मुग़ालती झुन-झुनों की पॉलिटिक्स

नूरा कुश्ती देख रहे आम आदमी का मुग़ालता है कि करुणानिधि कांग्रेसी झाँसे के शिकार हो रहे हैं, कांग्रेस डीएमके को ठेंगा दिखाएगी। जबकि, हो सकता है कि झुन-झुना कांग्रेस ने नहीं डीएमके ने थमाया हो।

बीते कुछ दिनों से तनाव में था। तनाव भी ऐसा-वैसा नहीं कि मिटता दिखे। मतलब, कन्फ़्यूजन्स के खासे डोलड्रम में था। डोलड्रम भी ऐसा कि उससे बाहर निकलने की कोशिशें जितनी ज्यादा कीं, वह उतना ही पुख़्ता और गहरा हो्ता गया।

दरअसल, महसूस कर रहा था कि खुश-फ़हमी में तो नाक तक डूबा हुआ हूँ लेकिन खुशी है कि मुझसे कोसों की दूरी बनाये हुए है। अपने अन्दर घुसे सैल्फ कन्फ्लिक्‍ट के इस जहन्नुम से बाहर निकलने के लिए जिस किसी परिचित से अपने हालात शेयर किये, पाया कि वह खुद भी सेम टु सेम हालातों का शिकार हुआ बैठा है! वह उतना ही सैल्फ कन्फ्लिक्टेड है, जितना मैं। वह कहते हैं ना — ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गया! मेरी हालत बिल्कुल वैसी ही हो गयी थी।

अब, आप पूछेगें जरूर कि ऐसी कौन सी ‘सु डो कू’ हल करने की, औकात से ऊपर की, कोशिश करने बैठा था कि मेरे अच्छे-भले दिमाग का कचूमर हो गया? लेकिन, क्योंकि यह खयाल मेरे भीतर बहुत गहरे बैठ चुका है कि हर एक मददगार खुद ही इसी संकट से गुजर रहा है, मैं बताऊँगा बिल्कुल नहीं। डरता हूँ कि कहीं मेरा खयाल पक्के भरोसे में बदल गया तो अपने बण्टाढार का नॉन बेलेबिल वारण्ट कटने में ज्यादा कसर नहीं रहेगी।

लेकिन, ये खुश-फ़हमी भी खुदा की अजब नियामत है। जिसकी गरदन का धड़ से जुदा किया जाना सेण्ट-परसेण्ट पक्का हो, वह भी इस खुश-फ़हमी को पाल कर रखता है कि कोई न कोई ऐसा फ़रिश्‍ता आकर उसे बचायेगा जरूर जिसके हुजूर में वह मुद्दत से परसादी चढ़ाता आया है! और, जब ऐसा हो नहीं पाता है तो सिचुएशनल फैक्‍ट्स के जानकार बलि चढ़ने वाले की ‘खुश-फ़हमी’ पर ‘मुग़ालते’ का लेबल चस्पा कर उससे कन्नी काट लेते हैं। थॉमस, राजा और कलमाडी के वाकये इतने ताजा-तरीन हैं कि मेरी बात को काटने वाला बमुश्‍किल ही मिलेगा।

वैसे, मेरे इन तीन उदाहरणों के नायक तो परफैक्‍ट नेगेटिविटी से जुड़े थे पर इधर एक वाकया पॉजिटिविटी वाला भी देखने में आया। हुआ कुछ यों कि खबर आयी कि सुप्रीम कोर्ट में कटी अपनी नाक पर ड्रेसिंग करती एमपी गवर्नमेण्ट की मशीनरी ने यूनियन कार्बाइड से हुए जहरीली गैस के रिसाव की जाँच के लिए बीते साल अगस्त में एक आयोग के गठन की लम्बी-चौड़ी घोषणा कर दी। आयोग की मियाद इस साल फरवरी तक की ही थी। आम आदमी की चिन्ता यह थी कि दिखावे की इस पॉलिटिक्स में नतीजा तो सिफर का सिफर ही रहेगा। बस, फोकट में करोड़ों के वारे-न्यारे हो जायेंगे। लेकिन, एक पाई भी खर्ची नहीं गयी। बराये मेहरबानी सरकारी मुलाजिमान, सारा का सारा पैसा बच गया! बस, इस आम आदमी ने एक खुश-फ़हमी पाल ली — सिस्टम में कुछ तो शर्मो-हया और ग़ैरत लौट रही है। लेकिन कुछ ही दिनों में उसका यह मुग़ालता टूट गया। बिना एक पाई खर्चे ही आयोग के कार्य-काल के पूरा हो जाने की खबर ने सिस्टम में हड़कम्प मचा दिया। बैक-डेट में कार्य-काल बढ़ा देने और बजट रिलीज़ कर देने की सुगबुगाहट सामने आ गयी।

बीते साल ही, आम आदमी ने खुश-फ़हमी पाल ली कि यह देश, पाँच साल पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा फाँसी कन्फर्म कर दिये जाने के बाद भी अभी तक उससे बच रहे, अफ़जल गुरु को जल्दी से जल्दी फाँसी के तख्ते पर चढ़ता देख सकेगा। लेकिन, थैंक्स टु डर्टी इण्डियन पॉलिटिक्स, लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही उसको समझ में आ गया कि यह तो उसका कोरा मुग़ालता ही था — यूपीए सरकार अभी भी इस बात का अध्ययन ही कर रही है कि पाकिस्तान के इशारे पर देश की संसद्‌ पर हुए हमले के मास्टर माइण्ड की ‘दया-याचिका’ को प्रेसीडेण्ट को अपनी अनुशंसा के साथ वापस भेज दिया जाना चाहिए या नहीं? जाहिर है, यूपीए सरकार देश के आम आदमी के एक और बड़े मुग़ालते को तोड़ना चाह रही है। या क्या पता, खुद सरकार ने ही यह मुग़ालता पाल लिया हो कि ऐसा करने से वह केन्द्र में लगातार तीसरी पारी भी खेल पाए? एक-दो खिलाड़ी बदल कर!

अपनी इस बात से मुझे झुन-झुना याद आ गया। बचपन की बात है। किसी खिलौने के लिए मचल रहा था। बुजुर्ग ने पहले तो जितना सम्‍भव हुआ टाला। लेकिन जब मैं उस खिलौने के लिए अड़ा ही रहा तो घर में पड़ा एक बेकार सा झुन-झुना पकड़ा दिया और कहा — अभी थोड़ी देर तो इसी से खेलो। तुम्हारा वाला खिलौना बस लेने ही जा रहा हूँ, तुरन्‍त लेकर आता हूँ। वह दिन था कि आज, मुग़ालते के उस झुन-झुने के अलावा और कुछ मेरे हाथ कभी नहीं लगा!

मुग़ालती झुन-झुनों के पॉलिटिकल एपीसोड्स की एक बात अनोखी है। कई दफ़े आदमी को मुग़ालता हो जाता है कि कोई बड़ा खिलाड़ी मुग़ालते में है। ऐसे में, आदमी को खुश-फ़हमी रहती है कि दूसरे का पाला यह मुग़ालता जल्दी ही भर-भरायेगा और वह औंधे मुँह गिरेगा। और तब, आम आदमी की फ़तह होगी। लेकिन उसे दिखता ही नहीं है कि वह ‘बड़ा खिलाड़ी’ सच में बहुत ‘बड़ा’ है। याने, मुग़ालता उसने नहीं पाला है, वह दूसरे को मुग़ालते पालने के मौके दे रहा है। सही वक़्‍त के आने पर वह सीने से सटाये अपने पत्ते खोलेगा। बात जरा ज्यादा पेचीदा हो गयी लगती है। चलिए, खुलासा किये देता हूँ।

मैं डीएमके और कांग्रेस के बीच चल रही आँख-मिचौली की तरफ इशारा कर रहा हूँ। जब से बरतन खड़के हैं, कांग्रेस यही इशारा कर रही है कि वह करुणा को प्रोटेक्‍ट करती रहेगी। करुणा के भण्डार भी ऐसा शो करते मिलते हैं कि वह कांग्रेस की विवशता को समझते हैं इसलिए ऐसा कोई ड्रास्टिक स्टेप नहीं उठायेंगे जिससे यूपीए को एफेक्‍चुअली कोई नुकसान हो। और, दोनों की इस नूरा कुश्ती को देख-समझ रहे आम आदमी की हालत यह है कि उसने मुग़ालता पाला हुआ है कि करुणानिधि कांग्रेसी झाँसे के शिकार होते जा रहे हैं। कांग्रेस जल्दी ही डीएमके को ठेंगा दिखाएगी। जबकि, मुग़ालतों का इतिहास है कि अलार्म पर अलार्म दिये जा रहा है — झुन-झुना कांग्रेस ने नहीं डीएमके ने थमाया है।

(२४ अप्रैल २०११)