इतने भी बेदाग नहीं हैं मिस्टर ‘क्लीन’

न तो उनका अतीत इतना निष्कलंक रहा है और ना ही वर्तमान उतना बेदाग है जितना कि सिद्ध करने की कोशिश में वे अथवा उनके लगुए-भगुए लगे हुए हैं। ‘गुजरात के एक मन्त्री के खिलाफ़ हुई कार्यवाही का बदला निकालने के लिए ही भाजपा उन्हें कलंकित करने पर तुली हुई है’ जैसे राजनैतिक डिटर्जेण्ट भी उन पर लग चुके, देश के अब तक के सबसे गहरे, भ्रष्‍टाचार के दागों को साफ़ नहीं कर पायेंगे।

तमाम शुरूआती पढ़ाई पंजाब से करने के बाद १९५७ में कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय से प्रथम श्रेणी (ऑनर्स) में एकॉनॉमिक ट्राईपॉस की डिग्री हासिल करने का मनमोहन सिंह का सीवी सुझाता है कि पढ़ाई का इनका कैरियर, बेशक, पर्याप्‍त साफ-सुथरा रहा होगा। लेकिन इसके बिल्कुल विपरीत, यूपीए-२ की तहलका मचाती खबरें इस अर्थ-शास्‍त्री के उत्तर-काल के कुछ ज्यादा ही कलंकित होते जाने की तरफ गम्भीर संकेत कर रही हैं। इस कलंक को हल्का करने की कोशिश में, ‘मीडिया-इण्टरेक्शन’ के नाम पर, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के चुनिन्दा प्रतिनिधियों से सफ़ाई-देही जैसी बातचीत के लिए की गयी उनकी पहल ने बिल्कुल उल्टा असर किया है। कलंक और ज्यादा गहरा गया है। बातचीत के इस न्यौते में अल जजीरा को शामिल किये जाने में, इस देश की जनता को असमंजस से उबारने की चिन्ता की जगह, बाहरी दुनिया में बिगड़ती अपनी छवि को सुधारने की मनमोहन की ललक ही अधिक दिखाई दी।

मनमोहन को भले अस्वीकार हो लेकिन दूरदर्शन पर लाइव दिखाने के लिए आयोजित हुए उस मीडिया इण्टरेक्शन को पूरा देखने के बाद निकले तथ्य इसकी पुष्‍टि करने वाले हैं कि इस पिटे मोहरे की खुद को ‘ड्रेस्ड-अप’ रूप में पूरा चाक-चौबन्द दिखाने की ललक को पूरा करने की मुहिम बड़ी सावधानी से रची गयी थी। इतनी कि, एस बैण्ड जैसे ताजा-ताजा किस्से के बारे में पूछे जाने वाले कथित रूप से सबसे तीखे सवालों तक के लिखित उत्तर पहले से तैयार कर सामने रख लिए गये थे। साफ है, आमन्त्रित मीडिया और प्रधान मन्त्री के बीच सवाल-जवाब की परस्पर समझ बहुत अच्छे से बना ली गयी थी। यह अलग बात है कि एक ‘इण्टरेक्टर’ ने उत्साह के अतिरेक में पीएम और मीडिय़ा की बनी इस परस्पर समझ की सीमा से आगे कदम बढ़ाते हुए कुछ ऐसे पूरक सवाल भी उछाल दिये जो इस समूची ड्रिल पर पानी फेर सकते थे। तब यह देखने काबिल था कि मीडिया-मुलाकात को संचालित कर रहे अधिकारी ने कितने तपाक से उसे आगे कुछ भी पूछने से रोकने का बेहद अपमान-जनक प्रयास किया था? यह अधिकारी आमन्त्रित मीडिया-प्रतिनिधियों को अपने सवालों के लिए आमन्त्रित करने के साथ ही, ‘थैंक यू’ कहकर, खासी असहजता से अटकते और हिचक से हकलाते हुए जवाब देते मनमोहन को सुविधा-जनक विराम भी दे रहा था।

इस इण्टरेक्शन के बाद, आमन्त्रित मीडिया के अपने-अपने चैनलों में लगभग पूरे दिन चली सधी-सम्हली समीक्षा को देखकर कहना पड़ेगा कि सारी निजी कमजोरियों के बाद भी मनमोहन अपनी मंजिल को पाने में एक सीमा तक सफल हुए। क्योंकि बुद्धू बक्से में, कम से कम मुझे तो, एक भी ऐसा कार्यक्रम देखने नहीं मिला जिसने मनमोहन की निजी ‘बेदागी’ के कसीदे न पढ़े हों। इन सारे चैनलों ने मनमोहन की इस सफाई को तो पूरे देश के सामने रखा ही कि वे जितने दिखाये जा रहे हैं, यथार्थ में उतने दोषी नहीं हैं; यह स्थापित करने में एड़ी-चोटी का जोर भी लगा दिया कि ‘एक निहायत पाक-साफ़ इन्सान राजनीति की विकट मजबूरी में बे-वजह ही कीचड़ से सराबोर हुआ दिखलाया जा रहा है!’ कहने वालों ने तो उन्हें देश का अब तक का सबसे ईमानदार प्रधान मन्त्री तक कह डाला।

इस बिन्दु पर, खुद मनमोहन द्वारा प्रायोजित मीडिया से कहे गये एक कथन को दो-धारी तलवार की तरह देखना रोचक होगा। उस दिन, ओढ़े हुए भोलेपन की आड़ में, मनमोहन ने जो कुछ कहा था उसका सार यह था कि ‘घटनाओं-परिस्थितियों को अपने ही नजरिये से देखने में कोई गलती नहीं है लेकिन, उन्हें देश के बीच रखते हुए, तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जाना चाहिए।’ यहाँ यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या मनमोहन द्वारा दी गयी, घपलों-खुलासों को नकारती, ढेरों लचर सफाइयाँ खुद भी आम जन के ऐसे ही पलट-सवालों से घिरी हुई नहीं थीं?

आम जन के इस खुले सवाल पर पूरी की पूरी कांग्रेस ब्रिगेड बड़ी ढिठाई से पहले तो पूछती खड़ी मिल जायेगी कि कैसे घपले? और, जब इस सवाल पर होने वाले सार्वजनिक खुलासों से पिण्ड छुड़ाना असम्भव होता दिखे तो वह यह कहते हुए बगलें झाँकती मिलेगी कि तथ्यों की सचाई का पता लगाया जा रहा है, किसी भी दोषी को बख़्शा नहीं जायेगा! विशेष रूप से मुद्दे के इस सवाल पर कि खुद मनमोहन के ‘गठबन्धन की अपनी मजबूरियों’ वाली इकलौती सफ़ाई पर भरोसा रखते हुए कैसे आश्‍वस्त हुआ जा सकता है कि, सच में ही, एक भी दोषी को बख़्शा नहीं जायेगा?

और, तथ्य क्या हैं? सबसे गम्भीर तथ्य तो यह है कि इस यूपीए सरकार का मुखिया खुद इतना पाक-साफ कभी नहीं रहा जितना दिखाये जाने का सौभाग्य उसे मिला हुआ है। यह कहते हुए मेरा सीधा मतलब यूपीए सरकार के मुखिया से है, यूपीए गठबन्धन की मुखिया से कतई नहीं। और मेरा यकीन कीजिए, खुली आँखों से तलाशने पर ऐसे बहुत से आधार मिल जायेंगे जो मनमोहन की इस सफलता पर अचरज की उँगली उठाएँगे कि यह व्यक्‍ति एक निहायत भला, भोला, पाक-साफ और ईमानदार अर्थ-शास्‍त्री है। जानकार बतलाते हैं कि पंजाब में सालों पहले पकड़े गये नक्सल-प्रमुख ने १९९१ में जेल में दिये जीवन के अपने अन्तिम साक्षात्कार में खुलासा किया था कि उससे तत्‍कालीन वित्त मन्त्री मनमोहन सिंह के नक्सल-गतिविधियों में लिप्‍त होने के सन्देह की पुलिसिया पूछ-ताछ तब की गयी थी जब उनकी हैसियत पंजाब में नियुक्‍त महज एक प्रोफेसर की हुआ करती थी।

नक्सल-प्रमुख की मानें तो, उसने यदि मनमोहन सिंह को बचाया न होता तो वे नक्सलवादियों के समर्थक होने के आरोप में जेल पहुँच गये होते। पंजाब के इस नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह समाऊ के बारे में देश के कई बड़े संसदीय नेताओं ने जैसा वर्णन किया है उससे उनकी बातों पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण समझ में नहीं आता है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रह चुके स्वर्गीय हरकिशन सिंह सुरजीत का कहना था कि हाकाम सिंह देश के महान क्रांतिकारी थे। तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने भी सुरजीत से सहमति दर्शायी थी।

उस साक्षात्‍कार में हाकाम सिंह ने आपात्‌-काल के दिनों को याद करते हुए बताया था कि चंडीगढ़ में एक बैंक को लूटने के प्रयास की घटना में नक्सलवादियों के होने की आशंका पुलिस वालों को थी। पुलिस उस समय तो किसी को इस घटना के आरोप में गिरफ्तार नहीं कर सकी लेकिन मामला उसकी फाइलों में पड़ा रहा। जब हाकाम सिंह को गिरफ्तार किया गया तो पुलिस ने उससे कई मामलों में पूछताछ की। इसमें बैंक-काण्ड भी शामिल था। लेकिन हाकाम सिंह ने सम्‍पर्क और सहानुभूति रखने वालों को हर हाल में बचाने का निर्णय लिया था। इसके लिए हाकाम सिंह ने यह रणनीति बनाई कि वह पुलिस को केवल उन्हीं नामों के बारे में बतलायेगा जो या तो उस समय भूमिगत्‌ हो गए थे या फिर मारे जा चुके थे। पुलिस बैंक-लूट काण्‍ड मामले में प्रोफेसर (मनमोहन सिंह) के नाम पर जोर देकर कबुलवाना चाह रही थी कि बैंक की वह डुप्लीकेट चाबी, जिससे बैंक को लूटने का प्रयास किया गया था, उसी ने बनवाई थी। पुलिस ने उसे प्रोफ्रेसर की तस्वीर भी दिखाई थी लेकिन हाकाम सिंह ने साफ़ तौर पर कहा था कि वह ऐसे किसी व्यक्‍ति को न तो जानता था और ना ही उससे उसकी मुलाकात हुई थी।

एक और भी तथ्य है। दिसम्बर १९४५ में अन्तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की सदस्यता लेने के बाद भारत ने पहली बार दिनांक ९ नवम्बर १९८१ को आईएमएफ़ से ३९० करोड़ एसडीआर (मूलत: आईएमएफ़ के अन्तर्गत्‌ उपयोग में लायी जाने वाली एक तरह की अन्तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा-इकाई) का विशाल ऋण लिया था। जहाँ तत्‍कालीन भारतीय परिस्थितियों में गैर जरूरी, इस ऋण को लेने के लिए केन्द्रीय सरकार को सहमत कराने में उस मनमोहन की भूमिका बड़ी महत्‍वपूर्ण थी जो अप्रैल १९८० से सितम्बर १९८२ तक योजना आयोग के सदस्य सचिव का पद सुशोभित कर रहा था वहीं इस महत्‍वपूर्ण तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि योजना आयोग में प्रतिष्‍ठित होने से ठीक पहले, नवम्बर १९७६ से अप्रैल १९८० तक, मनमोहन ने भारतीय रिजर्व बैंक के निदेशक के साथ ही साथ मनीला स्थित एशिया विकास बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भारत के वैकल्पिक गवर्नर का पद भी सम्हाला हुआ था।

तात्पर्य बिल्कुल साफ है — योजना आयोग के सदस्य सचिव के पद पर प्रतिष्‍ठित होने तक मनमोहन को धन और ऋण की अन्तर्राष्‍ट्रीय ताकत के साथ ही साथ उससे जुड़ी राजनीति के भी सारे दाँव-पेंचों का अच्छा-खासा प्रत्यक्ष ज्ञान हो चुका था। ९ नवम्बर १९८१ का वह दिन है कि आज का दिन, भारत मूल और ब्याज के भुगतान के दलदल से उबर नहीं पाया है। लिए जाते उधार के आसरे घी पीने वाले सबल-समर्थ नेताओं और अधिकारियों के रहते वह सम्पन्न देशों की अन्तर्राष्‍ट्रीय बिरादरी की इस सूद-खोरी से कभी उबर पायेगा इसकी सम्भावना भी नहीं है। बदले में, मनमोहन को सितम्बर १९८२ से जनवरी १९८५ तक की अवधि के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के साथ ही अन्तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भारत के वैकल्पिक गवर्नर के पद पर बैठने का भी सौभाग्य मिला।

यों, प्रधान मन्‍त्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार मँहगाई पर काबू पाने में सफल रहेगी और मुद्रा स्फीति अधिकतम्‌ सात फ़ीसदी के स्तर तक गिरेगी भी। लेकिन, लगे हाथों, उन्होंने यह कहते हुए कि अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्तर पर होने वाली कई चीजों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है, भविष्य की अपनी निजी नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला भी झाड़ लिया। मुद्रा-स्फीति और उसके कारण लगातार बढ़ती ही जा रही मँहगाई को स्वीकारते हुए भी विकास-दर की खातिर उसे हर हालत में झेलने की बात करता यह अर्थ-शास्‍त्री पूरी ढिठाई से दिखा रहा था कि सम्पन्नों की समृद्धता को लेकर उसकी प्रतिबद्धता कितनी प्रबल है। बहुसंख्य गरीबों वाले इस देश के प्रति मनमोहन का यह ‘विकास-वादी’ नजरिया अन्तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष जैसे घोर सूद-खोर संस्थानों के प्रति उसकी विकट प्रतिबद्धता की कथित मजबूरी से आगे किसी अन्य सोच के नहीं होने को ही दर्शाता है।

इस समूचे परिदृश्य में मनमोहन का ‘राग मजबूरी’ और कितने दिनों तक इस ‘अर्थ’ शास्‍त्री की छवि को बेदाग दिखा पायेगा यह अब कोरा काल्पनिक सवाल नहीं रहा है। ‘मीडिया इण्टरेक्शन’ ने अपने दागों को छिपाने की मनमोहन की सीमाएँ दिखानी शुरू कर दी हैं। टू जी स्पैक्‍ट्रम काण्ड में जेपीसी को मन्जूर करने के लिए की जा रही अन्तिम पलों की उनकी ‘इज्जत-बचाऊ’ कोशिशें इसकी प्रमाण हैं। एण्ट्रिक्स (इसरो) के विवादास्पद एस बैण्ड करार को ‘सुरक्षा’ नजरिये से रद्द कर देने की लचर सी घोषणा में भी यही सन्देश निहित है कि मनमोहन के चौगिर्द शिकंजा जकड़ रहा है। यह मानने के कारण हैं कि खुद मनमोहन भी इस सचाई से रूबरू हो गये हैं।

वे जान चुके हैं कि अपनी बन्दूक चाहे सिब्बल के कन्धे पर टिकायें, सीबीआई के या एटॉर्नी जनरल या फिर सॉलिसिटर जनरल के कन्धे पर; राजस्व को हुए नुकसान के आँकलन के लिए ‘आधार’ के निर्धारण की बात करके अब जनता को और आगे भ्रमित नहीं रखा जा सकता है। वे यह भी अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि संकेतों ही संकेतों में सोनिया-राहुल के सामने अपनी बेबसी के इजहार के उनके दिन लद चुके हैं। कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी का एक तात्पर्य यह अवश्य है कि सम्बन्धित कैबिनेट मन्त्री या निर्णय में सीधे-सीधे शामिल कैबिनेट मन्त्रियों के समूह का कोई सदस्य लिये गये निर्णय की जिम्मेदारी से खुद को मुक्‍त रहा नहीं कह सकता है। लेकिन, उससे भी ज्यादा बड़ा और गहरा तथ्य यह है कि राष्‍ट्रपति एक व्यक्‍ति-विशेष को मन्त्रि-मण्डल बनाने के लिए आमन्त्रित करता है। मन्त्रि-मण्डल में कौन होगा, कौन नहीं और उसके इस मन्त्रि-मण्डल में किसके पास क्या जिम्मा होगा; यह निर्णय लेना इस व्यक्‍ति का संवैधानिक विशेषाधिकार है।

गठ-बन्धन की राजनीति की आड़ में प्रधान मन्त्री के रूप में आहूत हुआ यह व्यक्‍ति सरकार के सुचारु संचालन के अपने छोटे से छोटे दायित्व को अपने मन्त्रि-मण्डल में से किसी एक अथवा कुछ सदस्यों के कन्धों पर लाद कर अपनी वैयक्‍तिक जिम्मेदारी से मुक्‍ति नहीं पा सकता है। फिर वह भले ही उसका अपनी ही पार्टी के कुछ गुटों से हुआ सहज गठ-बन्धन हो या फिर अन्तर्दलीय असहज गठ-बन्धन। अन्तत:, मूल जवाबदेही तो उसकी अपनी ही होगी। विशेष रूप से तब जब उसने ऐसे किसी गठ-बन्धन के दबाव में, ज्ञान में आने के बाद भी, तथ्यों की ओर से अपनी आँखें फेरे रखी हों। खुद मनमोहन ने भी उस मीडिया इण्टरेक्‍शन में स्वीकारा है कि उन्होंने सब कुछ देखते-समझते हुए भी जान-बूझकर ही तथ्यों से अपनी आँखें फेर रखी थीं।

जिस किसी को भी इस खुले जन-निष्‍कर्ष पर आपत्ति हो उसे मीडिया इण्टरेक्शन के उस अंश को उलट-पलट कर अच्छी तरह से देखना-समझना होगा जिसमें इस ‘निहायत बेदाग’ व्यक्‍ति ने बिना लाग-लपेट किये जो कहा था उसका सीधा-सरल सार यह था कि टू जी प्रकरण में, घोटाले के यथार्थ में घटने के पहले से ही, उससे जुड़ी बातें उनके निजी ज्ञान में आ चुकी थीं— “उस समय राजा ने मुझे बताया था कि ट्राई ने इसका विरोध किया था।” उन्होंने स्वयं भी, २००७ में, राजा को पत्र लिखकर अपनी चिन्‍ता जताने जैसी शुरूआती पहल की थी। लेकिन फिर “राजा ने मेरे पत्र का जवाब दिया था और कहा था कि उन्होंने इस मामले में पूरी पारदर्शिता निभाई है और आगे भी निभाते रहेंगे।” अपनी निर्दोषिता पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि लेकिन राजा के निर्णय को वित्त मन्त्रालय की सहमति मिलने पर मैंने सोचा कि “जब सभी सम्‍बन्‍धित विभाग और मन्‍त्रालय इसके पक्ष में नहीं थे, तो मैं क्यों इस पर ज़ोर दूँ?” और इसीलिए, इस ‘भले’ इन्सान ने आगे कुछ और नहीं करने का निर्णय किया!

बिना बारीक विस्तार में गये, पुराने पड़ चुके टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले और सीवीसी की विवादित नियुक्‍ति से लगाकर ताजातर एस बैण्ड घोटाले तक, जमीनी सचाई यही है कि इनसे जुड़ी बातें तभी सार्वजनिक हुई हैं जब या तो कैग ने या फिर किसी जागरूक नागरिक अथवा मीडिया ने, बिल्कुल स्पष्‍ट शब्दों में, यह रहस्योद्‍घाटन कर दिया कि मन्त्रालयों में स्वच्छ और बेदाग दिखने वाले कार्पेट्स के नीचे भारी गन्दगी है। अब तो, देश यह भी जान चुका है कि कैसे कैग द्वारा दी गयी रपट के बाद ईमानदारी से सफाई करने के स्थान पर, उल्टे, ऐसी सारी गन्दगी को खासी मशक्कत के साथ और ज्यादा बेहतर ढंग से छिपाने के हर सम्भव प्रयास तक किये गये। इसके लिए अलग से तर्क-वितर्क करने की कोई आवश्यकता कतई शेष नहीं रही है कि प्रधान मन्त्री को इन सरासर आपराधिक हथकण्डों की अनदेखी के अन्तिम दायित्व से किंचित भी मुक्‍त नहीं किया जा सकता है।

जाहिर है, ‘मिस्टर क्लीन’ का न तो अतीत निष्कलंक रहा है और ना ही वर्तमान उतना बेदाग है जितना कि सिद्ध करने की कोशिश में वे अथवा उनके लगुए-भगुए लगे हुए हैं। ‘भाजपा गुजरात के एक मन्त्री के खिलाफ़ हुई कार्यवाही का बदला निकालने के लिए ही उन्हें कलंकित करने पर तुली हुई है’ जैसे हवाई तर्कों वाले राजनैतिक डिटर्जेण्ट भी उन पर लग चुके भ्रष्‍टाचार के, देश के अब तक के सबसे गहरे, दागों को साफ़ नहीं कर पायेंगे।

(१३ मार्च २०११)