पड़ना असर खरबूजे पर खरबूजे का

मिस्टेक मामूली सी थी। दरअसल, सोचने की सारी जवाबदारी ‘नेहरू-गांधी’ वंशजों ने कब्जा रखी है। सो, पार्टी में क्या पीएम, क्या सीएम और क्या लल्लू-पंजू; सोचने-समझने की सभी की आदत कभी की छूट चुकी है।

न्यौता मियाँ दरबारी ने भेजा था। यथा नाम तथा प्रजा। निठल्लों से मिलना हो, बिना टिकट तमाशा देखना हो तो दरबारी के चबूतरा-दरबार से उम्दा कोई दूसरा ठिया मिलना नामुमकिन है। चुहल के साथ चाय-पकौड़े पूरे समय हाजिर। वह भी मुफ़्तम-मुफ़्त। चुहल न सही, फोकट की चाय और पकौड़ों का भी तो अपना आनन्द है। मना नहीं कर पाया। ढलती साँझ वहीं गुजारना मंजूर कर लिया।

पहुँचने में तनिक देर हो गयी थी इसलिए ठल्ला-नबीसों के बीच जागरूकता के बर्निंग इश्यू की शुरूआत का तो पता नहीं लेकिन जब पहुँचा तब सत्र पॉलिटिक्स की बारीकियों से जूझ रहा था। जैसे ही मैंने अपने नितम्ब चबूतरे की बची-खुची जगह पर टिकाये, सुनाई पड़ा कि कोई कह रहा था — यथा राजा, तथा प्रजा। वैसे, उस समय तो मैंने मुस्करा कर ही अपने उस स्वागत को स्वीकार किया था लेकिन एकदम प्राइवेट में आपके सामने एडमिट करता हूँ कि मुझे भी सीता मैया जैसी प्रार्थना करने की इच्छा हुई थी — हे धरती माता, फट जाओ और मुझे अपने में समा जाने का सौभाग्य दे दो! एक निरा जमीनी आदमी इससे ज्यादा और चाह भी क्या सकता है?

लेकिन मेरी इस ईमान-दारी भरी स्वीकारोक्‍ति को सुनकर ओवर रिएक्‍ट मर करिये। यह मत समझिये कि मैं अपनी किसी करतूत से चुल्लू भर पानी में डूब जाने को उतावला हो रहा था। दरअसल, तब कैण्डिडली मुझे लगा था कि मुझसे पहले पहुँचने वालों ने जैसे उस एक पल में मुझे एस एम कृष्णा के साथ तौल कर धर दिया था। जानता हूँ, कृष्णा जैसी किसी सीट पर बिराजने का सपना पाले घूमने वालों को मेरी यह बात निरी मूर्खता लग रही होगी। हो सकता है कि वे ठीक हों — सैण्ट्रल कैबिनेट में इतनी इज्जत की कुर्सी के काबिल मान लिया जाना भी तो बड़ी बात है। लेकिन मैं उस सीट की नहीं, उस पर बैठे आदमी की थू-थू से घबरा गया था। लगा, जैसे उस निहायत ईमान-दार आदमी पर उछाले गये देश-व्यापी थूक के कुछ कतरे बात की बात में मेरी ओर भी डायवर्ट कर दिये गये थे। ईमान-दारी की इसी बेक़द्री का नतीजा है कि अपने देश से ईमान-दारी धीरे-धीरे विलुप्‍त-प्राय हो रही है।

देखिये ना, कृष्‍णा में ईमान कूट-कूट कर नहीं भरी होती तो वे यह स्वीकार ही नहीं करते कि उन्होंने किसी दूसरे के भाषण के शुरूआती अंश पढ़े थे। वे चाहते तो मीडिया पर पलट-वार करने के पॉलिटीशियन्स के जन्म-सिद्ध अधिकार का इस्तेमाल कर सकते थे। सक्सेस-फुली। मीडिया पर थोपने के दो-दो कॉमनली यूज़्ड ग्राउण्ड थे उनके पास — “उनके डिपार्टमेण्ट के काबिल कारिन्दों ने उनके निर्देश पर जो भाषण लिखा था, किसी हथकण्डे से उसकी एक कॉपी पुर्तगाली मुलाजिमों ने अपने वजीरे खारिजा के लिए चुरा ली थी।” या, “ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था, मीडिया ने मिस रिपोर्ट किया था” यों, कृष्णा के पास कुछ दूसरे बेहतरीन ग्राउण्ड भी थे। जैसे, वे अपने सीनियर कलीग प्रणव दा की लाइन पर चलते हुए कह सकते थे कि उन्होंने जो कुछ भी कहा था वह यूएन में कहा था। जब उस प्लेटफार्म से किसी ने भी सवाल नहीं उठाया, पुर्तगाल के मन्त्री ने भी नहीं; तो इण्डियन मीडिया या संसद्‌ उसे कैसे इश्यू बना सकती है? या फिर, वे अपने पीएम की तर्ज पर ऐसा कुछ भी दोंद सकते थे कि खुद पुर्तगाली दल ने माना था कि कृष्णा ने उनके भाषण में से कुछ भी नहीं पढ़ा था।

लेकिन, ईमान के सच्चे उस आदमी ने सरे आम मान लिया कि क्योंकि अपने भाषण में वह क्या कहने वाला है इसका उसे बिल्कुल भी अन्दाज नहीं था और क्योंकि दूसरे क्या-क्या कहने वाले हैं, यह बताने के लिए उसके सामने जो कागज रखे गये थे उनको उसके अपने भाषण से सैपरेट करने वाला कोई निशान लगाने से उसके ना-काबिल कारिन्दे चूक गये थे इसलिए वह यह सोच ही नहीं सका था कि किसी दूसरे का भाषण भी बाँचने में आ सकता है। ठीक भी है। दरअसल, सोचने की सारी जवाबदारी ‘नेहरू-गांधी’ वंशजों ने कब्जा रखी है। न जाने कब से। सो, पार्टी में क्या पीएम, क्या सीएम और क्या लल्लू-पंजू; सोचने-समझने की सभी की आदत कभी की छूट चुकी है। सोनिया की छत्र-छाया में सोचने-समझने की आदत उसकी भी नहीं रही है। बस, यही एक मामूली सी मिस्टेक हुई थी, उससे या उसके देश के किसी और से।

सच कहूँ? मुझे लगा था कि राजा और प्रजा के बीच मुझे खरबूजा कहकर चिढ़ाया गया था। आप कहे बिना नहीं रहेंगे कि अब यह खरबूजा कहाँ से बीच में टपक पड़ा? एक सीमा तक आप गलत भी नहीं हैं। इसलिए कि, मन के उस चोर ने आपके भीतर नहीं मेरे भीतर ही सिर उठाया था। और फिर, शायद इसलिए भी कि, आप भूल रहे हैं कि न जाने कितनी भाषाओं में कितनी सारी कहावतें हैं जिनका भाव है कि उस पर अपना हाथ जलाए बिना यह समझना निहायत नामुमकिन है कि तवा कितना गरम है? अब, जब आप इतना सी सीधी बात ही नहीं समझे तो यह कैसे समझेंगे कि मुझे लगा था कि कहने वाले ने मुझ पर पृथ्वीराज चौहान का उलहना देते हुए फब्ती कसी थी — यथा राजा, तथा प्रजा। आपको यह तो याद है ना, कि जापान की न्यूक्लियर इमर्जेंसी को लेकर मुम्बई में हुई समीक्षा-बैठक की जो तस्वीर मीडिया ने पेश की थी उसमें महाराष्‍ट्र के सीएम पक्की नींद का लुत्फ़ उठाते पकड़े गये थे? मुझे लगा था कि जागरूकता की जरूरत पर अपनी-अपनी पर्सनल रिस्पॉन्सिबिलिटी को अन्डर-लाइन करने के लिए इकट्‍ठे होने के बुलावे पर मेरे इतनी देर से पहुँचने को लेकर ही मुझ पर खरबूजे को देखकर खरबूजे द्वारा रंग बदल लेने जैसा गहरा टॉन्‍ट कसा गया था।

लेकिन फिर इमीजिएटली मैं सम्हल भी गया था। बुद्धि-जीवी हूँ ना! स्पॉन्टेनियसली यह सूझ गया था कि किसी ने बात को तूल दिया तो एक बेहद सीधा सवाल दाग कर सबकी बोलती बन्द कर दूँगा — खरबूजों के इस अम्बार में आपके पास इसका क्या सबूत है कि ओरीजिनल लीडरी किसी एक खास खरबूजे के ही हाथ में थी? बोलती बन्द करने से याद आया। जो अपनी बोलती के सदा ही बन्द रहने के लांछन से घिरे रहे हैं ऐसे मनमोहन ने ‘पीएम बनने को अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानने वाला’ बताते हुए आडवानी से यह तक कह डाला कि उन्हें अभी कम से कम साढ़े तीन साल तक तो और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। यही नहीं, डरे-सहमे और सकुचे से रहने वाले इस पीएम ने उस दिन संसद्‌ में शेरो-शायरी का ऐसा समाँ बाँधा कि बड़-बोली सुषमा की अपनी ही बोलती बन्द हो गयी!

(२७ मार्च २०११)