लोकपाल : जन-शक्‍ति का दम

सोलह अगस्‍त लोक-तन्त्र की अब तक की सबसे कठिन परीक्षाओं से भरा होगा। शहर, कस्बे या गाँव की गलियाँ तय करेंगी कि भ्रष्‍ट आचरण के खिलाफ़ किया गया शंख-नाद कितनी दूर तक और कितनी देर तक अपनी गूँज फैलाता है?

चलिए, बिना सच और झूठ की कोई समीक्षा किये, यहीं से शुरू करते हैं कि यह शत्‌-प्रतिशत्‌ सचाई है कि अन्ना हजारे ‘सरकार’ गिराने के सरंजाम जुटा रहे हैं। अरे नहीं, जुटा चुके हैं। तब, यह एक सवाल तो उठेगा ही उठेगा कि इससे लोक-तन्त्र चिन्तित क्यों हो? यह भी कि, सरकारें गिराने को भारत के ‘जन-तान्त्रिक गण-तन्त्र’ ढाँचे में सर्वथा अनैतिक, आपराधिक अथवा असंवैधानिक गतिविधि के रूप में क्या कहीं परिभाषित किया गया है? निश्‍चित रूप से नहीं। जाहिर है, यह एक स्वाभाविक लोक-तान्त्रिक इच्छा है और इसकी पूर्ति के लिए किया जाने वाला प्रत्येक प्रयास जन-तन्त्र का आधारभूत संवैधानिक हिस्सा-पुर्जा है — भट्‍टा पारसौल जाकर राहुल ने जो कुछ किया था वह भी तो ऐसा ही कुछ था। फिर, अपने राजनैतिक तनखैयों के माध्यम से येदुरप्पा के विरोध में कर्नाटक में, मोदी के खिलाफ़ गुजरात में और रमन के विरुद्ध छत्तीसगढ़ में किये गये कांग्रेस आला कमान के सारे प्रयासों को इससे भिन्न करके कैसे दिखाया जा सकता है?

ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक सवाल तो उठेगा ही उठेगा कि तब अन्ना और सार्थक-प्रभावी लोकपाल की माँग के लिए दबाव बनाने को शुरू हुआ उनका व्यापक जन-आन्दोलन लोक-तन्त्र के अपराधी कैसे हो गये? इस सवाल का जबाब नेहरू-सोनिया कांग्रेस के आला नेतृत्व को, और उसके प्रति अपनी अटूट निष्‍ठा को सिद्ध करने में टूटे पड़ रहे हर मोहरे को भी, देना ही होगा। हाँ, कांग्रेस यदि यह प्रमाणित करने की नीयत रखती हो कि यह कांग्रेसी हरकतें तो निहायत उथली-ओछी होती हैं जबकि हजारे का दर्शन बहुत गम्भीर और गहरा है तब मुझ जैसों को उसकी स्वीकारी इस सचाई के खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहना है।

जन-शक्‍ति का क्षमता-भर विशुद्ध सात्विक आह्वान यथार्थ जन-तन्त्र की शिरोधार्य आधार-शिला है। बल्कि, यह जिम्मेदार नागरिक का बन्धन-कारी दायित्व है। दरअसल, इस लोक-तान्त्रिक दर्शन को नकारने को तत्‍पर समूह ही लोक-तन्‍त्र का अपराधी है। असली और अक्षम्य अपराधी।

सोच के धरातल पर किसी को भी हजारे से असहमतियाँ हो सकती हैं। मेरी अपनी भी हैं। १६ अगस्त के अनशन को लेकर दिल्ली पुलिस की राजनीति-प्रेरित अड़ंगे-बाजी पर अन्ना और मनमोहन के बीच हुए, एक तरह से अन्तिम, पत्राचार से भी साफ हुआ है कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ़ शुरू हुई ताजी लड़ाई के प्रति अन्ना की अभी तक की समझ उतनी परिपक्‍व नहीं रही थी जितनी कि ऐसे व्यापक जन-आन्दोलनों की प्रभावी सफलता के लिए किसी अगुआ से अपेक्षित होती है। लेकिन वहीं दूसरी ओर मुझे यह भी समझ आता है कि भ्रष्‍ट सरकारी तन्त्र अन्ना से हमारे ऐसे, सर्वथा निराकरणीय, मत-भेदों को हवा देने की भरसक कोशिश कर रहा है। क्योंकि, वर्तमान स्थितियों में, उसके लिए यही एक-मात्र लाभकारी निवेश है। उसका प्रयास है कि इन मतभेदों का दोहन कर आम नागरिक के मन में हजारे को लोक-तन्त्र के सर्व-कालीन सबसे बड़े अपराधी की तरह स्थापित कर दिया जाए। बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी इसी ‘नेहरू-गांधी’ खानदान की ‘गांधी’ मुखिया ने जय प्रकाश नारायण को प्रचारित किया था।

गढ़े गये ऐसे कुतर्कों के बहकावे में आकर, लोक-तन्त्र के सबसे बड़े अपराधी की तरह प्रचारित की जा रही, हजारे की सरकारी तस्वीर पर अपनी भी सहमति का अँगूठा लगा देना लोक-तन्त्र के प्रति अपराध करने जैसा होगा। और, क्योंकि हमारे-आपके किये इस अपराध की ढाल बनाकर देश के वे सारे प्रत्यक्ष-परोक्ष सत्ता-प्रतिष्‍ठान जो भ्रष्‍टाचार की हर पराकाष्‍ठा पार कर चुके हैं; देश के जन-तन्त्र को दुर्गति के ऐसे दल-दल में घसीट ले जायेंगे जहाँ से वापस खींच ला पाना असम्भव नहीं तो अत्यन्त दुरूह तो हो ही जायेगा इसलिए, हमारा यह कृत्य कतई अक्षम्य भी होगा। कम से कम मुझे तो ऐसा अपराध करना स्वीकार नहीं है। जानता हूँ, अकेला-अनोखा नहीं हूँ। विवेक-विचार के बाद देश के हर लोक-तन्त्र निष्‍ठ नागरिक को लोक-तन्त्र की ऐसी दुर्दशा अस्वीकार होगी। आवश्यकता केवल और केवल अपनी अन्तरात्मा की पुकार को सुनने की है।

जैसे, जहाँ एक ओर हजारे सरकारी लोकपाल बिल की खामियाँ दूर करने की पुर-जोर माँग कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर सरकार समझ गयी है कि माँग कमजोर नहीं है। यह भी कि, यह किसी एक व्यक्‍ति या सीमित समूह की माँग नहीं है। इसीलिए इसके प्रति दो तरह की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गयी है। एक धारा घोषित रूप से कांग्रेस की है तो दूसरी है तो वैसे कांग्रेस की ही लेकिन उसने अपने ऊपर सरकार का मुलम्मा चढ़ाया हुआ है। कांग्रेस की ओर से मनीष तिवारी और राशिद अल्वी जैसे लाउड स्पीकर अनर्गल चिल्ल-पों कर रहे हैं। पार्टी की भाषा कुछ ऐसी है कि हजारे ने भूखे मरना तय किया है तो मरें। वे खुद मुख्तार हैं। पार्क में मरें, सड़क पर मरें या कि जेल में मरें। उनकी पार्टी को इससे कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। राशिद अल्वी ने तो यह माँग तक कर डाली कि पहले यह अन्वेषण किया जाये कि हजारे के पीछे कौन सी ताकतें खड़ी हैं? बाकी की कोई बात इसके बाद की है।

वहीं, सरकार की भाषा यह है कि हजारे लोक-तन्त्र को गिरवी रखने की कोशिश कर रहे हैं। जूनियरों की कतार की शोभा बढ़ा रहे हरीश रावत ने अपना ज्ञान यह कहते हुए परोसा कि उन्होंने गांधी को ‘जितना’ पढ़ा है उसके अनुसार गांधी ने हमेशा दूसरों की केवल इज्जत ही की, उन पर अपनी बातों को थोपा बिल्कुल नहीं! ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ वाले लहजे में बात करने वाले टीवी ऐंकर को तब यह नहीं सूझा कि इस राज्य मन्त्री से यह तो पूछ ही लेना चाहिए कि उसके इन ‘दूसरों’ में आतताई उपनिवेशवादी अंग्रेज शासक शामिल थे या नहीं?

पूछने को तो सरकार से यह भी पूछा जाना चाहिए कि अब जब दिल्ली पुलिस आन्दोलन पर भागीदारी की संख्या और समय की सीमा तो ठीक आन्दोलन-काल में पार्क के आसपास रुकने वाले दो-पहिया व चार-पहिया वाहनों तक की संख्या को को अनुमति की शर्तों से जोड़ रही है तो क्या आन्दोलन-स्थल के लिए जय प्रकाश पार्क को विकल्प के रूप में अन्ना के सामने प्रस्तावित करते हुए उसने सिरे से यह भुला दिया था कि पर्याप्‍त पहले ही वे निजी और सार्वजनिक रूप से बतला चुके थे कि जन-आन्दोलन में भागीदारी की ऐसी किसी सीमा की उनके पास कोई गारण्टी नहीं रहेगी? और तो और, प्रणव और सिब्बल जैसे दो-दो वरिष्‍ठ केन्द्रीय तो अनुमति के इस समूचे घटना-क्रम के सारे महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपा कर रखते हुए, बिल्कुल चतुर वकील की तरह, यह कुटिल तर्क उछालते फिर रहे हैं कि विरोध-प्रदर्शन मूलभूत अधिकार है जरूर लेकिन उसके लिए स्थान के चयन का विशेषाधिकार पुलिस कमिश्‍नर के पास ही सुरक्षित है।

सम्भव है कि हजारे की कुछ माँगों से हम असहमति रखते हों। हमारी यह असहमतियाँ गहरी भी हो सकती हैं। लेकिन हमें यह ध्यान सदा ही रखना होगा कि भ्रष्‍ट सरकारी तन्त्र इस स्थिति को ‘अपने दो दुश्मनों के परस्पर विरोधी होने’ के रूप में भुनाने में जुटा है। अमित्र होना, या चलिए यह भी मान लेना कि परस्पर दुश्मन होना, अलग बात है और एक चाल-बाज दुश्मन को हमारे इस परस्पर मतभेद को, एक-दूसरे को आपस में लड़वा देने के लिए, भुना लेने देना अलग। पहली बात महज एक तथ्य है जबकि दूसरी बात सीधी-सीधी कुटिल रणनीति है। हमें इस रणनीति के फन्दे से बचना ही होगा। हजारे के लोक-दायित्व पर उठायी गयी शंका की, स्वयं आकण्ठ भ्रष्‍ट हो चुकी, हर उँगली इस रणनीति की तमाम चालें चलेगी।

इसलिए, हजारे से सात्विक असहमति रखने वालों को समझना होगा कि उचित अवसर पर अपनी असहमति को पूरे लोक-दबाव के साथ अन्ना के सामने, बल्कि लोकतन्त्र के सामने, रखने के अवसर उसे भी मिलेंगे। तब अपना यह दायित्व वह भी निभा सकेगा। बल्कि, उसे निभाना ही होगा। लेकिन आज की सर्वोपरि लोक-तान्त्रिक सावधानी यही है कि हजारे से हमारी असहमतियाँ हमें भ्रष्‍ट सरकारी तन्त्र की झोली में, अनजाने-अनचाहे ही, टपका न दें। एक पके फल की स्वाभाविक तर्ज पर।

साथ ही, यह भी समझना होगा कि सत्ता की बहती गंगा में डुबकी लगाकर भ्रष्‍ट हुआ समूचा सरकारी-तन्त्र तमाम दल-गत्‌ दायरों के प्रति कतई निरपेक्ष होता है। कहें तो, देश के दुर्भाग्य से आज यह सर्व-दलीय हो चुका है। इसलिए, हमें खुद को सरकार की छत्र-छाया में राजनीति द्वारा फैलाये इस भ्रम-जाल में फँसने देने से बचाना ही होगा कि हजारे संसद्‌ के, संसदीय अवधारण के या कि जन-तन्त्र के निरंकुश नियन्ता बनने का अपना कोई, कतई अस्वीकार्य, सपना साकार करने में जुटे हैं। सरकारी लहजा यह है कि इसके लिए अन्ना संसद्‌ का ‘अतिक्रमण’ करने की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसा दिखाने की कोशिश हो रही है कि क्योंकि संसद्‌ नाम की यह संस्था एक निहायत निर्जीव प्रतिष्‍ठान है जो इसमें बैठने का अधिकार पा चुके गिनती के कुछ सैकड़ा प्रतिनिधियों की मौजूदगी से ही सजीव होती है।

जाहिर है, इन प्रतिनिधियों पर नैतिक दबाव डालने को संसदीय परम्परा या लोक-तन्त्र के अस्तित्व पर आपराधिक चोट पहुँचाने जितना अक्षम्य अपराध ठहराने की रणनीति बनी है। जबकि अपने भ्रष्‍ट आचरण की ऐसी बेतुकी सफाइयाँ देने में जुटी कार्यपालिका को ही नहीं, स्वयं विधायिका को भी समझना यह चाहिए था कि यह अन्ना नहीं, उनके पीछे खड़ा विशाल जन-सैलाब है जो यह ठाने बैठा है कि वह खतरे की सीमा तक बेलगाम हो चुकी कार्य-पालिका और विधायिका को यह समझा कर ही थमेगा कि इन दोनों का अस्‍तित्व लोक से है, लोक का अस्‍तित्व इनसे बिल्कुल नहीं। ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे लोक से हैं, लोक अन्ना से नहीं।

वैसे, निजी रूप से मैं यह भी मानता हूँ कि लोकपाल की अपनी माँग पर जन-समर्थन जुटाने के लिए अन्ना और उनके साथी जैसे-जैसे आम आदमी के बीच घूमे हैं, उनकी निजी धारणा और भाषा-शैली में गुणात्मक सुधार आता गया है। दूर बैठ कर, महज तटस्थता से, ऐसे जन-आन्दोलनों का मूल्यांकन करने वालों को मानना ही होगा कि इस बदलाव के पीछे उस जन-अपेक्षा और जन-दबाव के प्रभाव की बड़ी साफ भूमिका है जिसमें खरे उतरने से हजारे को बहुत व्यापक और सकारात्मक जन-समर्थन मिल रहा है। इसलिए, सोलह अगस्‍त से शुरू होकर बीतने वाला हर दिन लोक-तन्त्र की अब तक की सबसे कठिन परीक्षाओं से भरा होगा।

हर लोक-तान्त्रिक नागरिक को इस समझ की बड़ी अच्छी तरह से गाँठ बाँधनी होगी कि दिल्ली की परिस्थितियाँ नहीं, उनके अपने शहर, कस्बे या गाँव की गलियाँ यह तय करेंगी कि सारे तरह के भ्रष्‍ट आचरणों के खिलाफ़, लोक-तान्त्रिक भावना द्वारा, किया गया शंख-नाद कितनी दूर तक और कितनी देर तक अपनी गूँज फैलाता है? बतलाना होगा कि आज की लोक-माँग को सरकारी जूतों के तले अब और नहीं रौंदा नहीं जा सकेगा।