विवादों के घेरे में भारत-रत्‍न

कुल दो अवसर ऐसे भी आये हैं जब इस सम्मान के लिए नामित किये जाने के बाद सम्मानित किये जाने के निश्‍चय को वापिस लिया गया।

२ जनवरी १९५४ को राष्‍ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद द्वारा जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्‍न’ की स्थापना की गयी थी तब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सी वी रमन तथा सर्वपल्ली राधाकृष्‍णन इससे सम्मानित होने वाले सबसे पहले व्यक्‍ति थे। १९५५ में तत्कालीन प्रधान मन्त्री जवाहरलाल नेहरू के साथ ही विश्‍वेश्‍वरैया और भगवानदास भी भारत-रत्‍न से सम्मानित होने वाले अगले व्यक्‍ति थे।

स्थापना के समय निश्‍चय हुआ था कि सम्मानित किये जाने नागरिक को यह सम्मान उसके जीवन-काल में ही दिया जायेगा। समझा जाता है कि केवल इसी एक कारण से महात्मा गांधी को यह सम्मान नहीं मिला। यद्यपि यह निर्णय १९५५ में ही ले लिया गया था कि मृ्त्यु-पर्यन्त भी किसी को इस सम्मान से सम्मानित किया जा सकता है किन्तु १९६६ में लाल बहादुर शास्‍त्री ऐसे पहले व्यक्‍ति हुए जिन्हें मृत्यु-पर्यन्‍त भारत-रत्‍न घोषित किया गया। मोहनदास करमचन्द गांधी को अभी भी इस सर्वोच्च नागरिक प्रतिष्‍ठा से सम्मानित होने वालों की सूची से बाहर रखा गया है।

खान अब्दुल गफ्फार खान के रूप में १९८७ में पहली बार किसी विदेशी नागरिक को इस सम्मान से सम्मानित किया गया। अभी तक सम्मानित होने वाले कुल ४१ व्यक्‍तियों में नेल्सन मण्डेला ऐसे दूसरे विदेशी नागरिक हैं जिन्हें १९९० में यह सम्मान दिया गया है।

यद्यपि ऐसी कोई परम्परा नहीं है कि किसी नियत काल के अन्तराल में यह सम्मान घोषित किया ही जायेगा लेकिन आम समझ यही है कि राजनैतिक कारणों से दिनांक १३ जुलाई १९७७ से २६ जनवरी १९८० के बीच इस सम्मान से किसी को भी सम्मानित करने की घोषणा को स्थगित रखा गया था।

कुल दो अवसर ऐसे भी आये हैं जब इस सम्मान के लिए नामित किये जाने के बाद सम्मानित किये जाने के निश्‍चय को वापिस लिया गया। ऐसा पहला अवसर तब उपस्थित हुआ जब तत्‍कालीन केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री अबुल कलाम आजाद ने स्वयं को भारत-रत्‍न से सम्मानित किये जाने के प्रस्ताव को त्वरित रूप से यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि इस सम्मान की चयन-समिति में शामिल व्यक्‍ति को स्वयं ही इस सम्मान के लिए चयनित नहीं किया जाना चाहिए। बाद में १९८२ में उन्हें यह सम्मान मरणोपरान्त दिया गया।

किन्तु, १९९२ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भारत-रत्‍न से ‘मरणोपरान्‍त’ सम्मानित किये जाने की घोषणा, उनकी मृत्यु के विवादों से घिरे होने से, न्यायालय की अनोखी समीक्षा में आई और इसलिए रद्द करनी पड़ी थी।

(१८ अप्रैल २०११)