चोर की दाढ़ी का तिनका

अपने कहे से मुकरने को ‘बन्दर-कुलाटी’ कहते हैं। कहते तो यह भी हैं कि जब पट्‍ठा इतना माहिर हो तो उस्ताद का क्या कहना? लेकिन, वह उस्ताद है यह प्रूव करने के लिए फ्रण्ट पर तो उस्ताद को ही आना होगा ना?

बीते दिनों कुछ ऐसा हुआ जिसने याद दिलाया कि चोर पकड़ाई में न आता हो तो सामने मौजूद हर शख़्स को सस्पैक्‍ट्स मानते हुए उसकी दाढ़ी की माइन्यूट से माइन्यूट छान-बीन करो। इसके लिए चाहे उसकी दाढ़ी को हाथों से तलाशना पड़े या फिर अपनी आँखों को चौकन्ना रखते हुए मैग्निफाइंग लैंस से ही क्यों न देखना पड़े। चोर मिलेगा ही मिलेगा।

अब यदि आप यह सुझाने लगेंगे कि पौने दो लाख करोड़ के टू जी घोटाले के चोरों को पकड़ने के लिए सस्पैक्‍ट्स की दाढ़ी पर नहीं उनके बैंक अकाउण्ट्स या पर्सनल कम्प्यूटर्स पर हाथ डालना पड़ेगा तो सावधान हो जाइए। आप भटक रहे हैं। मैं तो बस यही इशारा कर रहा था कि कहीं आपकी अपनी भी दाढ़ी की तलाशी को निहायत ईमान-दार पब्लिक के हाथ न खुजलाने लगें। ठीक वैसे ही जैसे कि वे सिब्‍बल, मोइली या लालू जैसों के लिए छट-पटाने लगे हैं।

जहाँ तक आम पब्लिक की इस छट-पटाहट की बात है, यह तो देख ही रहे होंगे कि आवाम में ऐसे लोगों की गिनती नाकाफ़ी नहीं है जिनको मोदी और शिवराज द्वारा की जा रही कुछ ज्यादा ही बयान-बाजी तक में ‘दाल में किसी काले के होने’ जैसी गुंजाइश की बेचैनी परेशान करने लगी है। और तो और, खुद आरएसएस तक कन्फ़्यूज़्ड है कि रामदेव के साथ हो लें या फिर दूर खड़े होकर बाबा की मजमाई गड्‍डी से तुरुप के इक्के के बाहर आने का इन्तजार करें? लगता तो यही है कि आप दुनिया देखने कभी निकले ही नहीं! या, कभी-कभार निकले भी होंगे तो अन्ना हजारे की तर्ज पर खुद में ही मगन रहे होंगे। वरना, क्या देख नहीं लिया होता कि हाई-वे पर जगह-जगह पर यह लिखा मिलता है कि दुर्घटना से देर भली? नहीं समझे? चलिए, अपनी बात को दूसरी तरह से रखता हूँ।

अमर सिंह तो याद हैं ना? वही जो अपनी, मुलायम की और शान्ति भूषण की बात-चीत की विवादों से भरी-पूरी किसी सीडी की वजह से एक बार फिर से मीडिया के सबसे बड़े चहेते बन गये हैं। कहा तो यही जाता है कि दुनिया को उन्होंने बहुत बार देखा है। घूम-घूम कर। लेकिन न जाने क्यों, मुझे लगता है कि उनके बारे में ऐसा आँकलन किसी बड़ी गलत-फ़हमी से जुड़ा है। खुद उन्होंने न जाने कितनी बार इसको सिद्ध करने की कोशिश की है कि वे निरे कूप-मण्डूक हैं। कम से कम मुझे तो उनकी इस ईमानदारी पर पूरा यकीन है। यों, शंका भरी निगाहों से मत घूरिए। याद कीजिए — जिन्दगी के सारे सुनहरे साल उन्होंने मुलायम के कुँए में ही काट दिये थे। वह तो, कुँए में यक-ब-यक घुस आयी इन्टॉलरेबल सड़ाँध ने उन्हें उस कुँए को छोड़ने को कम्पेल कर दिया वरना, आखिरी साँस भी वहीं लेते। वह भी, पूरी मुलायम निष्‍ठा से। मेरा मतलब है कि अमर ने जल्दी कर दी। शायद इसलिए कि, दुनिया घूमते हुए वे या तो चौ-तरफा ग्लैमर में फँसे रहे या उससे बाहर निकले भी तो आत्म-मुग्ध रहे। इसीलिए, दुर्घटना से देर भली वाला स्लोगन पढ़ नहीं पाये। पढ़ रखा होता तो यह दिन नहीं देखने पड़ते। कम से कम, शान्ति भूषण के सीडी वाले एकदम ताजे सुप्रीम कोर्ट नोटिस से तो बचे रहते।

शान्ति भूषण से याद आया। ऐसा लगता है कि वे बुला-बुला कर अपनी दाढ़ी दिखा देने को ही सबसे उत्तम सुरक्षा मानते हैं। और, ऐसा मानें भी क्यों नहीं? पेशे से वकील हैं। वकालात का यह पेशा है ही ऐसा। खास कर, क्रिमिनल प्रैक्‍टिस की महारत। कहा जाता है कि अपराध करके एब्सकॉण्ड करने से किसी के भी खिलाफ़ एक पुख़्ता सबूत खड़ा हो जाता है। इसलिए अपराध चाहे जो करो, पहली फुरसत में सबूत को मिटाओ और फिर खुद को कानून के हाथों सरेण्डर कर दो। गोया, आप क्यों मेरी दाढ़ी टटोलोगे, मैं खुद ही दिखाये देता हूँ। इससे अपनी इन्नोसेन्स प्रूप करने का एक जबरदस्त आधार मिल जाता है। ‘खबर है’ कि सिविल सोसाइटी और केन्द्र के बीच हुए खासे डिस्प्यूटेड समझौते के बाद प्रारूप तय करने के लिए बनी संयुक्‍त कमेटी के इस ज्वाइण्ट सदर ने फरमाया है कि सरकार की नीयत बिल्कुल साफ है!

जानता हूँ, मुझसे पैदाइशी लाग-डाँट रखने वाले आपके कानों में कुछ न कुछ फूँकने के लिए कूदेंगे जरूर। इसलिए, अपनी इस ‘खबर है’ की सफाई एडवान्स में ही दिये देता हूँ — शान्ति भूषण ने यह सब खुद मुझसे कभी नहीं कहा। इसका पता तो मुझे बुद्धू बक्से से ही चला था। यह अलहदा बात है कि पूरी दुनिया में यह फैल चुका है कि भारत में खबरची अपने मन से भी खबर दे देते हैं। बिल्कुल सूत न कपास जुलाहों में लठा-लठी वाले लहजे में। फिर, अब तो तकनीक भी बहुत उन्नत हो चुकी है। इतनी कि, किसी के बिना कहे-बोले भी उसकी विडियो फुटेज रिलीज़ की जा सकती है। वह भी ऐसी पक्की कि खुद उसे भी लगने लगे जैसे वही बोल रहा हो! अब, जो कोई भी मेरी इस बात से एग्री नहीं करते हों उन्हें लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी के दूसरे ज्वाइण्ट सदर कपिल सिब्बल के बयान को तवज्जो देनी होगी। सोनिया को लिखी हजारे की चिट्‍ठी के पब्लिक होने के बाद इस सुप्रीम कोर्ट लायर ने दावा किया है कि उसने लोकपाल बिल की डफ्टिंग कमेटी की पहली बातचीत से बाहर निकल कर मीडिया से कोई बात नहीं की थी — न तो फ़ॉर्मल और ना इन-फ़ॉर्मल!

सुना है, अपने करे-कहे से मुकरने की ऐसी हरकत को ठेठ अंग्रेजी में ‘अबाउट टर्न’ और ठेठ हिन्दी में ‘बन्दर-कुलाटी’ कहते हैं। कहते तो यह भी हैं कि जब पट्‍ठा इतना माहिर हो तो उसके उस्ताद का क्या कहना? लेकिन, वह उस्ताद है यह प्रूव करने के लिए फ्रण्ट पर तो उस्ताद को ही आना होगा ना? सो, वे आ गये। लोक-तन्त्र के मन्दिर, आई मीन पार्लियामेण्ट, से लोगों के भरोसे का खासा मुलम्मा उधेड़ चुके थे। भरपाई जरूरी हो गयी थी। वरना, अपनी बारी में खुद भी कभी बगलें झाँकना पड़ सकती थीं। इसलिए एक शाम कहना पड़ गया कि संसद्‌ उनके बनाये प्रारूप को ठुकरा भी दे तो भी उसका आदेश सिर-आँखों पर! लेकिन, जब इस स्टेटमेण्ट से इण्टिग्रिटी पर ही बवाल मचा तो कुलाटी मार दी। कह दिया, १५ अगस्त तक बिल पारित नहीं हुआ तो फिर से आन्दोलन। आगे क्या होगा और कौन कितनी कुलाटी मारेगा, यह तो समय बतायेगा। लेकिन, एक बात तो अभी से पक्की है। सारे के सारे चोर अपनी-अपनी दाढ़ी की तलाशी खुद ही ऑफ़र करेंगे। वह भी आगे बढ़-बढ़ कर।

(१७ अप्रैल २०११)