आल इज़ नॉट वैल

जब पार्टी कह रही थी कि मैडम की सर्जरी कब होगी, पता नहीं तब जिम्मेदारी मिलते ही पहली सुबह पण्डितजी ने मुँह खोला कि सर्जरी सफल रही है! ‘सीक्रेट मिशन’ के ऐसे बिना इजाजत खुलासे के लिए लताड़ तो पड़नी ही थी।

दिखने-दिखाने को तो डेमोक्रेसी में मोटा-मोटी तीन धाराएँ होती हैं — आल इज़ वेल, आल इज़ नॉट वेल और नॉट श्योर! पर यह जो तीसरी ‘अन-श्योर’ वाली लाइन है वह खुद में भी मेनली दो शाखाओं वाली होती है। एक ‘वेल’ प्रोन और दूसरी ‘अन-वेल’ प्रोन। गोया, सारा का सारा पॉलिटिकल अनिश्‍चय ‘मीठा-मीठा हप्प और कड़ुआ-कड़ुआ थू’ का एग्ज़ैट पर्याय है।

लेकिन कन्फ़्यूज्ड कतई न हों। ये दोनों ही उपधाराएँ, मौके की नजाकत के गणित से, कभी भी एकदम यू टर्न लेने की अपनी अन-पैरेलल क्षमता पर भरपूर भरोसा रखती हैं। एक बात और, यू टर्न लेने की यह इण्डियन डेमोक्रेटिक स्पेशियलिटी ‘बे-पैंदी के लोटे’ से डेफ़िनेटली डिफ़रैण्ट है। यूँ, मैं भी बहुत श्योर नहीं हूँ कि अनिश्‍चय के इस दौर में आपको समझा भी पाऊँगा या नहीं। फिर भी सोचता हूँ कि कोशिश करने में क्या हर्ज है? आखिर बाबा और अन्ना जैसे भी तो जुटे हुए हैं इस फ़र्ज में, बिना हर्ज की फिकर किये। इसीलिए, समझाने का फर्ज अदा करने की कोशिश करता हूँ।

एक समय था जब चोचलिस्टों के सिरमौर रहे मधु लिमये मंचों से पब्लिक को बताते फिरते थे कि कैसे कांग्रेसी लेडी राइटिस्ट संघियों और लेफ़्टिस्ट कामरेडों के अनिश्‍चय को एनकैश कराती थी। यह उस दौर की बातें हैं जब पार्लियामेण्ट में ‘नो कान्फ़िडेन्स मोशन’ लाने का कर्त्तव्य सोशलिस्टों का कॉपीराइट हुआ करता था। लिमये-रोदन यही होता था कि सोशलिस्ट जब भी गिनती में मदद के लिए जनसंघियों का दामन थामते थे तो इन्दिरा वामपन्थियों को समझाती थीं कि सोशलिस्ट और संघी हाथ में हाथ थामे देश को पूँजीवादी बिरादरी की गोद में डाल देंगे और जब वामपन्थी सोशलिस्टों के लाये नो कान्फ़िडेन्स के साथ खड़े होते थे तो इन्दिरा संघियों को समझाने बैठती थीं कि कैसे ये दोनों मिल कर देश को कम्युनिस्ट खेमे में ढकेलने एक-जुट हो गये हैं। जहिर है, कांग्रेसी सरकार बचनी ही बचनी थी। हर बार बची भी।

कुछ बेचैन आत्माएँ मुझसे पूछे बगैर रहेंगी नहीं कि न लिमये रहे और न इन्दिरा, तब आज के मनमोहनी वातावरण में मैं निकल चुके साँपों की ये बेमतलब लकीरें क्यों पीट रहा हूँ? केवल उन्हीं की तृप्‍ति के लिए कह रहा हूँ कि संघियों, सोशलिस्टों और लेफ़्टिस्टों के बीच पॉलिटिकल अन्डरस्टैण्डिंग की धुरियाँ जरूर अदलती-बदलती रही हैं लेकिन पॉलिटिकल अनिश्‍चय की परिपाटी आज भी वैसी की वैसी ही कायम है। अब देखिये ना, खुद मनमोहन ही डोलड्रम में हैं कि तमिल राजनीति में करुणा के साथ दिखें, जया के साथ हो लें या कि चिदम्बरम को ही सत्ता-साथी मानते रहें? बल्‍कि, उनकी हालत देख कर कई बार तो यह भी लगने लगता है कि उनका जिया कांग्रेस के अपने सरपरस्तों से ज्यादा सुषमा, बाबा और अन्ना जैसी विरोधी बैंच पर भरोसा जाहिर करने को तरसता होगा।

सच्ची-झूठी अफ़वाहों के ताजे दौर में गडकरी ने चिदम्बरम और मनमोहन को हटाने की माँग क्या कर डाली, कांग्रेसी सरपरस्तों के चाटुकारों को एक मौका और मिल गया। नहीं, गलत समझ रहे हैं। मौका बीजेपी या फिर गडकरी को लथेड़ने का नहीं, मौका मनमोहन की मनभावन तस्वीर पर कुछ और कालिख पोत देने का। ताकि बाबा गांधी को हॉट सीट सौंप देने का स्पान कुछ और सिकुड़ जाये। अब, मेरी बात पर हाई-कमानी कारिन्दों की नाईं इस कदर नाक-मुँह मत सिकोड़िये। सीधे-सीधे मुँह खोलिए कि बात भेजे में घुसी नहीं है। वैसे, इसमें आपका खास दोष नहीं है। विद्वान से विद्वान हो, चाटुकारिता आदमी की यही गत बनाती है।

खैर, गडकरी की उस माँग पर शकील अहमद साब की टिप्पणी पर गौर फरमाइये। वे गरजे थे — बीजेपी पहले अपने भ्रष्‍टतम्‌ सीएम को हटाए फिर हमसे मुखातिब हो। यों, ठीक-ठाक पॉलिटिकल स्टैण्ड था। बस, थोड़ी सी स्लिप ऑफ़ टंगू! मेरा मतलब है, जुबान थोड़ी फिसल गयी थी। लेकिन मैसेज यह गया कि भैराहट में कांग्रेसियों की अकल ही फिसल गयी है। दरअसल, शकील भाई ने तब के हॉट केक येद्दि को लपेटा था। पर जनता के बीच मैसेज गया कि बीजेपी खुद का तो सबसे काला चेहरा धोना नहीं चाहती और हमसे कह रही है कि हम अपने ऊँट-घोड़े बदल दें। अपने इस तरह बेल-आउट होने पर मोदी मुस्कराते फिर रहे हैं सो अलग!

उधर, लोकपाल बिल में पीएम की शरीक़ी को लेकर भी एक गजब का तर्क दिया कांग्रेसी ऊँटों, घोड़ों और हाथियों ने। बीजेपी को साथ करने के फेर में पाँसा फेका — अन्ना से बचकर रहना। आज भले ही कांग्रेसी पीएम हो, कल बीजेपी पीएम भी तो हो सकता है!

जाहिर है, नासमझी वाले इन बयानों से मैडम की तबीयत बिगड़ने लगी है। बल्कि शायद, ज्यादा ही बिगड़ गयी है। तभी तो, घटाटोप अँधियारे के इस माहौल में देश को अपने हाल पर छोड़, बिना शेड्यूल, अमरीका दौड़ गयीं। वह भी किनके भरोसे? एक बाबा गांधी को छोड़ देते हैं। उनके लिए तो सौ खून माफ़ हैं। जिन्हें मेरे इस मुहावरे से मिरची लगी है, उनके लिए मिलता-जुलता सा एक दूसरा मुहावरा पेश है — दूध की दुहनिया वाला।

खबर है कि हाई-कमान चौकड़ी में मुखर मुखिया का रोल जनार्दन द्विवेदी करेंगे। लेकिन, यह नयी जिम्मेदारी पण्डित जी के लिए ‘सिर मुड़ाते ही ओले पड़े’ वाली साबित हुई। जब पार्टी कह रही थी कि मैडम सर्जरी के लिए ‘विदेश’ गयी हैं जहाँ पता नहीं कब उनका ऑपरेशन होना है तब जिम्मेदारी मिलते ही पहली सुबह पण्डितजी ने प्रवक्‍ताई मुँह खोला — सर्जरी सफल रही है! ‘सीक्रेट मिशन’ के ऐसे बिना इजाजत खुलासे के लिए लताड़ के ओले तो पड़ने ही थे, सो पड़े। सो, तुरन्त ही पण्डित जी का खण्डन आ गया। सर्जरी हुई नहीं है, होनी है। कब, सप्‍ताह भर में पता चलेगा। लेकिन, अगली सुबह होने से पहले ‘नजदीकियों’ ने मीडिया को सूचना दी कि एक दिन पहले हुआ ऑपरेशन सफल रहा है, मरीज आईसीयू में आराम कर रहा है।

समझ रहे हैं ना? आल इज़ नॉट वैल।

(०७ अगस्‍त २०११)