजे भोपाल वापस लौट आये। आते ही, रात ९ बजे बातचीत के लिए राज भवन पधारने का सन्‍देश पहुँचाया। शिवराज १० बजे पहुँचने पर सहमत होते दिखे लेकिन फिर, दोनों ही जानें, किन्हीं कारणों से मुहूर्त १३ की सुबह १० बजे के लिए टल गया। सूत्रों के अनुसार मुख्य सचिव अवनि वैश्य मुख्य मन्त्री से पहले ही राज भवन पहुँच गये। शिवराज साढ़े दस बजे पहुँचे। तीनों के बीच एक घण्टे की बात हुई। सूत्रों पर भरोसा करें तो, बातचीत क्या कानूनी बहस के साथ-साथ संवैधानिक धमकियों तक का आदान-प्रदान हुआ जिसके बाद शिवराज प्रधान मन्त्री से बात करने को सहमत हुए। राज्यपाल की उपस्थिति में ही प्रधान मन्त्री ने मुख्य मन्त्री से लगभग १० मिनिट की बात की जिन्होंने छोटा भाई बतलाते हुए पहले पुचकारा और फिर समझाइश दी। शिवराज राज भवन से मुख्य मन्त्री निवास वापस हुए। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के अनुसार, शिवराज से कहा गया कि वे उपवास के इरादे को छोड़ें और अपनी माँगों को ‘संवैधानिक’ रूप से केन्द्र के सामने रखें।

ऐसा मानने के बिल्कुल स्पष्‍ट तर्क हैं कि शिवराज ने राज्यपाल से हुई अपनी चर्चा के खास बिन्दुओं के बारे में उपवास-स्थल पर मौजूद हर साथी को अन्धेरे में रखा। शायद उन्हें डर था कि उनकी जो भद्द राज भवन के बन्द कमरे में पिटी थी वह सम्हलने से पहले ही सरासर सार्वजनिक रूप से दोबारा पिट जायेगी। फिर, प्रभात झा के इस कथन में भी इस संकेत के छिपे होने को दो टूक मना नहीं किया जा सकता है कि मुख्य मन्त्री को इस तरह से ताम-झाम के साथ एक प्रादेशिक सरकार के ‘अवज्ञा’ पर जाने से उत्पन्न होने वाले अब तक के सबसे अनोखे संवैधानिक संकट के सम्भावित परिणामों के प्रति चेताया गया हो। अन्दरूनी कोनों में कहा तो यह भी जा रहा है कि जब अपने मुख्य सचिव के सहारे मुख्य मन्त्री ‘अवज्ञा’ में संवैधानिक संकट जैसा कुछ भी नहीं होने के कानूनी तर्क रख रहे थे तब राज्यपाल ने उन्हें सरासर नकारते हुए, बिना किसी लाग-लपेट के, चेतावनी दे दी थी कि या तो वे अपने इस सविनय उपवास की जिद को छोड़ दें या फिर इस बात के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लें कि उनका उपवास शुरू होते ही वे केन्द्र को उनकी बर्ख़ास्तगी की सलाह भेज देंगे। राज्यपाल ने यह भी कहा बताया जाता है कि वे यह सुनिश्‍चित करेंगे कि शिवराज की बर्ख़ास्तगी के दिल्ली से जारी हुए आदेश का पालन शाम ६ बजे तक हर हालत में हो जाए।

परिणाम केन्द्र की अपेक्षा के अनुसार रहा। उपवास का समय दोपहर १२ बजे के लिए निर्धारित था। सचिवालय का तमाम अमला अपनी दैनिक ड्यूटी के लिए उपवास-स्थल पर सुबह से ही मुस्तैद था। शिवराज १ बजे ही वहाँ पहुँचे। मुख्य मन्त्री निवास से निकल रास्ते में राज्यपाल से दोबारा मिलने गये। इस बार साधना सिंह भी साथ में थीं। संक्षिप्‍त सी बातचीत हुई। इसके बाद प्रधान मन्त्री से दोबारा बात की। शायद, मुँह-दिखाने लायक विकल्प उपलब्ध कराने की अपनी शर्त की याद भी दिलायी। आनन फानन में, २० फरवरी को दिल्ली में मोंटेक सिंह से बातचीत का औपचारिक निमन्त्रण देता पीएम का एक फैक्स आ गया। समूचे घटन-क्रम की सचाई इस एक संक्षिप्‍त से फैक्स में छिपी है जिसमें मनमोहन ने उपवास को स्थगित करने के उनके ‘सुझाव’ को स्वीकार कर लेने के लिए शिवराज के प्रति औपचारिक धन्‍यवाद-ज्ञापन किया है।

राज भवन से उपवास-स्थल पर पहुँचते ही शिवराज ने वहाँ मौजूद अपने सहयोगियों से दिखावे की कुछ चर्चा की। मोबाइल पर भी कुछ बातें कीं। उपवास-स्थल पर पहुँचने के २० मिनिट के भीतर बोलने के लिए खड़े हुए शिवराज ने, ‘केन्द्र-राज्य सम्बन्धों को अनावश्यक रूप से तनाव में डालने से बचने की अपनी स्वच्छ नीयत’ जैसे संक्षिप्‍त से सफाई-वाचन के बाद, उपवास को स्थगित करने की घोषणा कर दी। इस छोटे से सम्बोधन की शुरूआत में उनके चेहरे पर तनाव के लक्षण बिल्कुल साफ तौर से देखे जा सकते थे। आधा-अधूरा घटना-क्रम बतलाते हुए कहा कि उन्होंने दिल्ली में गडकरी, सुषमा और अनिल से बात की है जिन्होंने प्रधान-मन्त्री के उपवास को स्थगित करने के ‘सुझाव’ को स्वीकार कर लेने की ‘अनुमति’ दे दी है। मंच पर उपस्थित वरिष्‍ठ सहयोगियों ने भी इसकी अनुमति दे दी है। ‘इसलिए’ वे इसे स्थगित कर रहे हैं।

यद्यपि, पश्‍च-विचार (after thought) के बाद सफाई में क्या कहा जाता है इससे परे, इन पंक्‍तियों के लिखे जाने तक, तथ्य यही है कि शिवराज के उपवास-स्थल पर पहुँचने से लेकर उपवास के स्थगन की घोषणा के बीच भोपाल के सुसज्जित पाँच-सितारा भेल मैदान पर यह भ्रम सतत्‌ रूप से कायम रहा कि प्रदेश के राजनैतिक मुखिया का उपवास प्रारम्भ हुआ भी था या राज भवन से बाहर निकलने से पहले उसको निरस्त कर देने की सहमति प्रधान मन्त्री को दे दी गयी थी? समूचे घटना-क्रम को सुबह से देख रहे एक नागरिक की यह जमीनी टिप्पणी मजेदार थी कि ऐसे उपवास समाप्‍त कैसे होते हैं यह तो सभी जानते हैं, वे शुरू कैसे होते हैं यही देखने आया था लेकिन जान नहीं पाया!

बहरहाल, उपवास के स्थगन की सार्वजनिक अनुमति के मिलने के पल तक शिवराज की बाँछें खिल चुकी थीं। शायद, बिना बोले उपस्थित जन-समूह को वे यह थोथा गर्वीला सन्देश देना चाहते थे कि भरे-पूरे सरकारी अमले के एक पूरे सप्‍ताह के समय की बरबादी और राजस्व में से लगभग आधे करोड़ के खर्च के सहारे उन्होंने राजस्व में करोड़ों की आवक की लाटरी का टिकिट खरीद लिया है। यों, यह तो समय ही बतलायेगा कि राजनैतिक शतरंज की यह बाजी यथार्थ में किसने जीती — भाजपा ने या फिर कांग्रेस ने? भाजपा ने राजनैतिक रूप से यथार्थ में कुछ पाया भी है या कांग्रेस की मनमोहिनी तुरुप चाल में फँसकर, उल्टे, अपने संचित खाते से ही काफ़ी कुछ गँवा दिया है? लेकिन एक बात निश्‍चित है — राजनैतिक चालों का ऊँट कांग्रेसी करवट बैठे या फिर भाजपायी, आखिर चढ़ेगी तो किसान-हित की ही बलि।

(१४ फरवरी २०११)