तुम्हारी-हमारी, दोनों की जै-जै

चलिए, बतलाता हूँ कि ब्याह-बारात के जनवासों के शास्‍त्रार्थ की याद यक-ब-यक क्यों आयी थी? हुआ यह कि मँहगाई के मुद्दे पर संसद्‌ में बीजेपी-कांग्रेस के बीच हुई ‘गहरी’ ताजी बहस की लाइव कवरेज देख रहा था। आपने भी देखी होगी। वही ‘न कोई जीता, न कोई हारा’ वाली।

कहते हैं कि सनातन परिवेश में चौमासे में ब्याह-बारात वर्जित हैं। लेकिन इससे क्या? कहा तो यह भी जाता है कि कई बार यह वर्जनाएँ, सीमाएँ और दैहिक अयोग्यताएँ ही हैं जो किसी की निहायत सीक्रेट पर्सनल वीकनेसेस को अत्याचार और अनाचार की पीक पर ले जाती हैं। यों, बात सरल सी है लेकिन जो लोग रोहित शेखर शर्मा बनाम नारायण दत्त तिवारी प्रकरण पर मेरे नजरिये को जानते हैं वे अपनी ही इच्छा से इस सरल बात को तोड़ेंगे-मरोड़ेंगे भी और एनडी से जोड़ेंगे दिखलायेंगे भी। यह सच है कि बाप-बेटे वाले मुद्दे पर मैं इस नजरिये का हूँ कि रोहित-एनडी में यदि कोई नाजायज है तो यह टोपी औलाद को नहीं, उसके बायोलॉजिकल बाप को पहनाई जानी चाहिए। खास तौर से जब माँ तो बेटे के बायोलॉलिकल बाप को खुले खजाने आइडेण्टिफाई कर रही हो लेकिन बायोलॉजिकल बाप कुतर्कों की आड़ ले रहा हो तब यह तर्क कानूनी भी है और सामाजिक भी। लेकिन इससे क्या? दोनों कतई अलहदा दायरे हैं। इसीलिए, पनपने से पहले ही इस अतिक्रमण को नेस्तनाबूद देना चाहता हूँ।

जानता हूँ, मेरी इस सफाई पर वे ही विघ्‍न-सन्तोषी एक पलट-वार और करेंगे। कहेंगे, इस वाकये में ‘पर्सनल वीकनेस’ कहाँ से घुस आयी? तो दूसरों के मुँह में अपने अल्फाज़ ठूँसने में माहिर इन लोगों से यह एक सवाल मैं भी करना चाहता हूँ कि भैये, क्या आपने वह सब नहीं पढ़ा-सुना जो दूसरों ने पढ़ा-कहा है? खैर, मैंने सुना है। कहते हैं कि अपनी सफाई में एनडी ने एक दलील यह भी दी है कि उनमें तो सन्तान पैदा करने का माद्दा ही नहीं रहा! कभी। होता तो, उनकी ब्याहता बेचारी क्यों इतनी तरसी-तरसी रहती? सुनते हैं कि क्राइम साइकॉलॉजी के पण्डित कमजोरियों को सफाई का नहीं बल्कि इण्डल्जमेण्ट का मजबूत आधार मानते हैं।

फैक्‍ट अपार्ट, फिर से कहता हूँ कि चौमासे की वर्जना से नहीं बल्कि किसी और वजह से मुझे ब्याह-बारात की याद आयी थी। लेकिन ‘क्यों’ की अपनी बात को आगे बढ़ाने से पहले ब्याह-बारात की वह बात भी तो आपको बतलानी पड़ेगी जो मुझे याद आ गयी थी। दरअसल, मुझे वो दिन याद आ गये जब बारातें सच में आती थीं। वह भी चन्द लम्हों की औपचारिकता के लिए नहीं, कम से कम दो दिनों के विस्तृत पारिवारिक उत्सव के लिए। लोकल बारात भी दो दिनों की तो होती ही थी। लड़के वाले दोपहर होने से पहले-पहले लड़की वालों की छाती पर सवार हो जाते थे — लो, हम पधार गये हैं। हमारी खातिरदारी करो। ख़त बनवाओ, चम्पी-मालिश करवाओ, पन्हई चमकवाओ वगैरा-वगैरा। सारी सेवाएँ आज के सिंगल विण्‍डो सरकारी पैटर्न की उस कैम्पस में होती थीं जो जनवासा कहलाता था।

खैर, उस जनवासे में एक रस्म पूरी शिद्दत से अदा होती थी। लूजर और गेनर, दोनों पक्षों की पारवारिक मण्डलियाँ एक बड़े से हॉल में दो पालों में बिल्कुल आमने-सामने बैठती थीं। एक-दूजे को चुनौती देती सी फ़्रैण्डली मुद्रा में। दोनों पालियों के पण्डित-खवास पालियों की अगुआई करते थे। मिठास भरे पारिवारिक परिचय के साथ हल्के जल-पान के दौर में दोनों पक्षों के पण्डितों के बीच कुछ बौद्धिक चोंचले-बाजी होती थी। दिखावे की नोंक-झोंक और अपने-अपने पालों से पीठ-थपथाई वाली वाह-वाही भी। फिर मैत्री-पूर्ण गले-मिलाई के बीच ‘न कोई जीता और न कोई हारा’ श्रेणी का यह शास्‍त्रार्थ निपट जाता था। रस्म का अन्‍त होता था, कन्या-पक्ष की सामाजिक मण्डली द्वारा वर-पक्ष को स्वीकार लेने वाले, बारात द्वार पर ले आने के न्यौते से। मुझे एक भी ऐसा अवसर ध्यान नहीं आता जब इस के कन्या-पक्ष के बुजुर्ग चौकीदारों की निगाह में वर-पक्ष इस सामाजिक परीक्षा में फेल हुआ हो। विकल्प-हीनता जैसा दयनीय शब्द डिक्शनरी में शायद इसीलिए ईजाद हुआ होगा।

विकल्प-हीनता से मुझे मेरे एक मित्र याद आ गये। खबरची रहे हैं। स्वभाव के चलते यौवन से रिटायर होते न होते खबर की दुनिया से ही रिटायर हो चुके हैं। यों, देश की डेमोक्रेसी पर अपनी राय यदा-कदा देते रहते हैं। कोई माने या न माने, हम तो कहेंगे सनम वाली स्टाइल में। गांधी के आलोचक हैं। आरएसएस के ढोंगों की परख का भी दावा है। लेकिन चोचलिस्ट और लेफ्टिस्ट के घोर आलोचक हैं। इनकी निगाह में भाजपा कांग्रेस की पर्याय होकर रह गयी है। बिल्कुल वैसे ही जैसे कांग्रेस भाजपा का पर्याय होती जा रही है। सुविधा के लिए ये एक को अच्छी कांग्रेस और दूसरी को बुरी कांग्रेस कहते हैं।

इनका खयाल है कि भारतीय लोक-तन्त्र कुछ ऐसा है कि देश के पास केवल दो विकल्प हैं — अच्छी कांग्रेस को चुनो या फिर बुरी कांग्रेस को। ठीक वैसे ही जैसे यह कहा जाए कि किसी के पास विकल्प केवल यह है कि वह चाँटा किस गाल पर खाए, बाँये पर या कि दाँये पर। या फिर, ऐसे जैसे कि वह इस गुण्डे से पिटे या कि उस गुण्डे से। गोया, विधाता ने हमारे लोकतन्त्र की किस्मत के खाते में पिटना तो लिख ही दिया। बस, हुआ यह होगा कि इतना लिखते-लिखते विधाता के सामने जंगल फिरने जैसी कोई अपरिहार्य इमर्जेन्सी आ गयी होगी। सो, अधूरा लिखा पन्ना छोड़ कर निकल लिए होंगे। तभी, लौटने से पहले, वक़्त की किसी आँधी ने लोकतन्त्र वाला वह पन्ना उड़ा कर यहाँ-वहाँ कर दिया होगा। ओवर बिज़ी विधाता भी भूल गये होंगे कि क्या लिख रहे थे, क्या लिखना छूट गया था?

अरे हाँ, मुद्दे की बात तो छूट ही गयी। चलिए, बतलाता हूँ कि ब्याह-बारात के जनवासों के शास्‍त्रार्थ की याद यक-ब-यक क्यों आ गयी थी? हुआ यह कि मँहगाई के मुद्दे पर संसद्‌ में बीजेपी-कांग्रेस के बीच हुई ‘गहरी’ ताजी बहस की लाइव कवरेज देख रहा था। आपने भी देखी होगी। वही, ‘न कोई जीता, न कोई हारा’ वाली। कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी की थी। इस बार क्योंकि कांग्रेस और भाजपा की साँठ-गाँठ दिख रही थी, ये रियल अपोजीशन का रोल अदा करते दिखे। यानी कि, सब कुछ बिल्कुल वैसा ही नजर आ रहा था जैसा कभी जनवासों में होता दिखता था!

(१४ अगस्त २०११)