मेरे देश का यारो, क्या कहना!

आप सोच रहे होंगे कि बैण्ड-बाजे की धुन से कहाँ पॉलिटिक्स के ओछेपन में घसीट लाया आपको। पर, धीरज से सुनिये। मैं एक खास गाने के धुन की बात कर रहा था ना? तो वह गाना है, ‘मेरे देश का यारो, क्या कहना!’

मेरे मोहल्ले में बैण्ड-बाजे की एक दूकान है। एक अदद मालिक और कई सारे उसके एम्प्लॉई। वैसे, किसी नए इन्सान के लिए इतने लोगों में से एम्प्लॉयर और एम्प्लॉई का भेद करना नेक्स्ट टु इम्पॉसिबल है। एक जमाना था जब यहाँ का एम्प्लॉयर बैण्ड-मास्टर के खास रुतबे वाला होता था। तब उसकी तीन-तीन टुकड़ियाँ होती थीं। जैसी पार्टी फँसती थी मास्टर वैसी ही टुकड़ी भेज दिया करता था। चुनिन्दा पार्टी में कभी खुद चला गया तो समझो उस प्रोग्राम की तूती बोल गयी। लेकिन बहुत सारे धन्धों की तरह ही बैण्ड-बाजे के इस धन्धे की भी अपनी बैण्ड बज गयी थी। अब डीजे की धूम थी। धीरे-धीरे मास्टर का अपना रुतबा भी केवल एक बैण्ड वाले में सिकुड़ता गया। एम्प्लॉयर और एम्प्लॉई सिंगल पार्टी के कभी-कभार इकट्‍ठे होने वाले साथियों में कन्वर्ट हो गये।

अचानक दूकान में हलचल बढ़ती दिखने लगी। एक-दो दिनों में ही सुबह-शाम की प्रैक्टिस भी होने लगी। सिर चकरा गया। लेकिन इतना अभी से साफ किये देता हूँ कि मेरी खोपड़ी ऑफ़-सीजन में भी अचानक शुरू हुई इनकी हलचल से नहीं भन्नाई थी। बल्कि, मैं तो उस गाने की धुन को सुनकर अकबका गया था जिसकी ये सब जम कर प्रैक्‍टिस कर रहे थे। न तो जनवरी के दिन चल रहे थे और न अगस्त का मौसम सिर पर चढ़ा हुआ था। इसलिए जब माजरा समझे बिना थूक गिटकना भी हराम हो गया तो मुहिम पर निकला। मास्टर बब्बन भी मिल गये। दुआ-सलाम के बाद बात करने के इन्तजार में बैठना पड़ा तो मजरा कुछ-कुछ समझ में आया। मास्टर अपनी बैण्ड के किसी मैम्बर को कुछ समझा रहे थे। लगा, जैसे उनकी पार्टी का वह नया-नवेला जवान इस बूढ़े मास्टर से कोई तर्क कर रहा था और बुजुर्गवार थे कि उसके इन-एक्सपीरिएन्स पर दुनिया देखने के अपने लम्बे तजुर्बे को थोपे जा रहे थे। जोर देकर बतला रहे थे कि प्रैक्टिस में किस गाने की धुन को ही तरजीह दी जाए?

यह एक्सपीरिएन्स भी गजब की चीज है। एकदम पर्सनल मैटर। इट डिफ़र्स क्वाइट अपार्ट फ़्रॉम मैन टु मैन। गिने-चुने उन सिर-फिरों को छोड़ दें, जो केवल कुर्बान होने को ही आतुर रहते हैं, तो रोजी-रोटी और कोरे रौब-दाब के हर मौके को कैश करने में जुटे रहने वाले बाकी के दुनिया-दार अपने इसी पर्सनल एक्सपीरिएन्स के जोड़-घटाने के हिसाब से चलते हैं। हाँ, एक बात और। अपने तजुर्बे के कारण वे पब्लिकली चाहे जितना यह कहते फिरें कि ‘हाई कमान’ ही उनका (या उनकी) खुदा है लेकिन मेरा अपना एक्सपिरिएन्स बड़ा शॉर्ट एण्ड सिम्पल है — यह हिसाब-किताब ही पॉलिटिक्स से कमाने वालों का असली ख़ुदा है। भारतीय दर्शन में बोले तो, ‘मूर्त’ पर ‘अ-मूर्त’ की सुपीरियारिटी!

लेकिन पॉलिटीशियन्स से हुए इन तजुर्बों ने कई बार बड़ा अजीब सा कन्फ़्यूजन दिया है। बिल्कुल न्यूट्रल जैण्डर वाला। जैण्डर के मेरे इस कन्फ़्यूजन से आप मेल-फीमेल वाले अपने कन्फ़्यूजन का घाल-मेल बिल्कुल मत कर बैठना। मेरा मतलब तो मूर्त और अ-मूर्त के बीच की एक बिल्कुल नयी डेफ़िनीशन से है। चौंक गये? जरा चिदम्बरम हुजूर की बातों पर गौर कीजिए, सारे कन्फ़्यूजन खुद ब खुद दूर हो जायेंगे। कहते हैं कि अपने पॉलिटिकल ईक्वेशन्स को पुख़्ता करने की ख़्वाहिश में इन सज्जन ने एक नयी थ्यौरी लिखी थी। इस चिदम्बरम-थ्यौरी की प्रेसी है कि यदि उत्तर और पूर्वी हिस्से इस देश के हिस्से नहीं होते तो भारत अब तक न जाने कितनी प्रगति कर चुका होता! विकी लीक्स ने दावा किया है कि देश के इस होम मिनिस्टर ने मिनिस्ट्री में हुए अपने एक्सपीरिएन्सेज़ के आधार पर लिखी अपनी यह थीसिस जाँचने के लिए अमरीकी राजदूत टिमोथी के हुजूर में सब्मिट की थी। यह अलहदा बात है कि फिलहाल कोई यह बताने को खाली नहीं है कि पप्पू पास हुआ भी या नहीं?

थ्यौरियों के जिक्र से एक और थ्यौरी याद आ गयी। कहते हैं कि खुद वारेन बफेट ने कहा है कि यदि वे इण्वेस्टर नहीं होते तो पत्रकार बने होते। देख रहा हूँ कि मीडिया घरानों के धन्ना-सेठ बनने या, इसके जस्ट अपोजिट, भारतीय धन्ना-सेठों के मीडिया किंग बन जाने के इस दौर में बफेट की इस बात ने उस मजेदार थीसिस के खुलकर सामने आने की पॉसिबिलिटी जगा दी है जिसे जानते तो सभी हैं, बन्द कमरों में आपस में डिसकस भी करते हैं लेकिन जिसे पब्लिक प्लेट-फ़ॉर्म पर ‘ऑन रिकॉर्ड’ दर्ज कराने से हर समझ-दार बचता है। अपनी बात करूँ तो, मुझे लगने लगा है कि इस खुलासे के बाद मीडिया से चँहके हुए नामी-गिरामी लोक-सेवक अब अपनी भड़ास कुछ बेहतर ढंग से निकाल पायेंगे।

भड़ास निकालने की हर बात बर-बस ही मुझे, बे-बस हो-हो जाते, अमर सिंह की किस्मत की याद दिला जाती है। मुलायम के पिछलग्गू रहते हुए भी सुरजीत की छाँह में सोनिया के दरबार का मत्था टेका। लोगों का कहना हुआ कि बे-इज्जत हुए तो बदले में काफी कुछ आँय-बाँय बोले। फिर, समय के फेर में मुलायम जब उतने मुलायम न रहे तो उनके खिलाफ़ बेहद कठोर होकर एक बार फिर से दस जनपथ की ओर टक-टकी बाँधी। इस बार वहाँ से थोड़ी चतुराई बरती गयी तो बाँछें खिल गयीं। मुखर होकर खुद को मुलायम का दल्ला मंजूर करने में भी ऐतराज न रहा। लेकिन अब जब सोनिया ने फिर से ‘खाये-पिये खिसके, ईसाई भाई किसके’ की तर्ज पर आँखें फेरनी शुरू की हैं तो नये सिरे से बड़े भ्राता के पास कबूतर-पातियों वाले आस-भरे सन्देश भिजवा रहे हैं। हाँ, बैलेन्स बिगड़ने न पाये इसलिए अभी तक कांग्रेस के खिलाफ़ कुछ खास बोले नहीं हैं। बल्कि, कहने वाले तो यह भी कहने से नहीं चूक रहे हैं कि शान्ति भूषण वाली सीडी में सोनिया और मुलायम नाम के फेमस खूँटों बीच अपनी ही रस्सी तानकर उस पर दो कदम आगे और तीन कदम पीछे चलने का कमाल दिखा रहे हैं। अब इतना तो आप भी जान ही गये होंगे कि असली खेल क्या है? खैर सहूलियत के लिए मैं ही बताए देता हूँ — एकदम बीचों-बीच औंधे मुँह नहीं गिरे तो किसी न किसी के पाले में होने का सबूत दे ही देंगे।

आप सोच रहे होंगे कि बैण्ड-बाजे की धुन से कहाँ पॉलिटिक्स के ओछे-पन में घसीट लाया आपको। पर, धीरज से सुनिये। मैं एक खास गाने के धुन की बात कर रहा था ना? तो वह गाना है, ‘मेरे देश का यारो, क्या कहना!’ पीसीसी चीफ़ की नियुक्‍ति होनी है। पक्का नहीं कि बाजी कौन मारेगा? लेकिन, जुलूस का ठेका उन्हें ही मिले यह पक्का कर लिया है बब्बन ने। सो, प्रैक्‍टिस तो अभी से करनी होगी। इसीलिए गाना ऐसा चुना है जो, बिना किसी गिला-शिकवा के, हर प्रॉबेबल के जुलूस पर सटीक बैठे।

(१० अप्रैल २०११)