लोकपाल : आन्दोलन कुचलने की रण-नीति

आकण्ठ भ्रष्‍ट हो चुका तन्त्र इतनी नकारात्मक दूरी तय कर चुका है कि वहाँ से सकुशल वापसी कतई असम्भव हो गयी है। इस स्थिति में, खन्दक की अन्तिम लड़ाई लड़ने के अलावा, अन्य कोई विकल्प उसके पास बचा नहीं है।

जैसा कि सुनिश्‍चित था, १६ अगस्त की सुबह साढ़े सात बजे मयूर विहार स्थित सुप्रीम एन्क्लेव की लिफ़्ट से निकलते ही हजारे को हिरासत में ले लिया गया। पूछे जाने के बाद भी उन्हें ‘अपराध’ नहीं बतलाया गया। दिल्ली पुलिस ने केवल यह कहा कि ‘आदेश’ के पालन में ऐसा किया जा रहा है। कोई द्विविधा नहीं कि आदेश चिदम्बरम के सरकारी रुतबे से निकला होगा। कुटिल सिब्‍बल-चिदम्बरम नीति पर चलते हुए पुलिस ने अन्ना को उस निजी कार में बैठाया जिसमें बैठकर वे स्वयं ही राजघाट जाने वाले थे। ड्राइवर जरूर वही था लेकिन एक पुलिस अधिकारी उसके बाजू में बैठा हुआ था।

बहुत सोच-समझ कर बनायी गयी रणनीति पर चलते हुए, जब तक यह कार सार्थक लोकपाल की माँग कर रहे आन्दोलन-कारियों की भारी भीड़ से घिरी रही पुलिस ने उसे सड़क पर धीरे-धीरे सरकने दिया। दो किलोमीटर सरकने में लगभग चालीस मिनट लगे। इसी दौरान गाड़ी को घेरे में लिए पैदल चल रहे आन्दोलन-समर्थकों को, बीन-बीन कर, किनारे किया जाता रहा। गिरफ्तार भी किया जाता रहा। और जब गाड़ी ऐसे मोड़ पर पहुँची जहाँ से उसे समर्थकों के बीच से अलग-थलग कर सुविधा से मोड़ा जा सके, गाड़ी को अचानक मोड़कर गजटेड ऑफ़ीसर्स मैस (जीओएम) की ओर तेजी से दौड़ा दिया गया।

अन्ना के साथ ही अरिवन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया भी हिरासत में ले लिये गये थे जिन्हें मयूर विहार कैम्पस के एक दूसरे दरवाजे से निकाला गया। किरन बेदी और शान्ति भूषण राजघाट से हिरासत में लिये गये। जन लोकपाल आन्दोलन के लिए गठित कोर ग्रुप के इन सभी सदस्यों को भी जीओएम पहुँचा दिया गया। शुरुआती तीन घन्टों तक सरकारी पक्ष यह रहा कि कोई गिरफ्तारी नहीं की गयी, केवल कुछ व्यक्‍ति सुरक्षा और सावधानी के लिए हिरासत में रोके गये हैं। संकेत दिये जा रहे थे कि दिल्ली पुलिस द्वारा की गयी यह सारी ‘हिरासतें’ मात्र सावधानी-प्रेरित थीं। हिरासत में लिये गये इन सभी व्यक्‍तियों ने हिरासत में ही अपना अनशन शुरू कर दिया।

बाद में दो खबरें एक साथ आयीं। पहली यह कि एनडीए संसद्‌ के दोनों सदन में प्रधान मन्त्री से सफाई माँगेगी। इसी के पीछे यह खबर भी आयी कि अन्ना और उनके कोर ग्रुप के सदस्यों को शान्ति-भंग की ‘आशंका’ में बाकायदा गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद इन सभी को जीओएम में ही मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जहाँ सभी ने अपनी जमानतें देने से मना कर दिया। तब, अधिकारियों की चुप्पी के बीच, इन सभी को चोरी-छिपे अचानक ही जीओएम से निकाला गया उन्हें सात दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल ले जाया गया था। गिरफ़्तारी के घण्टों बाद यहीं पहली बार अन्ना को देखा गया। अन्ना के छह प्रमुख साथी भी तिहाड़ में डाल दिये गये। इनमें से एक ने भी धारा १४४ का उल्लंघन नहीं किया था। अन्ना ने भी नहीं।

इतना सब हो चुकने पर अम्बिका, सिब्‍बल और चिदम्बरम ने अपनी-अपनी शैली में मीडिया के माध्यम से कहा कि सभी को दण्ड प्रक्रिया की धारा १०७ और १५१ के तहत महज ‘रोक कर’ रखा गया है! बाद में, पुलिस की ओर से बाकायदा सूचित किया गया कि केवल धारा १४४ को तोड़ दिये जाने की ‘आशंका’ के आधार पर उस जगह से गिरफ्तारियाँ की गयी हैं जहाँ न तो धारा १४४ लगी हुई थी और न तब तक इनमें से एक ने भी, कहीं भी, यह धारा तोड़ी थी। दमन के इस खुले ताण्डव के विरोध में अन्ना ने अपना अनिश्‍चित-कालीन अनशन तिहाड़ में ही जारी रखने की घोषणा कर दी है।

इस बीच देश के लगभग हर कोने से इन गिरफ्तारियों की आलोचनाएँ मुखर होने लगी हैं। इसमें सामाजिक और राजनैतिक, दोनों, सोच शामिल हैं। इस सबसे दूर, आम नागरिक के प्रतीक तमाम बुजुर्ग, युवा और बच्चे भी आहतों-आक्रोषितों के सैलाब में शामिल हैं। जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है जो अनपेक्षित रहा हो। सरकारी गणित में भी यह सारी सम्भावनाएँ शामिल की गयी थीं। यह बहस बेमानी है कि खोज-बीन की जाए कि यह गणित किसका था — सरकार का या कि कांग्रेस का? महत्वपूर्ण यह है कि सारे गणित को ध्यान में रखते हुए दो-स्तरीय व्यूह-रचना की गयी थी। अनशन से पहले ही गिरफ़्‍तारी कर लेना इस पूरी व्यूह-रचना का पड़ाव-मात्र था। पड़ाव तक आने से पहले, व्यूह-रचना का पहला स्तर यह था कि १६ अगस्त के सूरज के उगने से पहले तक राजनैतिक और गैर राजनैतिक पक्षों के बीच यथा-सम्भव फूट डाली जाये। फूट की इस कोशिश का पहला चरण तो यह भी था कि लोकपाल समर्थक आन्दोलन-कारियों के बीच भी दो-फाड़ की कोशिश की जाये। सोच यह था कि इस सबसे, १६ अगस्त से पहले तक, आन्दोलन खुद-ब-खुद पस्त हो जायेगा।

जब योजना के इस ‘फूट डालो’ पहले स्तर में मन-माफ़िक सफलता नहीं मिल पायी तो गिरफ़्‍तारियाँ हुईं। इन गिरफ़्‍तारियों के होते ही अब अन्ना को मिले ‘राजनैतिक’ साथ की नीयत पर, पक्ष-धर मीडिया के सहारे, हर सम्भव आक्रमण करने की दूसरे स्तर की व्यूह-रचना पर जोर-शोर से काम शुरू कर दिया गया है। जैसी कि अपेक्षा थी, आरएसएस अन्ना का साथ देने आगे बढ़ी। आरएसएस के निर्णय की इस औपचारिक घोषणा से पर्याप्‍त पहले से ही अन्ना की फण्डिंग और मैनेजमेण्‍ट क्षमता पर सोचे-समझे आक्रमण शुरू हो चुके थे। आरएसएस के निर्णय की औपचारिक घोषणा सुनकर सरकार को लगा जैसे मन की मुराद पूरा करता दिव्यास्‍त्र हाथ लग गया हो। तभी, १६ अगस्त की गिरफ्तारी को लेकर जब वाम दलों की तीखी प्रतिक्रिया भी आ गयी तो कांग्रेस को जैसे बिना माँगे ही मोतियों की कीमती लड़ी मिल गयी।

प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक बड़े पुर्जे ने कांग्रेस के लिए गजब का मोर्चा खोल दिया। इनका राग सरकारी यह था कि प्रशान्त भूषण माओ-वादियों के अभी तक के सबसे बड़े पैरोकार साबित हुए हैं। वाम-पन्थियों के अन्ना के साथ इस तरह से खड़े होने से, भ्रमित करने की नीयत से भरपूर, यह काल्पनिक सवाल तक उछाल दिया गया है कि अन्ना के आन्दोलन के समर्थन में यदि सैकड़ों माओ-वादी किसी सार्वजनिक स्थल पर गोली-बारी शुरू कर देंगे तब हालात क्या होंगे? आन्दोलन का दमन करने के लिए एक-जुट हुई ताकतों की कोशिश यही है कि जनता तक सारी बात कुछ इस तरह पहुँचे कि लगे जैसे मूल खेल तो ‘विरोधी राजनैतिक’ ताकतों का था जिन्होंने अपनी शुरूआती चाल अन्ना को मोहरा बना कर चली थी। बातें इस तरह आगे बढ़ेंगी कि यह खेल धीरे-धीरे ‘उजागर’ होने लगा है।

ऐसे गोयबल्सी दुष्‍प्रचारों से सतर्कता पूर्वक बचते हुए आम नागरिक को स्वयं से यह सवाल करना ही होगा कि देश की तमाम भ्रष्‍ट ताकतों ने, पूरी एकजुटता के साथ, ऐसी सार्वजनिक मुनादियों का दामन क्यों थाम रखा है जिनका न तो कोई तात्विक आधार है और न तार्किक ही। विशुद्ध निर्मलता से की गयी उसकी यह पड़ताल ही शायद उसे यह साफ कर पाये कि आकण्ठ भ्रष्‍ट हो चुका यह तन्त्र इतनी नकारात्मक दूरी तय कर चुका है कि उसके लिए वहाँ से सकुशल वापसी कतई असम्भव हो गयी है। उसके लिए कतई असम्भव हो गयी है। इस स्थिति में, खन्दक की ऐसी अन्तिम लड़ाई लड़ने के अलावा, अन्य कोई विकल्प उसके पास बचा नहीं है। इसीलिए, अपनी इस अन्तिम लड़ाई को जीतने के लिए वह तमाम आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनैतिक मूल्यों की बलि चढ़ायेगा ही ताकि केवल राजनैतिक चेहरों की अदला-बदली से निराश होकर लोक-तान्त्रिक प्रक्रियाओं से तटस्थ होकर घर बैठ चुका अधिसंख्य भारतीय जन, इस पूरे आन्दोलन से कतई तटस्थ रहते हुए, आगे भी महज मूक दर्शक ही बना रहे।

यही नहीं, उथले तौर से ठीक समझ पड़ती अपनी दलीलों से, सरकार सांसदों को भी अन्ना के खिलाफ़ भड़काने का भरसक प्रयास कर रही है।

(१६ अगस्त २०११)