आम और खास का फ़र्क!

जनता के सेवक के रूप में हाथ जोड़ कर जीते मेम्बर ने पूछा कि क्या विधायक इतने गये-गुजरे हो गये हैं कि उन्हें महज ‘आम आदमी’ मान लिया गया है? स्पीकर ने इसे बहुत गम्भीर माना और जाँच का आश्‍वासन दे दिया।

अखबारों में जब से यह पढ़ा है कि एमपी गवर्नमेण्ट देसी ठर्रे की बॉटलिंग का ठेका वेयर हाउसों से छीन कर सीधे डिस्टिलर्स को ही देने वाली है, बड़ा असहज महसूस कर रहा हूँ। दरअसल, घरवाली ने कोटा फिक्स कर रखा है। ग़म हो या खुशी, कोटे से आगे एक दमड़ी नहीं देती। ऐसे में, मँहगी होती दारू से सुरूर का पहले से ही उतर चुका लुत्फ़ और भी खटाई में पड़ जायेगा। इसी ग़म को ग़लत करने रोज से दोगुनी उतार ली। और, बुरा हो ठेकेदार का, आज मिलावट कुछ कम कर रखी थी। आ-जा रहे ख़यालों से लगता है, चढ़ने लगी है।

जैसे, अभी-अभी एक अजीबो-ग़रीब ख़याल यह आया है कि पहले कभी पेड़ों के लिए कहा जाता था कि वे जितना जमीन से ऊपर दिखते हैं, जमीन से नीचे उससे कहीं ज्यादा गहराई तक उतरे होते हैं। बाद में, लोक-तन्त्र के जमाने की शुरूआत होते न होते यह जुमला नेता और अधिकारी दोनों के लिए बराबरी से इस्तेमाल होने लगा। फिर समय ने कुछ ऐसा गजब का पलटा खाया कि जुमला इन्सान से खिसककर, फ़ाइनली, भ्रष्‍टाचार के नाम से पहचाने जाने वाले नये जमाने के सफ़ेद-पोश कारोबार पर फिट हो गया।

कारोबार चाहे कुछ भी हो, उसका अपना ग्लैमर होता है। हर घर में बुजुर्गों की तमन्ना रहती है कि अपना भी कोई एक कारोबारी होता। छोटी-मोटी नौकरी कर रहे लोगों की कौन कहे, ऊँचे से ऊँचा नौकरी-पेशा ऑफ़ीसर भी इस लोभ का संवरण नहीं कर पाता है। इण्डियन डेमोक्रेसी के सिस्टम की जाँच-पड़ताल करने बैठें तो समझ में आता है कि ओहदेदार हों या पॉलिटीशियन, चुनिन्दा हाईली पोजीशन्ड इज्जतदार भर ऐसे होते हैं जिनकी तमन्ना दिल से उतर कर हक़ीकत में तब्दील होती है। जलते-कुढ़ते छुट-भैये तो यह तमन्ना लिए-लिए ही दुनिया से कूच कर जाते हैं। शायद यही वजह है कि पुराने जमाने के छुट-भैयों ने इस नये हाई-प्रोफ़ाइल कारोबार को भ्रष्‍टाचार कहकर बदनाम करना शुरू कर दिया है।

अपनी इस बात को तौलने के लिए एक निहायत ओरीजिनल नजरिया देता हूँ। यूँ समझिए कि एक जमाना था जब धन्धा-दूकान चलाने वाले ग्राहक को चूना लगा देते थे और ठगा गया बेचारा ग्राहक रोने-पीटने या फिर चीखने-चिल्लाने से आगे कुछ खास नहीं कर पाता था। यह ‘ग्राहक’ बेहद आम आदमी होता है जिसकी न तो कोई माई होती है और ना बाप। ऐसे में देशी डेमोक्रेसी में कन्ज्यूमर-फोरम का जमाना आया। दाम लेकर ठीक से सर्विस नहीं देने वालों की खाट खड़ी की जाने लगी। लेकिन इस व्यवस्था की अपनी भी एक समस्या है। जैसे हर गारण्टी की एक सीमा या शर्त होती है, वैसे ही यदि कन्ज्यूमर फोरम में ऊपर वाली सीट पर धोखा देने वाले धन्धेबाज का कोई अपना बैठा हो तो लुटा हुआ ग्राहक एक बार फिर से लुट-पिट जाता है। ऐसे असमंजस में, सर्विस की जो पक्की गारण्टी भ्रष्‍टाचार का कारोबार देता है उस पर शंका की उँगली कोई नहीं उठा पाया है। इसकी साख इतनी इण्टरनेशनल है कि क्वात्रोकी से लेकर ओबामा तक देशी ओहदेदारों और पॉलिटीशियन्स से बेनामी डील करने में ज्यादा सोच-विचार नहीं करते।

वैसे, सोचने-विचारने से छूट लेना भी एक कला है। सबके बस की बात नहीं है। ज्यादातर तो सोच-विचार कर ही बातें करते हैं। कुछ करने से पहले काफ़ी सोच-विचार कर लेना बिलो द पॉवर्टी-लाइन वालों की औसत बीमारी है। वैसे सचाई यही है कि जो इस बीमारी से पार पा जाते है, सफलता उनके चरण चूमने को भटकती रहती है लेकिन आपकी शक़ल देख कर लग रहा है कि आपको मेरा यह फण्डा मन्जूर नहीं है। यों, आपकी इस हिमाक़त पर मैं फलसफ़े के अपने पिटारे से यह फण्डा भी उछाल सकता हूँ कि मध्यम वर्ग की यही समस्या है — खुद का पॉवर्टी-लाइन से ऊपर होना साबित करने की ख़्वाहिश में वह अनाप-शनाप लुटाता तो रहता है लेकिन कभी भी इन्फ़ीरियरिटी के कॉम्प्लेक्स से बाहर नहीं निकल पाता। लेकिन, क्या करूँ? जी चाह रहा है कि आपकी बेचारगी पर तरस खाकर अपने फलसफ़े को प्रूव करने के लिए हाई-प्रोफ़ाइल इण्डियन लाइफ़ से कोई ताजातरीन बानगी पेश करूँ।

मेरी बात से यदि आपको यह लगने लगा हो कि मैं बाबा-बैरागी के चोले में बेहतरीन कारोबार चला रहे रामदेव के जीवन-चरित्र से कुछ पर्दा हटाऊँगा तो आप गलती कर रहे हैं। आप भूल रहे हैं कि घूम-फिर कर सत्ता-देवी के साथ सात फेरे लेने की तमन्ना रखने वालों का इतिहास गवाह है कि वे जल्दी से जल्दी बे-परदा होने खुद ही उतावले रहते हैं। ज्यादा सोचते-विचारते नहीं हैं, केवल इन्सटिंक्‍ट पर काम करते हैं। यानि, मुझे लगता है कि छोटी सी परदनिया में करतब दिखाते-दिखाते सम्पदा और वोट दोनों को समेटने को आतुर इस आदमी के जीवन में बे-परदा होने को कुछ बचा ही नहीं है। और निशा-खातिर रहें, दूसरे के भाषण की हाथ लगी कॉपी को अपना बतलाकर यूएनओ में बाँच देने वाले अपने वजीरे खारिजा के एपीसोड में बानगी देने लायक ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप जान न गये हों।

हाँ, मुझे कर्नाटक की विधान सभा की एक घटना याद आयी है। किस्सा वर्ल्ड कप के इण्डिया-इंग्लैण्ड मैच में टिकिटों की बिक्री के बवाल से जुड़ा है। किसी ने बताया था कि बीजेपी के एक विधायक ने असेम्बली में कहा कि केएससीए ने एक व्यक्‍ति को केवल एक ही टिकिट बेचने की शर्त को लागू करके ठीक नहीं किया! सॉरी, गलती हो गयी। जनता के सेवक के रूप में हाथ जोड़कर जीते इस मेम्बर की आपत्ति इस बात पर नहीं थी कि लम्बी लाइन की मारा-मारी झेलने के बाद आम आदमी केवल एक ही टिकिट पा सकता था। दरअसल, उसकी नाराजगी यह थी कि एमएलए को भी आम आदमी की बराबरी पर लाकर एसोसिएशन वालों ने असेम्बली के मेम्बरान को बेहद बेआबरू कर दिया है। उसने सवाल उठाया कि क्या लॉ-मेकर्स इतने गये-गुजरे हो गये हैं कि उन्हें महज ‘आम आदमी’ मान लिया गया है? जाहिर है, ओहदेदार और आम इन्सान में बड़ा फ़र्क है। स्पीकर ने भी इसे माना और जाँच का आश्‍वासन दे दिया।

(१३ मार्च २०११)