बॉस कभी गलत नहीं होता

बाबा और अन्ना जैसों की फैलायी अफ़वाहों पर नहीं चिदम्बरम, सिब्‍बल और बंसल के भरोसे पर भरोसा रखिये। भ्रष्‍टाचार की परतें सैचुरेशन पाकर खुद-ब-खुद ढहेंगी। उजला हिन्दुस्तान एक बार फिर से दिखायी देगा।

एक दिन किसी काम से किसी के घर जाना पड़ा। बाहरी दुनिया में इनका परिचय ‘बुद्धि-जीवी’ होने का हुआ करता है। देहलीज लाँघने से पहले दरवाजा खटखटाया तो भीतर घुसते आने की हिदायत मिली। भीतर का नजारा अद्‍भुत्‌ था। वे आठ बाई दस के इकलौते कमरे में बेतरतीब पड़ी कतरनों की ढेरियों से बची जमीन पर आलथी-पालथी मारे बैठे थे। बैठने का ऑफ़र मुझे भी मिला। बड़ा ऑकवर्ड लगा पर उन्हें देखा तो मेरे इस तरह सवालिया निगाहों से थैंक्स कह देने के बाद भी वे वैसे के वैसे ही अनपरटर्ब्ड बने रहे। उन्होंने जब यह तय पाया कि मैं वहीं दूर ही खड़ेश्‍वर बना रहूँगा तो सामने की एक ढेरी को बाजू वाली दूसरी पर लापरवाही से सहेज दिया और खाली हुई जगह पर बिराजने का सादर न्यौता रिपीट किया। अटक मेरी अपनी थी सो बैठना ही पड़ा वरना, बॉस के आदेश को ठुकराना खाली झोली लौट आने की भूमिका बन जाता। हाथ के इशारे से ही दस मिनिट के इन्तजार का आदेश भी मिला। समय काटने के कम्पल्शन में उँगलियाँ आजू-बाजू पड़ी पेपर क्लिपिंग्स की तहकीकात को मचल उठीं। डरते-डरते एक ढेर से कुछ कतरनें उठायीं। निगाह फेरना शुरू किया तो गर्द से रूबरू हुआ। गन्दगी की बीमारियों के बारे में देखे-पढ़े एडवर्टाइज़मेण्ट्स की पूरी श्रृंखला आँखों के आगे कतार-बद्ध गुजर गयी। पीआईबी से लगाकर जर्म्स क्लीनर तक के सारे कॉमर्शियल्स, सिंहासन बत्तीसी की पुतलियों की तर्ज पर, वार्निंग नोट इश्यू करते एक के बाद गुजर गये।

सिहरन तो हुई पर तभी इस बुद्धि-जीवी के बारे में समाज में फैली एक पॉपुलर किंवदन्ती याद आ गयी। प्रसिद्ध है कि इनका यह, विदाउट लेट-बाथ-किचन, सिंगल रूम टोटली जर्म-फ़्री है। यों, आपकी तरह ही मैंने भी ऐसी अफ़वाहों पर कभी भरोसा नहीं किया था पर उस दिन इतना भरोसा हुआ कि अब खुद एफ़ीडेविट तक दे सकता हूँ। दरअसल, कहा जाता है कि दुनिया का हर विषाणु-कीटाणु पीढ़ी दर पीढ़ी बरसों से अपनी सन्तानों को चेतावनी देता आया है कि इनके घर के पास भी मत फटकना, नहीं तो बीमार पड़ जाओगे!

मालूम है कि मेरे इस ‘सफाई पुराण’ पर आपको मेरी अपनी सफाई की दरकार है। जरूर दूँगा। पर, उससे पहले गजब की वेरायटी की उनकी कतरनों के बारे में भी कहना चाहता हूँ। जरा गौर फरमायें —

गौर फरमाने से एमपी के नगरीय प्रशासन मन्त्री बाबूलाल गौर याद आ गये। एक खबर इनकी भी थी। लगा, खुद मन्त्री जी ने प्लाण्ट करवायी थी। ऐसा करें भी क्यों नहीं? सीएम की कुर्सी छोड़कर अदना से मन्त्री की कुर्सी पर बैठने को कम्पैल किये गये हैं। खबरचियों तक पुर्जी पहुँचा दी कि बीते ३५ सालों से अपने मेल-जोल का खाता मैण्टेन कर रहे हैं। गोया, किसी ने भी जरा सी भी चूँ-चपट की तो उसके वाले पन्ने पब्लिशर को भेज देंगे। देखें तो सीधी-सीधी ब्लैक-मेलिंग की फुसकी थी। पर मन्त्री जी के ऐंगिल से देखें तो विवशता की चीख थी। अब, इतना तो आपने भी सुना होगा कि इनके चुनिन्दा ‘दुश्मन’ इनके और इनके पुराने ‘मित्रों’ के दस्तावेज तो दस्तावेज कुछ गम्भीर इनवॉल्वमेण्ट्स की हॉटम हॉट सीडी तक लिये घूम रहे हैं।

एक खबर यह भी थी कि सिटिंग सीएम के सगे छोटे भाई की जेसीबी मशीन और ट्रैक्‍टर-ट्रॉली को उन्हीं की पुलिस ने जब्त करके थाने में पटक रखी है। बड़े मामूली से विवाद में। अब, बिना नम्बर की गाड़ियाँ ऑपरेट करना वीवीआईपी का कोई जुर्म होता है? वह भी तब जब वे सरकारी ठेके को निपटाने में लगायी गयी हों? यह तो, महज पॉलिटिकल गेन के लिए या मीडिया फुटेज के लिए, रसूखदार आदमी के सिर खामखा भ्रष्‍टाचार के आरोप मढ़ना ही हुआ। कलेक्शन में मिली भ्रष्‍टाचार की दूसरी खबर तो कई कदम आगे थी। छपा था कि पॉलिटिक्स से रिटायर कर दिये गये बीते जमाने के एक कांग्रेसी मन्त्री ने दुनिया में मौजूद कांग्रेस के ही एक कद्दावर सीएम पर जैसे कीचड़ उँड़ेल दी थी — एमपी में भ्रष्‍टाचार की जड़ें उनके राज में ही फैली थीं!

समझ रहे हैं ना? भ्रष्‍टाचार केवल एक पीरियड में सीमित नहीं रहा है। परतों पर परतें चढ़ती गयी हैं। वैसे ही जैसे मेरे उन परिचित के कपड़ों पर मैल की परतें चढ़ जाती थीं। वे कपड़े धोते कभी नहीं थे। उनकी अपनी ईजाद की हुई एक थ्यौरी थी कि परतों पर परतें चढ़ जाने के बाद मैल एक दिन कुल परत इतना मुटिया जाता है कि बेबस हो खुद-ब-खुद पकड़ छोड़ देता है। उजला निखार वापस आ जाता है। पक्का नहीं है लेकिन देश के ताजा हालात देखकर लगता यही है कि इन्होंने अपनी यह थ्योरी छपवायी होगी और देश के हुक्मरानों ने उसे पढ़ा ही नहीं, समझा भी होगा।

अब खुद देखिए। शुरूआत इन्दिरा ने की। कहा कि करप्शन हैज़ बिकम यूनिवर्सल फिनॉमिना। इन्दिरा-पुत्र ने दर्शन को आगे बढ़ाया और फरमाया कि सरकार के भेजे सौ में से पचासी पैसे भ्रष्‍टाचारी डकार जाते हैं। अब राजीव-पुत्र गर्व से ज्ञान बघार रहे हैं कि हित-ग्राही तक पहुँचने वाला पैसा पाँच के रिकॉर्ड आँकड़े को छूने जा रहा है।

यों, यह एक बहुत पुराने कार्टून-पोस्टर की पंच-लाइन है लेकिन ऐसा कोई पीरियड नहीं गुजरा जिसमें इसे दुहराया न गया हो। फ़र्क केवल यह है कि गुलामी के समय इसमें अंग्रेजियत का रोल माना जाता था। फिर, जब आजाद भारत में भी हुक्मरानों में यही रवैया कायम रहा तो यह कहकर पिण्ड छुड़ाया जाने लगा कि अंग्रेज चले तो गये थे लेकिन औलादें यहीं छोड़ गये थे! पर, एक पूरी की पूरी पीढ़ी के बीत जाने के बावजूद जब बॉसिज़्म ने किनारा नहीं किया तो डेमोक्रेटिक इण्डिया में भी ‘बॉस थ्योरी’ का प्रूव होना मान लिया गया। आजादी के माहौल में पैदा हुए आम हिन्दुस्तानी ने भी अपने जेहन में बैठा लिया — बॉस इज़ नेवर राँग।

लब्बोलुबाब यह कि बाबा और अन्ना जैसे ना-समझों की फैलायी अफ़वाहों पर मत जाइये। चिदम्बरम, सिब्‍बल, बंसल जैसों के भरोसे पर भरोसा रखिये। भ्रष्‍टाचार की चढ़ रही परतें सैचुरेशन पाकर खुद-ब-खुद ढह जायेंगी। उजला हिन्दुस्तान एक बार फिर से दिखायी देने लगेगा।

(२१ अगस्‍त २०११)