ओ भाई, जरा फिर से देखो!

विलासराव ने रिव्यू माँगा है। समस्या है कि तय नहीं कर पा रहा हूँ कि देशमुख की उँगली किसके खिलाफ़ उठी है? चैनलों पर होने वाली चर्चा के पॉलिटिकल कण्टेण्ट पर या चर्चा-कारों के रात में बैठकर दारू पीने पर?

२०११ वन-डे वर्ल्ड-कप के लीग मुकाबले में भोले-पन में हुई ग़लती को सुधारने के लिए लगायी गयी टेक्नीक ने ग़लती को सुधारने न सुधारने का जिम्मा वापस फ़ील्ड अम्पायर के हाथ में क्या दे दिया, बबाल मच गया। युवराज की गेंद इंग्लैण्ड के इयान बेल के पैड पर लगी थी। अपील हुई लेकिन अम्पायर बिली बोडेन ने उसे आउट नहीं दिया। भारतीय टीम ने रिव्यू माँगा। रिव्यू-रिप्ले में सबने देखा कि युवराज की गेंद इयान बेल के पैड पर नहीं लगी होती तो गिल्लियाँ बिखेर देती। लेकिन रिव्यू की तकनीक ने इस सरल सी बात के आगे एक तकनीकी बात भी पकड़ी। तकनीक के सहारे उसे इस्तेमाल करने वाले अम्पायर ने जाना कि गेंद भले ही गिल्लियाँ बिखेर देने वाली थी लेकिन बल्ले-बाज ढाई मीटर की खतरे-भरी सीमा-रेखा से बाहर निकल आया था। मैदान से बाहर एसी में बैठे अम्पायर ने माना कि तकनीक द्विविधा में है कि इस हालत में खिलाड़ी आउट होता या नहीं? ऐसे में, उसने रिव्यू का फैसला बिली बोडेन पर ही छोड़ दिया और बिली अपनी बात पर अड़े रहे। भले मानुसों के खेल में इसे ‘बेनेफ़िट ऑफ़ डाउट’ कहते हैं।

वैसे, इण्डियन डेमोक्रेटिक सिस्टम में बेनेफ़िट ऑफ़ डाउट का यह खेल काफ़ी पुराना है। पहले कुछ कम था, रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर जैसा। लेकिन अब जरा ज्यादा हो गया है, बिल्कुल ‘जित देखो तित लाल’ की तर्ज पर चौ-तरफ़ा छाया हुआ। ऐसे में, ज्यादा पुराने मुर्दे क्या उखाड़ना? नये-ताजों, मेरा मतलब है कम पुरानों, का ही काम-चलाऊ पोस्ट मार्टम कर लेते हैं। यों, गड़े मुर्दे उखाड़ने की बात है तो निहायत बुरी लेकिन क्या मीडिया और क्या नेता? यह नेक कर्म सभी करते हैं।

अब इसे ही देखिए। एक मिनिस्टर अपनी ही राज-धानी के एक अस्पताल में किसी से मिलने क्या चले गये, बात का बे-वजह बवन्डर मचा दिया गया। वह भी विरोधी पार्टी के किसी लीडर ने नहीं, मीडिया ने। वैसे, पोस्ट मार्टम तो इसकी भी होनी चाहिए कि पॉलिटिकल पार्टी और मीडिया के बीच में यह डिफरेन्स हुआ तो आखिर कैसे पैदा हुआ? यों, बात बहुत संक्षिप्‍त सी है कि पॉलिटिक्स में पार्टी और पार्टी का वोट बटोरू मेनिफेस्टो-डिफरेन्स चाहे जो हो; ‘मौसेरे’ भाईयों वाली सिमिलारिटी भी तो आखिर अपना अर्थ रखती है। लेकिन, आप मेरी इस दो टूक पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को तभी समझ पायेंगे जब आप एपीसोड की ओरीजिनल पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को पहले जान लें। दरअसल, एमपी के होम मिनिस्टर जिसकी खैर-खबर लेने गये थे, पुलिस रिकॉर्ड में वह लगभग एक माह से धार-दार हथियार से मारपीट के एक मामले में ‘फरार’ है। इस फ़रार को किसी दूसरे फ़रारी ने गरदन पर गोली मारकर घायल कर दिया था। सारे जानकार जान गये कि मन्त्री जी किसकी मिजाज-पुर्सी को गये थे। मिनिस्टर भी जान गये कि सब जान गये हैं। वे यह भी जान गये कि उनकी इस फ़ील्डिंग का रिप्ले-रिव्यू होकर रहेगा। सो, पहले से तैयार होम मिनिस्टर ने, बिना देर किये, अपने पत्ते खोल दिये। खुल कर बता दिया कि फरारी को एन्ज्वाय कर रहा यह युवक उनकी अपनी पार्टी के एक कार्यकर्त्ता का स-पूत है। यह भी कह दिया कि उसे देखने जाना उनका फ़र्ज था। कानून अपनी जगह है, पॉलिटिकल फ़र्ज अपनी जगह। कानून जैसे भी काम करता आया है आगे भी करेगा। लेकिन, अपने फ़र्ज में वे इस कानून को कैसे दखल देने दे सकते थे?

जरा हट के, अब एक दूसरी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट पर गौर फ़रमायें। हुआ यह कि लालू यादव राम राजा के दरबार में पहुँच गये। जाहिर है, उनमें यह आस्था तो थी ही कि ओरछा के इस मन्दिर में मन की मुराद पूरी होती है। लेकिन, मौटे तौर पर, पूरा देश यह जानकर दंग है कि लालू से एक भारी चूक हो गयी — राजनैतिक प्रताड़ना के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे लालू द ग्रेट ने राम राजा से अपने साथ न्याय करने की विनती बिल्कुल नहीं की! देश दंग है कि समय की तीखी मार से, शार्प ब्रेन, लालू की अकल में कहीं कुछ पत्थर घुसने तो नहीं शुरू हो गये हैं? यों, समझें कि आउट या नॉट आउट जैसे इस कन्फ़्यूजन को दूर करने के लिए काफ़ी सारे लोगों ने इसे रेफ़रल रिव्यू के लिए जान-पांड़ों के पास भेजा तो जरूर लेकिन टेक्निकल कन्फ़्यूजन के रहते मुद्दा वहाँ से अपने खुद के निर्णय के लिए वापस आ गया। लेकिन, मैं अब भी लालू की पॉलिटिकल शार्प-नेस का कायल हूँ। इसीलिए, पूरे सिनारियो पर जब मैंने अपना मगज मारा तो तस्वीर का खास पहलू साफ हुआ। किस्सा कोताह यह कि पूछ-पड़ताल की गहराई में उतरने पर पता चला कि ऐसी मान्यता है कि किसी फसाद को ओरछा के राम राजा के दरबार में निबटारे के लिए रखने का मतलब है कि उसमें दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। नहीं समझे? यहाँ भी वही बेनेफ़िट ऑफ़ डाउट। भैये, लालू की अकल की दाद दीजिए। अर्थात्‌, कभी जेपी के शागिर्द रहे लालू ने उत्तर प्रदेश के असेम्बली इलेक्शन के मद्देनजर अपनी सेक्युलर इमेज तो बचायी ही बचायी, राम राजा के न्याय के सामने आने पर उससे होने वाली खुली थुक्का-फजीहत से भी खुद को बचा लिया!

लेकिन कन्फ़ूजन्स की इस आपा-धापी में एक कन्फ़्यूजन ऐसा भी है जो मेरा अपना है। रिप्ले पर रिप्ले देखने के बाद भी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि बेनेफ़िट ऑफ़ डाउट दूँ तो किसे? विलासराव को या टीवी के उन मीडिया-कर्मियों को जिन्होंने उन्हें हलाकान कर रखा है? हुआ यह कि सभी शौकों पर तराजू की बराबरी से पकड़ रखने की प्रसिद्धि पाये देशमुख ने लातूर में यह तो कहा ही कि राष्‍ट्र-विकास की चिन्ता करने, और एक-दूसरे के बीच उसकी यूज़-लैस चर्चा करने, वाले रात में छक कर दारू पीते हैं। यह तक कह डाला कि पानी की गहराई नापने के लिए उसके तल तक उतरना होता है, किनारे बैठकर कंकड़ फेकने से गहराई नपती नहीं है। आम आदमी को लगा कि देशमुख ने स्लॉग-शॉट की तर्ज पर बल्ला हवा में भाँज दिया। वे अभी गेन्द को हवा में ढूँढ़ ही रहे थे कि जान-कारों ने अपना फैसला सुना दिया — बल्ले ने गेंद को छुआ ही नहीं, वे एलबीडब्ल्यू हो गये। खबर है कि विलास भाई ने रिव्यू माँगा है। मेरी समस्या यह है कि तय नहीं कर पा रहा हूँ कि देशमुख की उँगली किसके खिलाफ़ उठी है — चैनलों पर होने वाली चर्चा के पॉलिटिकल कण्टेण्ट्स पर या चर्चा-कारों के रात में बैठ कर दारू पीने पर?

(०६ मार्च २०११)