खेल-खेल में डूबा इण्डिया

अब भी समय है, सम्हल जाओ। कहीं ऐसा न हो कि झाँसों में पगी जो ‘माले-मुफ़्त’ स्लीपिंग पिल बाँटी जा रही है उसकी ओवर डोज़ तुम्हें करप्शन के गर्त में इतना डुबा दे कि फिर चाह कर भी प्राण-वायु पा न सको।

प्रदेश के एक नामी-गिरामी एजुकेशन मिनिस्टर को लेकर बनाया गया चुटकुला बचपन के दिनों में बहुत सुनने में आता था। शुरूआत में लगता था कि इतनी संजीदा बात किसी का माखौल उड़ाने के लिए क्यों की जाती है? फिर, समय पाकर आई अकल ने सिखाया कि उसमें ‘चुटकुला’ क्या था? लेकिन उस चुटकुले को बताने से पहले बताने की इच्छा हो रही है कि मन्त्री जी थे काबिले तारीफ़।

मसलन, खादी का सफ़ेद बुर्राक कुर्ता धारण करने के शौकीन इनके संगी-साथी आपसी बात-चीत में इनसे जितनी हो सके उतनी दूरी बना कर रखते थे। मेरी इस बात से यह गफ़लत मत पालिए कि लोग इनसे छरकते थे। बिल्कुल नहीं। आदमी मिलन-सार थे। खुश-मिजाज और दोस्तों के दोस्त। बस, ज्यादा नजदीकी का एक खतरा था। बात करने वाले का दामन बेदाग नहीं रहेगा, इसकी गारण्टी होती थी। नहीं जी! बोफोर्स, ताबूत या पामोलिन की खरीदी हो या फिर टू जी स्पैक्‍ट्रम का आबण्‍टन; ऐसे किसी घपले-घोटाले से उनका दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। फिर, वह समय ही कहाँ इतना आगे बढ़ा था कि ऐसा कोई खयाल भी इनके जेहन में आ पाता? दरअसल, पान चरने के शौकीन इनके मुख से कत्थे भरे इतने छींटे उचटते थे कि सामने वाले का पूरा का पूरा कुर्ता ही रंग देने का माद्दा रखते थे।

खैर, चुटकुला यह था कि एक बार वजीरे एजुकेशन होने के नाते जब इन्हें एक सरकारी स्कूल से एनुअल टूर्नामेण्ट के उद्‍घाटन के लिए न्यौता गया तो अपने उद्‍घाटन-भाषण में इन्होंने फरमाया, “हमारे देश में खेल कुल तीन तरह के होते हैं। पहला कबड्‍डी, दूसरा हॉकी और तीसरा टूर्नामेण्ट!”

क्या कहा, आप समझ नहीं पा रहे हैं कि आज जब हॉकी और कबड्‍डी को जानने वालों को ढूँढ़ने के लिए बाकायदा फण्ड-ग्राण्ट की दरकर होगी तब मैं ये घटिया सा गड़ा मुर्दा उखाड़ने क्यों बैठ गया हूँ? आपकी नाराजी वाजिब भी है। अब तो तरह-तरह के नये खेल ऊग चुके हैं देश में — खबरें बनाना और उन्हें छापना, अपने गिरेबान को पब्लिक की निगाह से छुपाते हुए अपने विरोधी के गिरेबान पर सरे राह हाथ डालना, अपनी कम से कम बीस पुश्तों के गारण्टेड ऐशो-आराम की खातिर सत्ता के गलियारे में अपनी डायरेक्‍ट-इनडायरेक्‍ट खूँटी गाड़ने की सदाबहार जुगत में जुटे रहना, वगैरह-वगैरह। जी हाँ, ठीक याद दिलाया — और क्रिकेट खिलाना, दिखाना भी।

यह क्रिकेट भी क्या गजब का खेल हो गया है? पहले गिनती के कुछ रईस-जादे क्रिकेट खेलते थे। फिर इनकी खड़ाउओं को पूजने वाले कुछ देशों ने क्रिकेट को खेलना शुरू किया। फिर, जब इस खड़ाऊँ-पूजा ने ज्यादा जोर मारा तो सच्ची-मुच्ची के ‘क्रिकेट’ की जगह परदे के पीछे के ‘क्रिकेट के खेल’ की नींव रख दी गयी — खाड़ी के शेखों के कदमों में। काले-पीले के माहिर दुनिया भर के सारे नामी-गिरामी हाजिरी डालने को बेताब हो गये। न्यूट्रल वेन्यू के नाम पर अण्डर वर्ल्ड को तो एक सुरक्षित स्वर्ग तक मिल गया। फिर देखते-देखते, क्रिकेट और कूट-नीति एक-दूसरे के पर्याय हो गये। क्रिकेट की एयर-कण्डीशण्ड पैवेलियन्स की कृपा से छत्तीस के आँकड़े तिरसठ में बदलने लगे। पहले मियाँ मुशर्रफ आये, फिर श्रीमान्‌ गिलानी भी पधार गये।

भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गये वर्ल्ड कप के सेमी-फाइनल को देखने के लिए गिलानी के आने और मनमोहन से गुटर-गूँ करने की बात से बीते नवाबी दौर की यादें ताजा हो गयीं। उस दौर में रियाया महज नवाब-जागीरदार की जर-खरीद होती थी। सुना है, मुर्गों की लड़ाई में जागीरदारी की मिल्कियत तय हो जाती थी। अपने लड़ाके मुर्गे की हार या जीत के ऐवज में रियाया इस ‘राजा बहादुर’ से उस ‘नवाब हुजूर’ की ड्योढ़ी की मुँहताज कर दी जाती थी। अचरज नहीं कि एक अदद सेमी-फाइनल के बाद दोनों पड़ोसी मुल्कों में जो एटमॉस्फ़ियर बना उसने भारत और पाकिस्तान के बीच हुई दो-दो जंगों के बाद मिली जीत-हार के सेलिबरेशन्स को फीका करके धर दिया! फाइनल में लंका पर मिली जीत केन्द्र और राज्य की सरकारों ने इस माहौल को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक तरह से दो-दो अघोषित नेशनल हॉली-डे तक मना लिए गये। यथार्थ पहुँच से कतई दूर अनन्त आकाश में मृग-मरीचिका जैसी हुई किसी कौंध को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हुए पब्लिक सेण्टीमेण्ट्स को एक्सप्लॉयट किया गया। थके-हारे, लुटे-पिटे मानस को भरमाने की निहायत लचर कोशिशों में सट्‍टे से भरे-पूरे इस खेल में मिली जीत को भारत की विश्‍व-विजय के फुगावे की तरह परोसा गया।

पब्लिक सेण्टीमेण्ट्स को एक्सप्लॉयट करने से ध्यान आया। क्रिकेट की ‘विश्‍व-विजय’ की बहती गंगा में हाथ धोने का एक अनूठा खेल और भी शुरू हो गया है। केवल गांधी, मेरा मतलब है मोहनदास करमचन्द गांधी, और मराठा गौरव शिवाजी के बीच ही नहीं; अनेक तरह के असमंजसों से घिरे, उम्र से बुजुर्ग लेकिन विचार-शक्‍ति से बचकाने, ‘अन्ना’ हजारे को भीष्म की तरह आगे कर यह दूसरा नेशनल खेल खेला जा रहा है। बड़े और छँटे हुए दूकान-दारों के निजी शो-केसों में हजारे एक लुभावने जिन्स की तरह सजा दिये गये हैं। अपनी-अपनी हारी हुई बाजियों में फिर से रंगत भरने के लिए परस्पर धुर विरोधियों को भी इस जिन्स से कोई परहेज नहीं है। जो अपने किसी परहेज के होने को दर्शा रहे हैं उनके भी हृदय इस जिन्स की सम्भावित कामयाबी के उल्लास से सराबोर हैं — सिक्का चित्त गिरे कि पट्‍ट, सभी को अपनी जीत पक्की होती नजर आ रही है!

अरमानों के सपने सँजोये बैठे सपनों के इन सभी सौदागरों का अनुमान है कि सामने खड़े चुनावी दौर में हजारे के फुगावे से आई खुश-खबर की बहार अपना ठौर उनकी अपनी झोली में ही लेगी। लेकिन, मैं बेहद घबराया हुआ हूँ। मुझे डर है कि खेल ही खेल में सतयुग फिर से ला देने का भ्रम फैलाते इस बेहद नये खेल में देश कहीं डूब ही न जाए। यह कहने को जी करता है कि हे प्यारे भारत वासियो! अब भी समय है, सम्हल जाओ। कहीं ऐसा न हो कि झाँसों में पगी जो ‘माले-मुफ़्त’ स्लीपिंग पिल बाँटी जा रही है उसकी ओवर डोज़ तुम्हें करप्शन के गर्त में इतना डुबा दे कि फिर चाह कर भी प्राण-वायु पा न सको।

(०३ अप्रैल २०११)