रस्सी जली पर ऐंठन नहीं गयी

संसद्‌ का सम्मान करते हुए जब अन्ना ने अपना अनशन तोड़ने का ऐलान किया तब देश को मूर्ख बनाने में सफल रही कांग्रेस और उसके संसदीय नेतृत्व ने मूँछों ही मूँछों में मुस्कुराते हुए प्रतिक्रिया दी कि साबित हुआ कि संसद्‍ की इच्छा ही देश की इच्छा है!

नाम नहीं लूँगा। काम भी नहीं बताऊँगा। ऐसा करने में बड़ा जोखिम होता है। खतरा तब और बढ़ जाता है जब कोई पढ़ी-सुनी बातों पर भरोसा करके ऐसा करता है। अब देखिये ना, सुना है कि बेचारे एक अभिनेता इसी जोखिम में फँस गये हैं। और तमाश-बीन लोग हैं कि चटकारे ले-ले कर इशारों ही इशारों में पूरे एपीसोड पर कुछ इस तरह बतिया रहे हैं — गये थे हरि भजन को, ओंटन लगे कपास!

वैसे, मुझे लग रहा है कि गलती उनकी अपनी थी। मुश्किल से जमने वाली एक्‍टिंग की दूकान अच्छी भली चल निकली थी। ऐसे में, न जाने क्या हुआ कि ‘नेता बनाम अभिनेता’ वाली थ्योरी के फेर में पड़ गये? हो सकता है कि ‘बहती गंगा में हाथ धो लेने’ के मुहावरे पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो गया हो। लगे हाथ ‘कुछ और’ हथिया लेने के फेर में पड़ गये। पड़ गये तो पड़ गये पर कन्फ़्यूज्ड हो गये कि फैक्‍ट क्या है — नेता उम्दा अभिनेता होता है कि अभिनेता के पीछे एक असली नेता छिपा रहता है? फिर पता नहीं, किसी दुश्मन ने जेहन में भर दिया या खुद ही सूझ गया कि नयी हवा की इतनी फिल्में कर चुके हैं कि पब्लिक में ‘बॉर्न लीडर’ की सॉलिड इमेज न जाने कब की बन चुकी है। ठान लिया कि बुढ़ापे के सच में जम जाने से पहले इसे एनकैश करा लेना चाहिए। पर, खुद के सोच लेने से होता क्या है? प्रॉफ़िटेबिल ऑफर एक भी नहीं मिला। तभी एक ठेठ गँवई आदमी की डेमोक्रेटिक मेजिकल वैण्ड कुछ ऐसी घूमी कि अच्छे-अच्छों की सजी-सजाई दुनिया घूमने लगी। सो, इस ‘ओपन फ़ॉर पब्लिक’ ऑप्शन पर सीरियसली सोचा और कनक्लूड किया कि अपनी तो लाटरी लग गयी। ऐसा मानते क्यों नहीं? मंच पर वैसे तो सब था पर ग्लैमर जीरो था। सो, गैप भरने खुद ही चढ़ लिये।

हुजूम तो हुजूम, मीडिया का भी उत्साह देखा तो इतने डायलॉग जड़ दिये जितने लम्बी तोता रटन्त के बाद भी एक टेक में कभी नहीं बोल पाये थे। पेंच यहीं उलझ गया। लिखी हुई स्क्रिप्‍ट तो थी नहीं। डायलॉग कुछ ज्यादा हो गये! इतने कि अपनी सैल्फ़ प्रोपेगेटेड सुप्रीमेसी के चुनिन्दा झण्डाबरदारों को पीड़ित कर गये। सुना है, स्वयं-भू अभिजात्य महा-प्रभुओं के कुछ स्वयं-भू बरखुरदारों ने तो ‘तुरत दान महा-कल्याण’ के दर्शन पर चलते हुए अपनी भड़ास निकाल ली और कुछ ने हिसाब बराबर करने के लिए ‘बाद में देख लेने’ की अपनी-अपनी नीयतों का खुलासा कर दिया।

वैसे, अभिनेता जी इतिहास को खँगालने की जुर्रत करते तो जान जाते कि सारे एपीसोड से उबरने के लिए उनके पास तुरुप का पत्ता एक बचा हुआ था। लेकिन एक्‍टर बेचारे कोई ‘बॉर्न पॉलिटीशियन’ तो हैं नहीं इसलिए जान ही नहीं पाये कि फिरंगिस्तान में एक चतुर आदमी ने इन्हीं हालातों से खुद को कैसे निकाला था? सुना है, उसने लिख दिया था कि आकाओं के चबूतरे पर बिराजने वाली भीड़ में आधे तो बड़े नालायक हैं। और, जब इस पर बबाल मचा तो कूल-कूल सी यह सफाई दे दी कि छापे-खाने की गलती से उल्टा छप गया था! उन्होंने लिखा तो ‘लायक’ था लेकिन उसकी जगह छप ‘नालायक’ गया था! फिर, उसने हर उस शख़्स से क्षमा भी माँग ली जिसका दिल ‘प्रिंटर्स डेविल’ कही जाने वाली इस मामूली सी टेक्निकल एरर से दु:ख गया हो।

क्षमा माँगने से एक सज्जन याद आ गये। कहते हैं कि ये किसी के उकसाने से नहीं बल्कि किसी के आदेश से तू-तड़ाक से भी पीछे नहीं हटते हैं। लेकिन हर चीज की एक हद होती है सो इसकी भी हो गयी। और, बात जब इनके अपने गिरेबान से उठकर हर हाईनेस रानी हुजूर और उनके वली अहद के गिरेबानों तक पहुँचती दिखी तो लम्बे अज्ञात-वास से निकल कर खुले आसमान के नीचे माफ़ी माँग ली। वैसे, मैंने जो सुना है उसके हिसाब से नेता जी ने तो सफाई दी थी, क्षमा नहीं माँगी।

राजनीति में पगी इस तरह की सफाई देने से एक दूसरा बड़ा आदमी याद आ गया। इसके बारे में मैंने केवल ‘पढ़ा-सुना’ नहीं था, अपनी आँखों से बोलते हुए ‘देखा’ भी था। बुद्धू-बक्से पर कुछ चैनलों द्वारा सोचे-समझे ढंग से जो कुछ दिखाया गया था उससे लगा तो यही था कि मियां जी पकड़े गये थे। रंगे हाथों। लगा, विभीषण बेचारे बे-वजह ही बदनाम हुए। उन्होंने तो पाला बदला था, खुले खजाने। वह भी उससे पहले रावण को खासी समझाइश देने के बाद। फिर, नैतिकता के आधार पर निराश होकर, उतने ही खुले खजाने ताम-झाम से पाला बदल लिया था। पर, बड़े कद के इस ‘सोशल वर्कर’ को बोलते हुए देखकर पहली बार समझ में आया कि असली ‘घर का भेदी’ क्या होता है? पूरी दुनिया को भी समझ में आ गया था। शायद, ये खुद भी ‘समझ’ गये थे। अब बगलें झाँकते हुए उस तरह की कानूनी दलीलें देते फिर रहे हैं जैसे उनके वे महान्‌ अधिवक्‍ता मित्र गम्भीर अपराधों में फँसे अपने क्लाइण्ट्स की ओर से कचहरियों में देते रहते हैं — प्रूव करो।

यों, माफ़ी माँगने वालों की प्रॉबेबिल लिस्ट बड़ी लम्बी हो चुकी है। इसमें कुछ तो सचमुच के रसूखदार भी हैं। पर लगता है कि क्योंकि अपनी-अपनी फील्ड के काले-पीले में वे सचमुच ही रसूखदार हैं, अभी तो बच निकले। शायद इसलिए कि आने वाले दिनों में रानी हुजूर और उनके अपने वली अहद, दोनों के दोनों, को ही इनकी तरफ़दारी की बड़ी जरूरत पड़ने वाली थी। वैसे, इन गुर्गों की तरफ़दारी से आगे, दोनों की जरूरतें और भी हैं। इसीलिए तो वली अहद हुजूर, चकित करते अपने एक लम्बे मौन की सफाई देने, अचानक संसद्‌ पधार गये। चेयर का इतना फेवर भी कबाड़ा कि कुछ ना-समझों की उँगलियाँ उस चेयर की ओर भी तन गयीं जिस पर, अमूमन, कोई कमेण्ट नहीं किया जाता।

खैर, यह तो पॉलिटिक्स की रोज-मर्रा की बातें हैं। इनका रोना कब तक रोयेंगे? रोना ही है तो कुछ और गहरे संकेतों पर रोया जाए। जैसे, आम जन के डाले भारी दबाव में जन लोकपाल बिल पर संसद्‌ में हुयी बातों के सार का सम्मान करते हुए जब अन्ना ने अपना अनशन तोड़ने का ऐलान किया तब देश को मूर्ख बनाने में सफल रही कांग्रेस और उसके संसदीय नेतृत्व ने मूँछों ही मूँछों में मुस्कुराते हुए प्रतिक्रिया दी कि साबित हुआ कि संसद्‍ की इच्छा ही देश की इच्छा है!

(२८ अगस्त २०११)