लोकपाल : दायित्व अब देश का

आरएएफ को तैनात कर उत्तेजना फैलाने की कुटिल सरकारी चाल चली जा चुकी है। इसलिए, अब यह देश का दायित्‍व है कि उसने अभी तक जिस तरह, अन्ना की मौजूदगी में, सारी सरकारी चालों को धूल चटायी है ठीक उसी लहजे में आगे भी बढ़ता रहेगा। तब भी जब, ईश्‍वर न करे, अन्ना का इह-लौकिक अस्‍तित्‍व मिट जाये। अन्ना के वज़ूद को चिर-स्थाई बनाने का यही इकलौता उपाय है। अन्ना को विजय-माल पहनाने का भी। और, हमारे लोक-तान्त्रिक देश को उसका प्राप्य दिलाने का भी।

सार्थक लोकपाल की माँग को लेकर प्रारम्भ हुए आन्दोलन में हजारे के अनिश्‍चित-कालीन अनशन की आठवीं सुबह कई अर्थों में बाकी दिनों से भिन्न थी। इससे बीती रात को अन्ना हजारे के स्वास्थ्य की जो जाँच हुई उसने चिन्ता करने जैसे संकेत देना शुरू किये। यों, स्वास्थ्य अब बिगाड़ लेना शुरू करेगा इसकी सुगबुगाहटें पूरे सातवें दिन फैलती रहीं थीं। इन सुगबुगाहटों ने राजनीतिज्ञों की पेशानियों पर बल डालने भी शुरू कर दिये थे। वजहें मुख्यत: दो थीं।

जाहिर तौर पर पहली वजह तो सत्ता-नशीन कैम्प के पास थी। इनमें उसके दोनों पक्ष बराबरी से शामिल हैं — वे जो सत्ता पर काबिज हैं और वे भी जो सत्ता पर काबिज होने को बड़े व्यग्र हैं। पहले को लगने लगा है कि अपनी क्षुद्र स्वार्थ-पूर्ति के लिए, दूसरे ने, उसकी बलि चढ़ाने का अन्तिम मन्त्र भी पढ़ दिया है। जबकि दूसरे का सोच यह है कि इतनी मशक्कत के बाद हाथ आयी स्थिति को अब नहीं भुनाया गया तो फिर वे कभी नहीं भुना पायेंगे। कांग्रेस के इस अन्तर्द्वन्द्व ने सत्ता पर काबिज धड़े को यह सद्‌-बुद्धि देनी शुरू की है कि अदूर-दर्शिता को तिलांजलि देने का शेष बचा इकलौता अन्तिम अवसर छोड़ने का अर्थ अपने राजनैतिक अस्तित्व के दु:खद अन्त को खुद ही न्यौतने से हटकर और कुछ नहीं है। बेचैनी में डूबे दूसरे कैम्प की भितर-घाती कोशिशों के बीच पूरा दिन हजारे से बातचीत के बहानों और मध्यस्थों की सरकार-सुलभ राह तलाशने में बीता। अनशन का पूरा सातवाँ दिन इन्हीं संकेतों से भरा रहा।

दूसरी वजह विरोधी दलों के पास थी। अन्ना ने देश के आम जन का आह्वान कर दिया कि वह अपने-अपने क्षेत्र के सांसदों के घरों के सामने शान्ति-पूर्ण अनिश्‍चित-कालीन धरने पर बैठ जाए। पूरे दिन, देश के कोने-कोने से, इसका असर देखने की खबरें आती रहीं। लोगों ने ऐसे किसी भी दल, उसके ऐसे किसी भी नेता को नहीं बख़्शने की ठान ली है जिसका नजरिया या तो ढुलमुल है या गोलमोल। शासक और विपक्ष जैसे किसी गणित से ऊपर उठ गये यह आन्दोलन-कारी। परिणाम यह हुआ कि देश ने देखा कि संजय निरुपम जैसे सोनिया-राहुल भोंपू अपने घर के सामने धरने पर बैठे लोगों से मिलने ‘अन्ना-टोपी’ पहन कर घर से निकलने को विवश हुए!

सातवें दिन के इस दबाव का बिल्कुल सीधा असर आठवीं सुबह देखने मिला। पिछले दरवाजों की आवा-जाहियाँ अचानक ही तेज हुई हैं। हालांकि, आनन-फानन में इसका फैसला करना अपरिपक्वता का प्रतीक होगा कि इनमें नीयत की सफाई कुल कितनी है? पहले अन्ना की स्वास्थ्य-रपट में बतलाया गया कि अनशन के प्रभाव में खून और पेशाब में कीटोन की मात्रा बढ़ने लगी है। इसके बाद रामलीला मैदान में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) की तैनाती की गयी। आरएएफ की यह तैनाती सरकारी नीयत के खोट-पूर्ण होने का पहला संकेत है। क्योंकि संकेत बड़ा गहरा है, देश को इस संकेत के पीछे मौजूद लोक-तान्त्रिक चिन्ता के अंकुर भी देख लेने चाहिए। कारण एकदम साफ है। सार्थक लोकपाल को लेकर शुरू हुई माँग के साथ एक-जुट हुए देश पर गिरफ़्तारी का पहला कोड़ा फटकारते हुए सरकार की ओर से यह दावा किया गया था कि सरकार को पूरी आश्‍वस्ति थी कि दबाव डालने की मंशा से अन्ना के अनशन पर बैठने पर कानून और व्यवस्था पर गहरा आघात पहुँचेगा ही पहुँचेगा। किन्तु आन्दोलन ने इन सारी सरकारी दलीलों को धूल तो चटाई ही, उस पर जन-दबाव इतना प्रबल कर दिया कि कांग्रेस खुद ही बँटती दिखने लगी है।

सातवें दिन की समाप्‍ति पर भी आन्दोलन की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं आया कि या तो कांग्रेस पार्टी ने और न ही उसकी सरकार ने पुलिसिया हस्तक्षेप के तर्क-संगत्‌ होने के तो दूर, अपने थोपे आरोपों तक के सच होने का किंचित्‌-मात्र प्रमाण सामने रखा हो। ऐसे में, आरएएफ की तैनाती सोची-समझी रण-नीति हो सकती है। सवाल उठाये जाने पर सफाई आ सकती है कि क्योंकि अन्ना की तबीयत उस मोड़ पर पहुँच चुकी है कि सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी नहीं रह सकती है। इससे आगे जाकर यह तक कहा जा सकता है कि, ईश्‍वर न करे, अगर अन्ना को कुछ हो गया तो उत्तेजित हुई भीड़ हिंसक भी हो सकती है! उस विषम स्थिति में आरएएफ ही सरकार का इकलौता आसरा होगी। साफ है, समय आ गया कि देश का प्रत्येक जन-तन्त्र प्रेमी नागरिक इस कुटिल राजनीति के पेंच को उसकी गहराई में उतर कर समझे। यही नहीं, वह इस सरकारी हथियार की धार को भोथरा भी करे।

कोई कठिन काम भी नहीं है यह। इसके लिए देश को समझना केवल यह है कि अन्ना ने देश के प्रति अपना दायित्‍व पूरी ईमानदारी से निभा दिया है। बिना विचलित हुए। अब देश की बारी है। वह भी अपना दायित्‍व निभाये — बिना थोड़ा सा भी विचलित हुए। अन्ना कह भी चुके हैं कि अनशनन करते हुए उनकी आहुति चढ़ भी जाती है तब भी देश, रामलीला मैदान को केन्द्र में रखते हुए, अविचल भाव से, बिना उत्तेजित हुए, इस आन्दिलन को तब तक जारी रखे जब तक कि उसका प्राप्य उसे मिल नहीं जाता है। आरएएफ को तैनात कर उत्तेजना फैलाने की कुटिल सरकारी चाल चली जा चुकी है। इसलिए, अब यह देश का दायित्‍व है कि उसने अभी तक जिस तरह, अन्ना की मौजूदगी में, सारी सरकारी चालों को धूल चटायी है ठीक उसी लहजे में आगे भी बढ़ता रहेगा। तब भी जब, ईश्‍वर न करे, अन्ना का इह-लौकिक अस्‍तित्‍व मिट जाये। अन्ना के वज़ूद को चिर-स्थाई बनाने का यही इकलौता उपाय है। अन्ना को विजय-माल पहनाने का भी। और, हमारे लोक-तान्त्रिक देश को उसका प्राप्य दिलाने का भी।

(२३ अगस्त २०११)