हमारे कान में नील का डोरा!

निराश तो क्या होते, बाबू मोशाय नाराज हुए दिखने लगे। मीडिया में ढोल-नगाड़े पिटने लगे कि इशारों ही इशारों में हर हाईनेस को सन्देशा भिजवाया जा रहा है कि अब तो बालक की काबलियत की परीक्षा होकर रहेगी।

बड़े दिनों के बाद देख रहा था कि बादलों की बौछारें नहीं हुई थीं। यानि हालात ने भोपाल के पटिये-बाजों को अपनी वर्ल्ड फ़ेमस धुप्पल ठोंकने का न्यौता दे दिया था। मुझसे भी नहीं रहा गया। अपनी हाजिरी दे दी। लम्बी गैर-हाजिरी के बाद जा रहा था इसलिए मुफ़ीद जगह कब्जाना मेरी पहली प्रायॉरिटी थी। महफ़िल जमी और अपनी-अपनी दोंदने की शुरूआत से पहले ही ठसा-ठस भी हो गयी।

फ़ॉर ए चेंज, पहली बार ऐसा हुआ कि हवा को रुख दिया टी-स्टॉल वाले छोरे तम्बी ने। दरअसल, बीते दिनों भारी बरसाती झड़ियों के अलावा राजनैतिक चाल-बाजियों की रिकॉर्ड भरमार भी हुई थी। तम्बी ने गप्पास्टिकों की इसी नब्ज को क्या छेड़ा, मौके की तलाश में कई दोस्तों के घर भटक आये पटियेबाजी के एक दार्शनिक को लगा जैसे प्यासे को कुँआ मिल गया हो। आव देखा न ताव, तपाक से शुरू हो गये। एग्ज़ाम्पल-दर-एग्ज़ाम्पल अपनी तरो-ताजा फिलॉसफ़िकल थ्यौरी पटक दी। सार कुछ यह था कि किसी औसत हिन्दी फ़िल्म में गुंजाइश मिले तो अकाध सीन ऐसा तो घुसेड़ ही दिया जाता है जिसमें दो दोस्त या दुश्मन बापों के पीछे खड़ी विरुद्ध लिंगी औलादें इशारों ही इशारों में आपसी भावनाओं का इजहार करती मिल जाएँ। लेकिन अब जबकि बाकी दुनिया की तरह भारत ने भी इक्कीसवीं सदी के आने को बढ़-चढ़कर कबूल लिया है तो निगाहों और इशारों की यह बीमारी अभिनेता की हद को पार कर नेता तक पहुँचने लगी है। पहुँचने लगी क्या, रग-रग में व्याप चुकी है।

गोया, शुरूआत में ही देश की फड़कती नस उघाड़ दी गयी थी। सो, बिना इधर-उधर भटके इसी के चौगिर्द महफ़िल जम गयी। अवसर की ताक में अपने बाल पका चुके एक घाघ ने बात को और आगे दौड़ाया — जरा से फ़र्क के साथ इस नजारे का एक बिल्कुल दूसरा पहलू भी है। और, जब देखा कि रात्रि-कालीन चाय के दो घूँटों की पैदाइश उनके इस हालिया दर्शन से, तम्बी तो तम्बी, वे भी चौंक गये थे जिन्होंने उस दार्शनिक बहस को शुरू किया था तो जैसे क्लासिक स्ट्रेट ड्राइव ठोंक रहे हों समझाया कि वह फ़र्क यह है कि नेता और अभिनेता नाम की इन दोनों ही आदम-जात वीवीआईपी केटेगरियों से इस पहलू का तन्नक सा भी लेना-देना नहीं है। फुल स्टॉप लेकिन यहाँ भी नहीं लगाया। उजबक की नाईं, अध-खुले मुख से सहयोग करती मेरी सवालिया निगाहों को पढ़ कर सीधे-सीधे ओवर द बॉलर सिक्सर ही जड़ दिया — इस नजारे का आदमी के सोच, विचार या आचरण से कोई सम्बन्ध नहीं। इण्टरनेशनली इसे ‘एलएलटीटी’ कहते हैं। अर्थात्‌, लुकिंग लन्दन टाकिंग टोकियो! अरे, आदम-जात की निगाहों का वही पैदाइशी डिफ़ैक्‍ट अपनी बातचीत में जिसे आम हिन्दुस्तानी ‘लुकिंग हियर, सीइंग देयर’ कहता है।

महफ़िल का ऐसा टर्न बहुतों को नहीं पुसाया इसलिए बात की रेल एक बार फिर से ‘इशारों ही इशारों में’ की ओरीजिनल पॉलिटिकल पटरी पर दौड़ पड़ी। किसी ने बतलाया कि पहले कनीमोझी और फिर राजा की ओर से अपने-अपने ऊपर चल रहे मुकदमों में पीएम को गवाही के लिए बुलवाने की घोषणाएँ डराने-धमकाने की नीयत की खुली इजहार हैं — भरी अदालत में कटघरों की अदला-बदली से बचना हो तो हमें बचाओ! दूसरे ने इस नजरिये को दूसरी बानगी से सेकेण्ड किया। याद दिलाया कि कैसे चुप्पी साधे रख कर रिश्‍तों के छोटे भैया यानि कि पॉलिटिक्स के नेता जी असल में पीएम को धमका रहे हैं कि जमानत की खिलाफ़त दिखाने के दाँतों से खाने के दाँतों में तब्दील हुई नहीं कि नगदी की पूरी पोल दुनिया को दिखा देंगे। पूरी की पूरी रॉ फ़िल्म, बिना एडिट किये या सेंसर करवाये।

देख रहा था कि माहौल ज्यादा ही संजीदा होता जा रहा था। यों, संजीदेपन से एलर्जिक नहीं हूँ लेकिन इतनी प्यौर संजीदगी से पटिये-बाजी की चुस्कियाँ फीकी पड़ जाती हैं। फिर भी बेबस था क्योंकि कुछ सूझ नहीं रहा था। पर उस्तादों का जमावड़ा था और सब के सब अपनी चोंच खोलने को उतावले भी थे। लपक कर डोर जिसने थामी वह बीजेपी से, या कहें कि बीजेपी की एमपी से सांसद्‌ सुषमा से, खासे उखड़े हुए थे। डिटेल में बखाना कि कैसे उन्होंने रेड्डियों के काले मान लिए गये धन्धे की आँच खुद तक आने के खतरे को यह कहकर दूसरे हम-पेशावरों की ओर ठेल दिया था कि बेल्लारी के बेताज बादशाह से उनके सम्बन्ध उनके निजी नहीं थे, वे तो अपने मित्रों के दिये क्लूज़ को फ़ालो भर कर रही थीं। महज राजनीति की खातिर!

क्लूज़ से याद आया। उस दिन पीएम से जुड़े क्लूज़ की तो जैसे बाढ़ ही आ गयी थी। किसी ने समझाया कि कैसे अचानक विदेश जाकर सोनिया मेम ने एक क्लू देने की कोशिश की थी — लगन नहीं हुई तो क्या, उनका वली अहद अब बेबी नहीं रहा। गबरू हो गया है। अबसे लोग उसे ही रिपोर्ट करें। लेकिन ठस मानसिकता के पार्टी नेता जब इस क्लू का ओर-छोर ही नहीं समझे और पीएम ने बाबू मोशाय को तारन-हार की सीट पर बैठा दिया तो दूसरा, कुछ और साफ, क्लू पटका। सन्देश भिजवा दिया कि पार्टी में चार लोगों की उस नयी हाई कमान की चलेगी जिसमें उनका गबरू तो होगा लेकिन बुजुर्ग मोशाय नहीं होंगे। मीडिया में मन-माफ़िक ढिंढोरा भी पिटवाया कि मन के बदले ताज-पोशी की नयी मन-मानी मुनादी पीट दी गयी है। बाकी की फ़ॉरमेलिटीज़ लौटते ही पूरी कर दी जायेंगी।

निराश तो क्या होते, बाबू मोशाय नाराज हुए दिखने लगे। दूसरे कैम्प के मीडिया में ढोल-नगाड़े पिटने लगे कि इशारों ही इशारों में हर हाईनेस को सन्देशा भिजवाया जा रहा है कि अब तो बालक की काबलियत की परीक्षा होकर रहेगी। लेकिन फिर पीएम की निजी मिन्नतों से पसीज भी गये। तब जैसे ही संकट के बादल छँटे, घबरा उठी मैडम जी ने अपनी सेवा में जुटे मीडिया को रिएक्‍टिवेट किया। खबरें ब्रेक हुईं कि कैसे उनके सन्देश पर ही बाबू मोशाय ने पीएम की पॉलिटिकल जान बचायी थी!

(०४ सितम्बर २०११)