लोकपाल पर बवाल : निरर्थकता पर सार्थक सवाल

मूल सवाल पुराना है। और इस नाते, बवाल भी उतना ही पुराना है। केवल परिस्थितियाँ बदल गयी हैं। नैतिक निष्‍ठा और आधारभूत ईमानदारी हर हालत में पा लेने को लेकर इतने लोग सड़क पर आ गये कि लगा जैसे पूरा का पूरा देश ही सैलाब बनकर सड़क पर उतर आया हो। परिणाम भी सामने है। लोक-तन्त्र के भारतीय इतिहास में राजनेता और प्रशासन इससे पहले इतने दबाव में कभी नहीं आये जितने कि वे आज आ चुके हैं।
नैतिकता और आधारभूत ईमानदारी के तकाजे का कुछ न कुछ दबाव हमेशा से ही रहा है। यहाँ तक कि पराधीनता के समय भी। कहा तो यहाँ तक भी जा सकता है कि यदि यह जन-दबाव और शासन-तन्त्र में इसकी उपेक्षा का भाव अस्तित्व में नहीं होता तो पराधीनता से मुक्‍ति पा लेना तो बहुत दूर की बात है, उसकी आवश्यकता की हल्की सी चिन्गारी भी नहीं फूटती। लेकिन आज परिस्थितियाँ इस अर्थ में आमूल-चूल बदली हुई हैं कि बीते दिनों नैतिक निष्‍ठा और आधारभूत ईमानदारी हर हालत में पा लेने को लेकर इतने लोग सड़क पर आ गये थे कि लगा जैसे पूरा का पूरा देश ही सैलाब बनकर सड़क पर उतर आया हो।

जाहिर है, मूल सवाल पुराना है। और इस नाते, बवाल भी उतना ही पुराना। केवल परिस्थितियाँ बदल गयी हैं। और इस बदलाव का ऐसा परिणाम सामने आया है जो अपने आप में सुखद है। लोक-तन्त्र के भारतीय इतिहास में राजनेता और प्रशासन इससे पहले इतने दबाव में कभी नहीं आये जितने कि वे आज आ चुके हैं।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि देशी संविधान और देशी शासन-तन्त्र के बाद भी भारतीय लोक-तन्त्र में ज्वलन्त ही बना रहा वह सवाल आखिर है क्या? तो, एकदम सीधा सा वह शाश्‍वत सवाल यह है कि कागजों पर प्रभावी दिखाई पड़ने वाले इतने सारे कानूनों के बाद भी क्या ऐसे किसी सर्वथा नये कानून की आवश्यकता हमेशा ही बची रहती है जो आम नागरिक को चैन की नींद सुला सके? कानून-विदों, उच्च-पदस्थ अधिकारियों और राज-नेताओं की टोली इसका जवाब सदा ही न केवल हाँ में देती आयी है बल्कि समय-समय पर नये से नये नियम-कानून गढ़ती और उन्हें लागू भी करती आयी है। लेकिन हर बार निर्णायक निष्‍कर्ष यही निकला है कि मूल सवाल का दुष्‍चक्र तोड़े नहीं टूट रहा है।

सारा बवाल इसी बिन्दु पर है कि बनाये गये हर नये कायदे-कानून में ऐसा सुराख छोड़ा ही जाता है जो किसी भी नये कायदे-कानून के अपने ही अन्तस्तल में इस मूल सवाल को पालते-पोसते रहने का चरित्र कायम रखता है। संवैधानिक प्रतिष्‍ठा-सम्पन्न लोकपाल की स्थापना की माँग को लेकर हुए आमरण अनशन और फिर ‘सरकार’ द्वारा लोकपाल बिल के प्रारूप पर विचार के लिए आन्दोलन-कारियों को शामिल कर समिति के गठन को लेकर बनी सहमति के तुरन्त बाद छिड़ी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि भ्रष्‍टाचार के लिए मुख्य जिम्मेदार आखिर है कौन? लोकपाल की नियुक्‍ति के विरोधियों का कहना था कि स्वार्थ-जनित चरित्र-स्खलन कोई अनोखी बात नहीं है। समाज का यह दु:ख-दायी पक्ष सभ्यता के विकास की कहानी जितना ही पुराना है — पटवारी, जो सबसे निचले स्तर का सरकारी प्रतिनिधि है, भारतीय लोक-तान्त्रिक भ्रष्‍टाचार का सबसे पुराना प्रतीक है। ऐसी उथली बहस के बीच भी जिसे नकारा नहीं जा सका वह तथ्य यह था कि प्रशासन-तन्त्र के कल-पुर्जों के बीच होती विस्तृत व्याप्‍ति के बाद भी भ्रष्‍टाचार उतना घातक कभी नहीं हुआ जितना वह तब हो गया जब राज-नेताओं की जमात भी इसमें लिप्‍त हो गयी। इसके बाद तो जैसे देश-घाती यह बीमारी लाइलाज हो गयी।

एक स्वतन्त्र आँकलन के अनुसार २००५-०६ से लेकर २०१०-११ के बजट तक केवल केन्द्र सरकार ने ही कार्पोरेट जगत का ३,७४,९३७ करोड़ रुपये का आय कर माफ़ किया है। २००५-०६ के बजट में केवल ३४,६१८ करोड़ ही माफ़ किये गये थे जबकि २०११ के बजट में यह माफ़ी बढ़कर ८८,२६३ करोड़ की हो गयी है। सरल शब्दों में, देश के सम्भावित वैध राजस्व में से केन्द्र प्रतिदिन २४० करोड़ को ऐसे व्यक्‍तियों अथवा घरानों के लिए माफ़ कर रहा है जो आम जन के बीच और व्यपक जन-हित के लिए खर्ची जा सकने वाली अरबों-खरबों की इस राशि को केवल अपने निजी ऐशो-आराम में उड़ा रहे हैं। वह भी, अपने जैसे ही विदेशी व्यक्‍तियों और संस्थानों या फिर सरकारों को उपकृत करते हुए।

भ्रष्‍टाचार-निवारण को लेकर आम नागरिक की असहायता और उसके कारण अपने चरम पर पहुँची आज की बेचैनी का कारण भी यही है कि लेकिन-किन्तु-परन्तु के छलावे में देश के कुछ अत्यन्त प्रभावशील व्यक्‍तियों की निजी प्रतिष्‍ठा को प्रत्येक कानून की पहुँच से ऊपर स्थापित किया जाता रहा है। निश्‍चित रूप से यह इसलिए किया जाता रहा है कि कानून-निर्माण और कानून-पारण के विशेषाधिकार को येन-केन-प्रकारेण कब्जाए बैठा यह श्रेष्‍ठि-वर्ग अपने दुर्गुणों के उजागर होने से उत्पन्न हुई किसी सम्भावित आशंका से मुक्‍त बने रहने के प्रति अतिरिक्‍त रूप से न केवल चौकन्ना है बल्कि उससे निपटने के अग्रिम उपाय बनाये रखने के प्रति सावधान भी है।

दुनियादार व्यवहारिक समझ कहती है कि लगातार स्खलित होती राजनीति, असीम विस्तार को आतुर आर्थिक दुराचार और भ्रष्‍टाचार के गर्त में समाते प्रशासन-तन्त्र के बीच बनी पर्याप्‍त समझ के बाद गढ़े गये इस सदाबहार दुष्‍चक्र को तोड़ना कार्य-पालिका और विधायिका के बूते से बाहर हो चला है। और अब तो, खुद न्याय-पालिका की चार-दीवारी के भीतर से भी ऐसे सुर उठने शुरू हो गये हैं जो इस सम्मानित आधारभूत स्तम्भ के बारे में चिन्तित होने के प्रति आगाह कर रहे हैं। ऐसे में लोक-तन्त्र के इन तीनों स्तम्भों को व्यक्‍ति अथवा संस्था-निरपेक्ष कठोर कसौटी पर निरन्तर कसते रहना और फिर इस प्रक्रिया में पकड़ी गयी किसी भी अशुद्धि से बिना कोई विलम्ब किये त्वरित मुक्‍ति भी पा लेना ही एकमात्र विकल्प बच रहा है।

समस्या यह है कि देश में विकसित हुई दूषित-क्षुद्र राजनीति के प्रभाव में आज व्यापक जन-मानस इस तथ्य को समझता तो अच्छी तरह से है लेकिन लगभग प्रत्येक भारतीय नागरिक खुद को हर दूसरे नागरिक से अलग महज एक व्यक्‍ति के रूप में ही देखने का भी आदी हो चुका है। अतीत गवाह है कि इक्का-दुक्का उदाहरणों की अनदेखी कर दें तो औसतन यही समझ में आता है कि जब कभी भी कोई बड़ी एक-जुटता हुई दिखी है तो वह व्यक्‍ति अथवा समूह केन्द्रित रही है, नागरिक केन्द्रित तो कतई नहीं। गहरी समीक्षा से इसके पीछे निहित किसी न किसी स्वार्थ-विशेष की छाप भी पहचानी जा सकती है। लोकपाल को लेकर मचे ताजे तूल को इसी प्रकाश में देखना और फिर इसे उस व्यक्‍ति अथवा संस्था-निरपेक्ष कठोर कसौटी पर कसना होगा जिसका उल्लेख यहाँ पहले किया जा चुका है। और, ऐसा करते समय बिखरे पड़े, असम्बद्ध माने जाते, उन ढेरों सूत्रों के बीच मौजूद एक-रूपता की उस कड़ी की तलाश करनी होगी जो सरसरी नजर से छिपी हुई है।

उदाहरण के लिए, भाजपा द्वारा हजारे के अनशन को मिले आरम्भिक समर्थन किन्तु, पीएम से उनकी बनी समझ के बाद, सामने आयी आडवानी की ब्लॉगी हुंकार के बीच के अचम्भित नहीं करने वाले विरोधाभास की ठीक-ठीक समझ। अथवा अमर, मुलायम और शान्ति भूषण के बीच कथित रूप से हुई एक पुरानी बातचीत की सीडी के एक राष्‍ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के माध्यम से शान्ति भूषण को सुनाये जाने की ‘पीत-पत्रकरिता’ से ओत-प्रोत बतायी गयी अप्रत्याशित सी दिखती घटना की खबर के पीछे के किसी सुनियोजन की सम्भावना की खोज। या फिर, जन्तर-मन्तर में प्रारम्भ हुए आमरण अनशन के प्रति मनमोहन की रहस्यमयी निश्‍चिन्ता के बीच सोनिया-राहुल में व्यापी अकुलाहट-घबराहट के लक्षणों के महीन संकेतों की बारीक समीक्षा। और हाँ, खास तौर से लोकपाल की यथार्थ भूमिका को लेकर स्वयं आन्दोलन-कारियों के अपने सन्देहास्पद व्यवहारों की खोज-पूर्ण पड़ताल का भी कुछ कम महत्व नहीं है।

पहले २७ फरवरी की रामदेव की रैली में शामिल होकर और फिर प्रधान मन्त्री द्वारा भेजे न्यौते पर उनसे हुई रहस्यमयी बातचीत से वापस लौटकर हजारे ने लोकपाल बिल को लेकर अचानक ही जो आक्रामक रुख अपनाया वह सहज बुद्धि की समझ से कतई परे है। जहाँ एक तरफ न तो हजारे ने और न ही मनमोहन ने दोनों के बीच बन्द कमरे में पकी उस खिचड़ी का कोई ब्यौरा सार्वजनिक किया है वहीं दूसरी तरफ आन्दोलन की शुरूआत से ही ऐसा सोचने वालों की संख्या पर्याप्‍त रही है कि हजारे की चौंकने वाली अतिरिक्‍त सक्रियता के पीछे व्यापक जन-हित का समर्पित भाव नहीं बल्कि पीएम से हुई उनकी कोई गुप्‍त सौदे-बाजी ही अपनी भूमिका निभा रही है। फिर, जिन परिस्थितियों में आमरण अनशन को तोड़ा गया और, महज दो पक्षकारों की तर्ज पर, ‘अन्ना’ तथा ‘सरकार’ के प्रतिनिधियों के बीच १६ अप्रैल को हुई औपचारिक बैठक में ‘अन्ना-पक्ष’ द्वारा अचम्भित करता नरम रुख अपनाया गया उस सबकी सार्वजनिक हुई तस्वीर ने नूरा कुश्‍ती की किसी सम्भावना को सिरे से नकारने के स्थान पर उसे परिपुष्‍ट ही किया है।

टू जी घोटाले के महाभ्रष्‍टाचार की गहरी छानबीन के लिए विपक्षियों की जेपीसी के गठन की माँग को सिरे से नकारने के लिए एक-जुट हुए सोनिया और मनमोहन ने जितनी बेरहमी से संसद्‌ की कर्यवाही की दो महीनों तक बलि चढ़ाई थी उसे देखते हुए सिविल सोसाइटी की लोकपाल बिल की माँग को ‘चर्चा के लिए’ स्वीकार कर लेना और मात्र ऐसे आश्‍वासन पर भरोसा करते हुए हजारे द्वारा भी अपना आमरण अनशन केवल चार दिनों के भीतर समाप्‍त कर देना, तथा दोनों ही पक्षों द्वारा इसे ‘जनता की जीत’ भी ठहरा दिया जाना भी, किसी भी समझदार को अचम्भित करेगा। लेकिन अचम्भित कर देने वाले इस घटना-क्रम की छान-बीन एक बेहद छिपी हुई राजनैतिक बेचैनी का भी बयान करेगी।

हजारे के आमरण अनशन पर बैठने के बाद बहुत थोड़े से समय में देश की युवा पीढ़ी से जो खास वर्ग सड़कों पर उतरा वह अनपढ़-बेरोजगारों का निरीह जमावड़ा नहीं था। इसमें देश के ऐसे युवा थे जो या तो निजी व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानों में पर्याप्‍त ऊँचे सेवा-शुल्क के साथ नौकरी-शुदा थे या फिर अपनी निजी उद्यमिता के बल-बूते उन्नत सैक्‍टरों में अपने-अपने व्यवसायों की ठोस जमीन बना चुके थे। इस वर्ग ने जितनी तेजी और उत्साह से, स्व-प्रेरित होते हुए, हजारे को सम्‍बल दिया उसने सोनिया-सुत राहुल को पूरे देश में सबसे अधिक बेचैन किया। बेचैनी का कारण बड़ा साफ है। सत्ता-शीर्ष पर अपना सिंहासन सुनिश्‍चित करने के लिए राहुल को जिस एक वर्ग की सबसे अधिक आवश्यकता है वह यही है। कांग्रेस की अपरिहार्य हो चुकी नेत्री द्वारा खुलकर प्रायोजित किये जाने और सालों की तरह-तरह की माया के बाद भी उसका यह बेटा राहुल कोशिश करके भी इस युवा-वर्ग को अपने प्रति समर्पित नहीं करा पाया है। लोकपाल बिल के बहाने ही सही, उसका इस तरह से अपने या अपने बेटे से छिटक कर अन्यत्र एक-जुट होना सोनिया के बुढ़ापे के सपनों को चूर-चूर करने वाला था। माँ-बेटे के लिए आवश्यक हो गया था कि आन्दोलन की ऐसी घातक सुनामी लहर को यथा-शीघ्र कुण्ठित किया जाए।

सरल शब्दों में, इसका तात्पर्य यही है कि हजारे-आन्दोलन प्रायोजित तो सरकार, अर्थात्‌ मनमोहन, द्वारा हुआ लेकिन अब उसे सोनिया और राहुल की युति के सामने मनमोहन की निरीहता का ग्रहण लग गया है।

अपने-अपने कारणों से अन्ना को बापू की महिमा से मण्डित करने को आतुर प्रभावशाली लोगों को इस उल्लेख से बेचैनी जरूर होगी लेकिन यह अकाट्य सचाई है कि हजारे ने अनशन की शुरूआत से ठीक पहले यह वक्‍तव्य दिया था कि देश को अब गांधी नहीं, शिवाजी के रास्ते पर चलना होगा।

यही नहीं, अपने अनशन की समाप्‍ति के तुरन्त बाद हजारे ने बड़े अप्रत्याशित ढंग से जो कुछ कहा था उसका सार है कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ़ (उनके द्वारा) लड़ी जाने वाली लड़ाई सभी धर्मों से ऊपर है। देश की विद्यमान परिस्थितियों के प्रति जागरूक हर नागरिक, भोले से नजर आते, इस कथन के पीछे छिपी उस क्लिष्‍टता को बखूबी समझ रहा है कि हजारे कैसे अपने को घेरे बैठी चुनिन्दा भीड़ के बीच से ही चुने अपने नुमाइन्दों को देश के आम नागरिक का सटीक और संतुलित प्रतिनिधि घोषित करने से उठे बवण्डर की लचर सी सफाई देने की कोशिश में जुटे हैं? अपनी सफाई के लिए चुना यह विकल्प उन्हें शायद इसलिए पुसाया है कि उन्हें लगता है कि देश की आज की सबसे अधिक बिकाऊ ‘धर्म-निरपेक्षता’ की इस प्रायोजित छवि के आसरे ही वे अपने से दूरी बनाये बैठे बहुतेरे राज-नेताओं को आकर्षित कर पायेंगे। किन्तु इस बेहद लचर दलील को देते हुए हजारे यह भुला बैठे कि इस स्थिति में उन्हें इस लोक-लांछना की भी सफाई देनी होगी कि ताजे अनशन पर बैठने से ठीक पहले उन्होंने शिवाजी का जो उल्लेख किया था उसके पीछे मराठी मानुस का समर्थन जुटाने के उनके निहित स्वार्थ की कोई भूमिका बिल्कुल भी नहीं थी।

हजारे अपने आप में भले ही कितने भी आश्‍वस्त हों कि समय की इस अटपटी तराजू पर वे खुद को साबित कर पायेंगे लेकिन भ्रष्‍टाचार के खिलाफ़ खड़े हुए होने की उनकी छवि से प्रभावित भोले-भाले आम भारतीय को वे सार्वजनिक हो चुकी इस सचाई की क्या सफाई देंगे कि अपनी कथित लड़ाई की धार को परवान चढ़ने से पहले, खुद उन्होंने ही, भोथरा कर दिया है? रही-सही कसर उनके इस सबसे ताजे कथन ने पूरी कर दी है कि वे शान्ति भूषण की गारण्टी कैसे दे सकते हैं? जैसे यही पर्याप्‍त न हुआ हो, लोकपाल बिल के प्रारूप पर विचार के लिए गठित होने वाले दस सदस्यीय दल में सरकार की ओर से नामित किये जा सकने वाले सम्भावित प्रतिनिधियों में से अनेक पर, उनके आचरण के आधार पर, आपत्ति उठाने वाले हजारे ने सह अध्यक्ष की महती भूमिका के लिए अपनी ओर से नामित किये शान्ति भूषण की नेक-नीयती पर उठायी जा रही शंकालु उँगलियों पर यह कहते हुए धूल डालने की कोशिश की कि उनसे इनका परिचय ताजा-ताजा है — मात्र लोकपाल बिल के जन-प्रारूप पर शुरू हुई बातचीत जितना पुराना! इसके पहले तो वे इस प्रसिद्ध विधि-वेत्ता को जानते भी नहीं थे।

समझ से एकदम परे है कि करोड़ों भारतीयों द्वारा आनन-फानन में व्यक्‍त भरोसे के कन्धे पर सवार होकर अचानक ही राष्‍ट्रीय क्षितिज के इस शिखर पर खड़ा हुआ एक व्यक्‍ति स्वयं अपने अलावा देश के एक भी नागरिक की नेकनीयती पर देश-हित का दाँव खेलने को तैयार नहीं हैं। वह ही तब, जब महाराष्‍ट्र सरकार द्वारा गठित जस्टिस पीवी सावन्त कमेटी की रपट में दर्ज हुए इस निष्‍कर्ष को स्वयं हजारे भी कभी कोई चुनौती नहीं दे पाये कि उनके जन्म-दिन को मनाने के नाम पर उनकी अपनी ही संस्था में खर्च की गयी बड़ी राशि में आर्थिक अनियमितता हुई थी। तब हजारे ने केवल यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया था कि यदि लोग उनका जन्म-दिन मनाना चाहते हैं तो वे कर भी क्या सकते हैं?

खुद को एक बड़े सामाजिक आन्दोलन के केन्द्रक की तर्ज पर प्रस्तुत करते हजारे का यह ऐसा नकारात्मक पक्ष है जो इस बात की सफाई देता है कि छिट-पुट क्षेत्रीय गतिविधियों से आगे इस व्यक्‍ति की संगठनात्मक भूमिका अभी तक निखर कर सामने क्यों नहीं आ पायी थी? लाख टके का यह सवाल अचरज में तब बदल जाता है जब लोग पाते हैं कि ताजे दौर में हजारे ने, ले-देकर, जब भी किसी दूसरे व्यक्‍ति की नीयत की सार्वजनिक तरफदारी की है तो वह या तो मनमोहन सिंह रहा है या फिर राहुल गांधी! लेकिन इसी में हजारे से जुड़े इस मुद्दे के सवाल का जवाब भी छिपा है। बड़े सुरक्षित ढंग से कहा जा सकता है कि किशन बाबूराव हजारे किसी दूसरे की बनाई राह पर चलकर अपना भविष्य तलाशने वाले ऐसे व्यक्‍ति का नाम है जो शासन का कृपा-पात्र रहकर ही कुछ कर पाया है।

वाटर-शेड डेवलपमेण्ट के लिए राजीव द्वारा प्रशंसा-पत्र दिये जाने के जिस उदाहरण को हजारे की प्रशंसा-चालीसा का मुख्य स्‍त्रोत बताकर बहु-प्रचारित किया जा रहा है उसके दो अलिखित सूक्‍त भी हैं। पहला यह कि हजारे ने इस दिशा में प्रशंसनीय उपलब्धि जरूर पायी है लेकिन वे न तो इसके जनक रहे हैं और ना ही इकलौते कार्यकर्त्ता। वाटर-शेड डेवलपमेण्ट का समूचा उद्यम भारतीय समाज का पर्याप्‍त पुराना सोच है। इसी पहले सूक्‍त में दूसरे सूक्‍त का बीज मौजूद है। महाराष्‍ट्र सरकार ने १९८० के दशक में राज्य के प्रत्येक ब्लॉक में एक आदर्श ग्राम विकसित करने की योजना बनायी और उसके लिए एनजीओ का सहयोग लेने का निर्णय हुआ। तब हजारे राज्य सरकार के साथ हो गये। सरकारों के ‘साथ’ की हजारे की वह साध आज भी जस की तस है। जन्तर-मन्तर के आमरण अनशन की समाप्‍ति के उपरान्त उनके द्वारा एक के बाद एक दिये जा रहे वक्‍तव्यों का निचोड़ भी यही है कि वे सरकारी, या कहें कि सत्तासीन राज-नेताओं के, सौजन्य के लिए भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ी जाने वाली जनता की इस लड़ाई के प्राण-तत्व तक को न्यौछावर करने को तत्‍पर हैं।

जहाँ तक राज-नेता प्रणीत भ्रष्‍टाचार के विरोध में आवाज बुलन्द करने की बात है, महाराष्‍ट्र में इसकी पक्की नींव मुम्बई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के तत्‍कालीन आयुक्‍त खैरनार ने तब रखी थी १९९४ में उन्होंने माफ़िया सरगना दाउद की बेनामी सम्पत्तियों पर सरकारी हाथ डाला था। ऐसा माना जा रहा था कि पवार और दाउद के बीच बहुत गहरा परस्पर तालमेल है। खैरनार पर पवार की नाराजी की गिरी गाज ने इसे पुष्‍ट भी किया। उस समय एक दौर ऐसा भी आया कि खैरनार के समर्थन में पूरी की पूरी मुम्बई खड़ी हो गयी। पूरा महानगर सड़क पर उतर आया। तब लगा जैसे मुम्बई बिल्कुल ठप्प हो गयी थी। लगभग वैसे ही जैसे जन्तर-मन्तर के अनशन के समर्थन में पूरे देश में होता देखा गया।

जहाँ तक खैरनार की बात है, उन्होंने कोई गलतफ़हमी नहीं पाली। लेकिन लगता है जैसे हजारे अपने जीवन के सबसे बड़े संघर्ष की कथित सफलता के उत्साह में मोह-ग्रस्त होकर मान बैठे हैं कि लोग ‘उनकी’ लड़ाई में शामिल हो रहे हैं। वे समझ नहीं रहे हैं कि वास्तव में लड़ाई तो उस आम भारतीय की थी जिसने आशा की एक किरण को देख उन्हें निर्द्वन्द्व छोड़ दिया था। भ्रम-वश उपजे ऐसे मोह का अन्त बड़ा निराशा-जनक होता है। निराशा हजारे जैसों को नहीं, आम भोले नागरिक को होती है। क्योंकि जब तक उसे सचाई समझ में आये, पर्याप्‍त से अधिक देर हो चुकी होती है।

स्वतन्त्रता के बाद के इतने सालों का प्राथमिक पाठ यही है कि यदि लोकपाल के दायरे से एक भी भारतीय नागरिक बाहर छोड़ा जाता है तो यह स्थिति प्राप्य को तिलांजलि दे देने जैसी ही निन्दनीय है। फिर कारण चाहे जो भी हो। जैसे यही कि राष्‍ट्रपति को लोकपाल से निरापदता दे देने से सदन में पारित हुए बिल को उनकी आवश्यक सहमति मिल पाने की सुविधा होगी। या फिर, सर्वोच्च अदालत के मुखिया को इसके दायरे से बाहर कर देने से बिल को मिलने वाली सम्भावित कानूनी चुनौती उतनी कठिन नहीं रहेगी जितनी अन्यथा होगी। एक भी व्यक्‍ति को, फिर वह चाहे जो हो, लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की वकालत करने वाले इस बड़े सूक्ष्म तत्व की अनदेखी करने की त्रुटि कर रहे हैं कि यही व्यक्‍ति अपने को प्राप्‍त इस निरापदता का दुरुपयोग करते हुए अपनी निजी रुचि के उन तमाम व्यक्‍तियों को संरक्षित कर सकेगा जो अपने से निचले स्तर के भ्रष्‍टाचारियों को संरक्षण देने का निहित-स्वार्थी कृत्य कर रहे होंगे। स्वयं देश की सर्वोच्च अदालत के न्याय-प्रमुख ने यह कहते हुए ऐसे व्यक्‍तियों की नैतिक हालत बड़ी असहज कर दी है कि भ्रष्‍ट जजों को राजनैतिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

ताजे सन्देश तो यह भी हैं कि ‘इतिहास को हर कीमत पर गढ़ ही देने’ की व्याकुलता में हजारे-चौकड़ी सरकार के सम्मुख इससे भी आगे की छूट देने को नत-मस्तक हो चुकी है। और, यह तो निहायत शुरूआत भर है जिसका संकेत है कि बातचीत के अगले दौरों में हजारे की सिविल सोसाइटी और भी बहुत कुछ माफ करने को तैयार रहेगी। गहरे विवादों के उबाल के बीच जहाँ एक ओर शान्ति भूषण ने दावा किय है कि सरकार की नीयत साफ है वहीं दूसरी ओर देश की सर्वोच्च अदालत के न्याय-प्रमुख ने यह कहते हुए ऐसे तमाम व्यक्‍तियों की नैतिक हालत बड़ी असहज कर दी है कि भ्रष्‍ट जजों को राजनैतिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति कपाड़िया ने बिना किसी लाग-लपेट किये यह भी जोड़ा है कि न्याय-पालिका की स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए। सरल शब्दों में, काले कोट में चरित्र स्वच्छ ही होना चाहिए।

संक्षेप यही कि अपने प्रस्तावित दुर्बल स्वरूप में, निरर्थक से होते लोकपाल के लिए, एक और संवैधानिक पद/ प्रतिष्‍ठा स्थापित करने का क्या औचित्य है? एक सर्वथा आदर्श स्थिति के लिए होना तो यही चाहिए कि स्वयं लोकपाल भी अपने संवैधानिक दायित्व के निष्‍पादन की भूमिका के दायरे में प्राकृतिक रूप से शामिल हो चुका मान लिया जाए।

इस सोच के विरोध में जिन्हें भी कुछ कहना हो, वे कुछ भी कहने से पहले आज के उस सबसे ताजे घटना-क्रम पर अपनी निष्‍पक्ष निगाह, कम से कम, एक बार अवश्य दौड़ा लें जिसका सार यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बाद कर-चोरी और काले धन के मामले में देश के सबसे बड़े घोटाले-बाज के रूप में सामने आये हसन अली मामले की जाँच की कड़ी के रूप में प्रवर्तन मन्त्रालय की पूछ-ताछ के दायरे में घिर चुके पाण्डिचेरी के उप राज्यपाल इकबाल सिंह के बारे में केवल उनके अपने द्वारा ही नहीं बल्कि तमाम विधि-वेत्ताओं द्वारा भी दावा किया जा रहा है कि अपने वर्तमान पद पर रहते हुए उनसे किसी भी प्रकार की पूछ-ताछ नहीं की जा सकती है। संदिग्ध के रूप में इकबाल सिंह के नाम के इस तरह सामने आ जाने के बाद भी अभी तक इसी बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि राष्‍ट्रपति द्वारा उनकी बलात्‌ पद-च्युति कब की जायेगी? बल्कि, ताजे घटना-क्रम के प्रकाश में, अधिक गहरा सवाल तो अभी यही खड़ा हो गया है कि व्यवहारत: अपरिहार्य हो चुकी यह बलात्‌ पद-च्युति विधानत: कभी की भी जायेगी या नहीं? कहा यह भी जा रहा है कि संविधान के वर्तमान स्वरूप में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि देश के राष्‍ट्रपति को अपने इस संवैधानिक दायित्व के निर्वाह हेतु वैधानिक रूप से विवश किया जा सकता हो।

लोकपाल की नियुक्‍ति इस और ऐसी ही समस्त वैधानिक विकल्प-हीनताओं से मुक्‍ति पाने के लिए की जानी चाहिए। अन्यथा लोकपाल की नियुक्‍ति में इससे किंचित्‌-मात्र कम ध्येय समूची जन-लड़ाई को निरर्थकता का एक और लबादा उढ़ा देने जितना ही आत्म-हन्ता होगा। आत्म-हन्ता इसलिए कि भ्रष्‍ट राज-नेता, तमाम दलगत टकरावों से ऊपर उठते हुए, लोकपाल बिल के रूप में किसी अध-कचरे तथा प्रभाव-हीन प्रारूप पर संसद की मुहर लगवा कर आगामी लम्बे समय के लिए ऐसी किसी सार्थक माँग के उठाये जाने तक की सम्भावना का गला घोंट देंगे।

(२० अप्रैल २०११)